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मेरे लाड़ले को चिकोटी क्यों काटी ?

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मेरे लाड़ले को चिकोटी काटी तो लोग अब खामियाज़ा भुगतो। यह मैं नहीं कह रहा हूँ। यह अप्पा कह रहे हैं स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा से। कुणाल ने भी हिम्मत जुटाकर लाड़ले को ही चुना। लगता है कुणाल ने लाड़ले के पिछवाड़े में पूरी ताकत से दाँत गड़ा दिया है। भई, जब बैठने में दर्द होगा, बिस्तर पर करवट लेने में लाड़ला कराहेगा, तो अप्पा को तकलीफ तो होगी ही। अप्पा से कैसे देखा जाएगा ये सब।  लाड़ला, अप्पा के लिए दिन-रात नहीं देखता। सारी दुनिया की गालियाँ सुनने के बाद भी उनके समर्थन में खड़ा रहता है। अपने प्रोफेशन में घटिया साबित हुआ, पर अप्पा के लिए मन में इज्जत बरकरार रही। टस से मस नहीं हुआ। पता नहीं अप्पा और लाड़ला के बीच कोई अनकहा रिश्ता है या फिर रुहानी। जो भी हो अब अप्पा की बारी है। सो कर दिया।  अप्पा समय-समय पर कमाल करते रहते हैं। दुनिया जाए भांड में पर जो अपने हैं, सगे हैं, सहोदर हैं, उनके लिए अप्पा लुंगी खोलकर नाचते हैं। जब अप्पा नाचने लगते हैं तो फिर उनके चाहने वाले भक्ति में नंगा होकर नाचने लगते हैं। भक्ति में कहा ध्यान रहता है कपड़ों का। जो जितना खुलकर नाचता है, अप्पा उसको

आईना दिखाओ, तोड़ो नहीं…पत्रकार, चाटुकार, लोलुपकार और अंत में हाहाकार

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हालात ऐसे हैं कि बिना दिल का आदमी, बेमौत मारा जाएगा। पर जिनके पास दिल है, उनको तो प्यार हो ही जाएगा। यह सच है, प्यार तो होना ही था। यकीन मानिए, प्यार से अच्छा कुछ नहीं होता। हालांकि हमारे पूर्वज कह गए हैं, प्यार निश्छल होता है। उसमें स्वार्थ की जगह नहीं होती। सच्चा प्यार हमेशा से बदले में चाहत की इच्छा नहीं रखता। यह कहना आसान है, खासकर आज की तारीख में। प्यार है तो प्यास है और प्यास है तो पानी के लिए प्रेमी हाथ पैर तो मारेगा ही।  पत्रकार को प्यार है अपने काम से। उनका काम है, सरकार के कामकाज की समीक्षा करना और जनता से उसको अवगत कराना। यानी पत्रकार हमेशा जनता के हक़ में, जनता के लिए काम करने के प्रतिबद्ध होता है। अगर सरकार जनता के काम में कमज़ोर पड़े तो सरकार को सही दिशा दिखाने का काम पत्रकार करते हैं। यही कारण है कि जनता हमारे देश के पत्रकारों को प्यार करती है। क्या, नहीं करते हैं? नहीं, नहीं। मैं आपकी बात को नहीं मानता। जनता पत्रकारों को प्यार नहीं करती तो फिर पत्रकार इतने बड़े सेलिब्रेटी कैसे बनते। हाँ, यह माना जा सकता है कि ऐसे सेलिब्रेटी पत्रकारों को जनता से ज्यादा राजन

‘तुम्हारा नाम क्या है बसंती’

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वैसे तो दिल्ली में ठंढ बहुत है पर यहाँ की ठंढ में जो मौसम छाया है वो है सगाई और शादी का। महंगाई की मार के बावजूद दनादन शादियाँ हो रही हैं। लाखों, करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। ऐसी ही एक शादी में जाने का मुझे मौका मिला। जिनकी बेटी की शादी थी, वो लोग थोड़े ज्यादा धार्मिक किस्म के हैं। खैर, मैं कौन सा अधार्मिक हूँ, जो शादी में न जाता। जाते ही खाने पर टूट पड़ा। तभी मेरी नज़र एक बैठकी पर पड़ी। बैठकी में कुछ युवा और दूसरे लोग मौजूद थे। वो आपस में किसी बात को लेकर बहस कर कर रहे थे। मुझे लगा, यहीं बैठना अच्छा रहेगा। वहाँ बैठने पर पता चला, ये लोग एक दूसरों को नहीं जानते और बहस का मुद्दा है आज की राजनीति। युवा, सरकार विरोधी बातें कर रहे थे और बाकी दूसरे लोग, सरकार के समर्थक में। अचानक बहस गहमागहमी में बदल गई। अधेड़ उम्र के लोगों ने युवाओं को टुकड़े-टुकड़े गैंग का सदस्य बता दिया। तो ताव में युवाओं ने अधेड़ उम्र के लोगों को साध्वी प्रज्ञा गैंग का सदस्य ठहरा दिया। चूंकि माहौल शादी का था, इसलिए किसी तरह से सबको चुप कराया गया। अगर माहौल शादी का न होता तो उस दिन मारपीट तय होती। सवाल यह उठा कि

पानी पर पंगा...?(ये भी कोई बवाल करने की बात है?)

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मैं ड्राइमरूम में बैठा हूँ। कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन अपने लेखन पर एकाग्रचित नहीं हो पा रहा हूँ। वजह है, बीस लीटर पानी की बोतल सप्लाई करने वाले अशोक मल्होत्रा और मेरे पड़ोसी के बीच हो रही बहस। पड़ोसी, पानी की बोतल की बढ़ी हुई कीमत देने को तैयार नहीं है और अशोक मल्होत्रा बार-बार यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि इसमें उसकी क्या गलती है। यह कीमत न तो वो तय करता है न ही बढ़ी हुई रकम उसकी जेब में जाने वाली है। बीस लीटर पानी की बोलत की कीमत में एकदम से दस रुपए की बढ़ोतरी हो गई है। पड़ोसी का कहना था कि दस रुपए बढ़ने का मतलब हुआ, अब बोतल बीस लीटर की नहीं बल्कि इक्कीस लीटर की हो गई। पर पानी सिर्फ बीस लीटर है।  मैं इन दोनों की बातें सुन सुनकर पकने लगा था तभी ट्विटर के एक लिंक पर मेरी नज़र पड़ी। इस लिंक में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2018 के आंकड़ों का ज़िक्र किया गया था। पर इसमें सबसे चौंकाने वाले आंकड़े थे, पानी को लेकर हुई हत्याओं के। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2018 में कुल 29,017 हत्याएं हुईं। यानी हर दिन 80 लोगों की मौत। इनमें पानी को लेकर साल

भक्त, भक्ति और भगवान…समाज गया तेल लेने

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मेरे एक काबिल दोस्त हैं। भक्ति में दिन रात सांगोपांग डूबे रहते हैं। किसकी भक्ति, यह मत पूछिए। भक्ति का आलम यह है कि मेरे दोस्त को खुद और अपने भगवान के आगे कुछ नहीं सूझता। सूझना भी नहीं चाहिए। फिर भक्त काहे का। आजकल की भक्ति में एक कमी है। नियत ठीक नहीं है। मेरे दोस्त खुद की दुकान ऊंची करने के चक्कर में लगे रहते हैं। स्वार्थ में आकंठ डूबे रहते हैं। ज़ुबा पर ‘भगवान’ का नाम और मन में स्वार्थ की अनंत अट्टालियाकाएं। नए सिरे से भक्ति में डूबे इस न्यू इंडिया में सबकुछ नया है। भक्ति की परिभाषा। भक्त होने की शर्तें। भगवान कहलाने की उच्चाकांक्षाएं। इन सबके के साथ नए समाज को गढ़ने की नई कोशिशें। वाकई उत्तरआधुनिकता, इस देश में इससे पहले इतनी शिद्दत से महसूस नहीं किया गया होगा। मेरे दोस्त तो हमेशा इस बात से सहमत रहते हैं कि पुरानी सारी चीज़ें बहुत पुरानी हैं। वो बार-बार लोगों को हिदायत देते हैं और कहते हैं कि पुराने ढर्रे से निकलिए। नए तरीके से न्यू इंडिया में सोचिए। पता नहीं मेरे दोस्त अपने माँ-बाप को अब माँ-बाप मानते हैं या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अपने भगवान और भक्ति के आगे माँ-बाप को य

“कभी-कभी लगता है आपुन ही भगवान है”

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क्या गणेश गायतोंडे नहीं जानता था कि वक्त के समंदर में बड़े-बड़े सिकंदर डूब चुके हैं?  चौड़ी सड़क पर भाग रहा हूं मैं बेतहाशा। पीछे न जाने कौन-कौन सी एजेंसियां पड़ी है। हालांकि दौड़ाने के लिए एक ही एजेंसी काफी है। और भागते समय पहली और आखिरी कोशिश यही होती है कि किसी तरह बच जाएं। अचानक देखा, सामने से एक ट्रक आ रहा है। ट्रक और मेरे बीच एक फीट की दूरी रही होगी कि ज़ोर से कट की आवाज़ आई। लाइट्स ऑन हो गई। यह तो फिल्म का सेट है। सेट पर मौजूद लोगों ने तालियाँ बजाईं। एक टेक में बेहतरीन रिएक्शन देने के लिए डायरेक्टर ने आकर गले लगा लिया। मेरी नींद खुल गई। मुझे अफसोस हुआ। धत! नींद भी गलत समय पर टूटती है। थोड़ी और रह जाती तो उसका क्या चला जाता। लेकिन नहीं, माथे पर लिखा है, ज़िंदगी और पनौतियाँ एक साथ चलेंगी, तुम्हें जो उखाड़ना है उखाड़ लो। नींद टूटते ही मैं फिर से जिंदगी और पनौती की दोस्ती की जाल में फंस गया। सोचने लगा, क्या यह सच है कि ज़िंदगी और पनौतियाँ एक दूसरे की पूरक हैं? क्या ऐसा ही होता है ज्यादतर लोगों के साथ? कहीं ऐसा तो नहीं कि गिने-चुने भगवानों के बीच सवा सौ करोड़ से ज्याद

इस प्यार को क्या नाम दें...

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विकास के इस दौर में मैंने अपने अहाते में अबतक साँस ले रहे नींबू के गाछ से सारे फल तोड़ लिए हैं। डर है, पता नहीं विकास और आस्था के घालमेल में वो शहीद न हो जाए। जब विकास के नाम पर मुंबई के आरे इलाके दो हज़ार से ज्यादा पेड़ शहीद हो गए तो फिर नींबू के गाछ की क्या औकात। वैसे भी आस्था के सामने किसी की औकात नहीं देखी जाती। देखी जाती है सिर्फ नियत और स्वार्थ। वैसे, आस्था और नींबू का पुराना याराना है। आस्था जब भी सामने खड़ी होती है नींबू सरेआम तड़प-तड़पकर दम तोड़ देता है और उफ! तक नहीं करता। प्रीत का ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिले। पर पता नहीं, यह प्रीत, बिहार के पकड़ुआ विवाह जैसा तो नहीं है। राह चलते लड़के को उठाया और सीधा मंडप में लैंड कराया। यही हाल आस्था और नींबू के साथ तो नहीं है। आस्था कहीं और चिपकी है और नींबू को मिर्च के गठबंधन के साथ आस्था के गले में जबरन लटक बना दिया जाता है। बेचारी आस्था। न चाहते हुए भी नींबू का भार उठाती रही है। और नींबू, पर्यावरण की दुहाई देकर सूली पर चढ़ जाता है। मुझे मालूम है आप कह सकते हैं मेरे अंदर संस्कार, संस्कृति और सभ्यता की भारी कमी है। यह आरोप सर्वथा