संदेश

सबसे बड़ा सच---'झूठ'

चित्र
हम जिस दौर में जी रहे हैं वहां सबसे बड़ा सच है 'झूठ'। जो जितनी चालाकी से झूठ बोलता है, जो अपने ग़लत कारनामों को आसानी से छुपा सके--वो ही है आज की सबसे बड़ी जीत। राहुल राज का एनकाउंटर नहीं हुआ उसकी हत्या की गई--ये कोई और नहीं बल्कि फॉरेंसिक एक्सपर्ट कह रहे हैं। मुंबई के जे जे अस्पताल के फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉक्टरों ने साफ-साफ कहा है कि उसे दो फीट की दूरी से गोली मारी गई है। क्योंकि उसके चेहरे पर गन पाउडर और काले धब्बे मौजूद हैं। ज़ाहिर है उसे पहले पकड़ा गया है फिर उससे बात की गई है उसके बाद उसकी हत्या की गई है। राज ठाकरे को कोई लाख गालियां दे ले पर ये मानना होगा कि पूरा सिस्टम राज ठाकरे का साथ दे रहा है। देशमुख सरकार तो मानों राज की दलाली में जुटा है। चूंकि कई राज्यों में चुनाव नजदीक है इसलिए केंद्र सरकार देशमुख सरकार को नहीं लताड़ रही है। लेकिन सच तो यही है जिसे लगातार झुठलाया जा रहा है। महाराष्ट्र सरकार लगातार राज ठाकरे को सुरक्षित बनाने में जुटी है। केंद्र सरकार ईसाईयों के हमले पर अगर उड़ीसा और कर्नाटक सरकार को राष्ट्रपति शासन लगाने की धमकी दे सकती है तो फिर महाराष्ट्र में क्यो...

एनकाउंटर का खौफ

चित्र
दिल्ली के जामिया नगर के बाटला हाऊस में एनकाउंटर। एक तरफ दिल्ली पुलिस के दावे और दूसरी तरफ बाटला हाऊस में रहने वाले लोगों की बातें। जाहिर है दोनों में सच तो कोई एक ही है। या तो वहां से निवासी या फिर दिल्ली पुलिस। एनकाउंटर पर तमाम पत्रकार और बुद्धिजावी सवाल उठा रहे हैं। उनके पास अपने तर्क हैं। पुलिस की बात को सही मानने वाले बौद्धिक मैथुन करने वालों की भी कमी नहीं। अपनी-अपनी काबिलियत माफिक हर कोई बहस को तैयार है। चलिए दोनों पक्ष के बौद्धिक जनों की बातों को भी स्वीकार कर लिया जाए। बड़ी अच्छी बातें ऐसे लोग अपने ब्लॉग पर लिख रहे हैं। मुझे पता चला कि तमाम अखबारों और न्यूज चैनलों की मीटिंग में इन बातों पर काफी गरमा-गरम बहस हो रही है। पुलिस का पक्ष लेने वालों को बीजेपी से सीधे तौर पर जोड़ा जा रहा है और जो पुलिस के एनकाउंटर पर सवाल खड़े कर रहे हैं उन्हें वामपंथी माना जा रहा है। सुनने में आया है कि तमाम न्यूज चैनलों के न्यूज रूम में भी लोग खुलेआम पुलिस का पक्ष लेते दिख रहे हैं और मुस्लमानों को अप्रत्यक्ष रुप से सुना भी रहे हैं। कुछ बदतमीज और बेबाक लोग खुलेआम अपनी आरएसएस वाली चड्ढी दिखाने को आतुर ...

कौन लौटाएगा सिमरन की हंसी?

चित्र
शिवराज पाटिल की उम्र कितनी होगी? 73 साल के पाटिल। अपनी इस उम्र में उन्होंने अपने घर में किसी को ऐसे बिलखते देखा होगा जैसे तड़प रही है पांच साल की मासूम सिमरन। शायद नहीं। राजनीति के जिस मकाम पर पाटिल साहब हैं कम से कम उससे तो नहीं लगता। बेसहारा और लाचार मासूम की तरह क्या उनके घर में कोई कभी रोया होगा? शायद नहीं। वजह है। धनी मानी परिवार से ताल्लुक रखने वाले पाटिल को बेबसी के आंसू के बारे में क्या पता। चलिए खुदा न करे। उन्हें इस उम्र में कुर्सी के अलावा किसी और चीज के लिए बेबसी के आंसू का एहसास हो। ऐसा नहीं कि वो पार्टी अध्यक्ष के तलवे चाटना नहीं जानते। धमाकों के समय भी तीन बार कपड़े बदलना नहीं जानते। ऐसे में भी बालों में जेल(क्रीम)लगाना नहीं जानते। ऐसा नहीं कि सरेआम खुद को चमचा कहलाने में उन्हें कोई हर्ज है। इन सबके एवज में बस जो उन्हें नहीं जानना है उसके लिए बहुत ज्यादा प्रयास नहीं करते। अकसर दफ्तर में कहा जाता है। जो काम नहीं करता है वो सबसे सुकून से रहता है और उसकी तरक्की तो पक्की होती है। नेतागीरी तो फिर बिना चमचागीरी के हो ही नहीं सकती। भले लोग उसे गॉड फादर की संज्ञा दें। पर वो विशु...

प्रचंड की खुली पोल

चित्र
नेपाल के नए प्रधानमंत्री प्रचंड। माओवादियों के प्रखर और ओजस्वी नेता। ऐसा नेपाल की जनता ही नहीं माओवाद को मानने वाले भी कहते थे। नेपाल में राजशाही को जब तक खत्म नहीं कर लिया तब तक चैन नहीं लिया। प्रचंड खुद अब सत्ता में हैं। लेकिन इससे पहले वो माओवादी नेता हैं। माओवाद के सिद्धांतों को मानने वाले। पर ऐसा नहीं है। सत्ता में आते ही प्रचंड की नंगई नजर आ गई। प्रचंड बिलकुल नेताओं की तरह बात करने लगे। किससे नफा और किससे नुकसान--इसका ख्याल सबसे पहले रखने लगे। प्रचंड का भारत दौर उनके लिए काफी महत्वपूर्ण है। बड़ी वजह है। नेपाल में भारतीय कंपनियों के निवेश की गुहार लगाना। प्रचंड ने हमेशा पूंजीपतियों के खिलाफ बेखौफ आवाज उठाई। जिंदगी का एक लंबा समय जंगलों और भारत के शहरों में छुप-छुपकर बिताया। लेकिन सत्ता में आते ही खुद पूंजीपतियों को निवेश के लिए अनुरोध कर रहे हैं। देश की तरक्की हर कोई चाहता है। पर एकदम से विकास मॉडल को हाईजैक करके उसे अमल में लाने की फिलहाल जरूरत नहीं थी। बुद्धदेव भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल के रोल मॉडल मुख्यमंत्री के तौर पर उभरे। विकास के नाम पर ज्योति बाबू से ज्यादा काम किया। इसके लि...

"मोहल्ला" के अविनाश (नए ब्लागर्स के पालनहार)

नए ब्लागर्स के पालनहार। उन्हें मंच देने वाले। उनकी आवाज को एक मंच देने वाले। यशवंत के भड़ास से नफरत करने वाले पर नए ब्लागर्स की भड़ास को अहमियत देने वाले---अविनाश। मोहल्ला ब्लागर्स चलाने वाले अविनाश। एनडीटीवी में बड़े पद पर काम करने वाले अविनाश। टेलीविजन के पुराने पत्रकार अविनाश। हिंदी के सबसे पुराने हिंदी ब्लागर्स में से एक अविनाश। मुझे उम्मीद है अब आप लोगों के जेहन में अविनाश के 'मोहल्ला' की छवि उभर गई होगी। रवीश के साथ एक अलग मोहल्ला चलाने वाले अविनाश ने अच्छा किया कि एक नए पत्रकार की स्क्रिप्ट को अपने ब्लाग पर रखा। न तो आजतक मेरी अविनाश से मुलाकात हुई है और न ही नए पत्रकार अनिल यादव से। पर अविनाश को एक बात जरूर कहना चाहता हूं। टेलीविजन के लिए स्क्रिप्ट लिखने के लिए उसके साथ सपोर्टिंग विजुल का होना जरूरी है। लफ्फाजी और संपादकीय लिखने की गुंजाइश कम से कम टेलीविजन में कम रहती है। इसके लिए अखबार की नौकरी अच्छी है। कम से कम अविनाश से ऐसी उम्मीद मैं नहीं करता। अविनाश को ऐसे युवा पत्रकारों को एक बार जरूर समझाना चाहिए। एक बात और पत्रकार बनने का मतलब ये नहीं कि किसी को कभी भी गाली द...

राजेश जोशी और आज के कवि

चित्र
बच्‍चे काम पर जा रहे हैं हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे? क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं सारी रंग बिरंगी किताबों को क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं सारे मदरसों की इमारतें क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन खत्‍म हो गए हैं एकाएक तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में? कितना भयानक होता अगर ऐसा होता भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल कवि राजेश जोशी की यह कविता और लंबी है। लेकिन इन पंक्तियों में विकासशील देश की असलियत है। भले ही डेवलप्मेंट सिस्टम के लिए माहिर माने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अफनी पीठ थपथपाए। सोनिया गांधी विकास के सारे आंकड़े दुनिया के सामने रखें। लेकिन राजेश जोशी की ये पंक्तियां अकाट्य है। कुछ दिन पहले कवि राजेश जोशी को साक्षात सुनने का मौका मिला। जोशी जी ने तमाम कविताएं सुनाईं। कविता के जरिए अपने अनुभव सुनाए। मैं हिल गया। सच को इतनी आसानी से ...

तानाशाह मुशर्रफ का अंत

चित्र
पाकिस्तान टीवी पर पूर्व जनरल परवेज मुशर्रफ को रोते हुए पूरी दुनिया ने देखा। घड़ियाली आंसुओं का मानों सैलाब ला दिया। लेकिन पाकिस्तान की जनता पर कोई खास फ़र्क नहीं पड़ने वाला था। लोगों के दिल पर उभरे गहरे जख्मों पर इन घड़ियाली आंसुओं का असर नहीं हुआ। एक बार फिर से जिंदगी की हकीकत सामने आई। समय से बड़ा कोई नहीं। चाहे सद्दाम हुसैन हो या फिर मुशर्रफ। अंत एक सा ही होता है। तानाशाह की प्रमुख कांटे भारत के लिए चुन चुन कर कांटे बोने वाले फौजी तानाशाह के तौर पर। (1) याद कीजिए - 2001 में करगिल की चोटियों पर 500 बहादुर भारतीय फौजियों का खून बहाने के लिए यही जनरल जिम्मेदार है। महीनों की तैयारी के साथ सादी वर्दी में पाकिस्तानी फौजी टिड्डियों की तरह करगिल की चौटियों पर काबिज हो गए थे। देर से भारत को खबर लगी - और उस वक्त चोटियों को आजाद करवाने में नाकों चने चबाने पड़ गए। ये था मुशर्रफ का बोया पहला कांटा। उस वक्त तो वो सत्ता में भी नहीं थे, नवाज शरीफ सरदार थे - लेकिन फौज और आईएसआई की लगाम मुशर्रफ के हाथों में ही थी। (2) 13 दिसंबर 2001 - भारत के दिल पर सीधा हमला, आत्मघाती हमलावरों ने ...