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पानी पर पंगा...?(ये भी कोई बवाल करने की बात है?)

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मैं ड्राइमरूम में बैठा हूँ। कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन अपने लेखन पर एकाग्रचित नहीं हो पा रहा हूँ। वजह है, बीस लीटर पानी की बोतल सप्लाई करने वाले अशोक मल्होत्रा और मेरे पड़ोसी के बीच हो रही बहस। पड़ोसी, पानी की बोतल की बढ़ी हुई कीमत देने को तैयार नहीं है और अशोक मल्होत्रा बार-बार यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि इसमें उसकी क्या गलती है। यह कीमत न तो वो तय करता है न ही बढ़ी हुई रकम उसकी जेब में जाने वाली है। बीस लीटर पानी की बोलत की कीमत में एकदम से दस रुपए की बढ़ोतरी हो गई है। पड़ोसी का कहना था कि दस रुपए बढ़ने का मतलब हुआ, अब बोतल बीस लीटर की नहीं बल्कि इक्कीस लीटर की हो गई। पर पानी सिर्फ बीस लीटर है।  मैं इन दोनों की बातें सुन सुनकर पकने लगा था तभी ट्विटर के एक लिंक पर मेरी नज़र पड़ी। इस लिंक में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2018 के आंकड़ों का ज़िक्र किया गया था। पर इसमें सबसे चौंकाने वाले आंकड़े थे, पानी को लेकर हुई हत्याओं के। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2018 में कुल 29,017 हत्याएं हुईं। यानी हर दिन 80 लोगों की मौत। इनमें पानी को लेकर ...

काट पर 'कट' - AAREY 2

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तुम कहाँ हो ग्रेटा थनबर्ग? हां, आपने सही समझा। मैं स्वीडन की उसी 16 साल की पर्यावरण एक्टिविस्ट के बारे में पूछ रहा हूं। ग्रेटा थनबर्ग, कहीं तुम जंगलों में तो नहीं घूम रही हो मल्टीकैम शूटिंग के लिए? डिस्कवरी की कोई फिल्म तो नहीं बना रही हो? पर, तुम्हारे लिए डिस्कवरी फिल्म क्यों बनाएगा भला। तुम जहाँ भी हो, जैसी भी हो, तुम्हें मेरी बात सुननी पड़ेगी। मुझे तुमसे शिकायत है। ‘How Dare You’ तुमने कह तो दिया, अब खामियाजा हम भुगत रहे हैं। तुम्हें नहीं मालूम था कि नेता चाहे विकसित देश के हों या फिर विकासशील देश के, उनका चरित्र एक ही होता है। सौम्य, शालीन और सेवापरक। नेता कैमरे पर भले ही गुस्सा कर जाएं, किसी को कुत्ते का पिल्ला कह जाएं, भला बुरा बोलने लगें पर आम ज़िंदगी में वैसा इंसान कोई दूसरा नहीं हो सकता। तुमने यूएन में नेताओं से क्यों कह दिया था कि “हम आप पर नज़र रखेंगे।” तुम तो बोलकर निकल लिए, यहाँ झेलना पड़ गया मुंबईकर को। सात समंदर पार से तुम किसी पर क्या नज़र रखोगी।  यहाँ हमारे देश में जो लोग किसी पर नज़र रखते हैं, उनको नज़रबंद कर जेल में डाल दिया जाता है।  हमारे देश में ...

ग्रैंड सेल का एयर प्युरीफाय़र और AAREY

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रात सोने के लिए होती है। आप क्यों जागेंगे भई? और जाग भी रहे हैं तो फिर इसके लिए थोड़े न जागते रहेंगे कि शहर में क्या-क्या गलत घट रहा है। और जो देख भी लिखा गलत घटते, तो पुलिस को बुलाने के लिए थोड़े न सड़क पर घूम रहे हैं। मस्ती के लिए अंधेर में सड़क पर निकले हैं, रंग में भंग कौन डालता है। रंग में भंग डाल भी दिया तो कुछ ऐतिहासिक काम करेंगे। है की नहीं? कोई रिपोर्टर नहीं हैं जनता है। वैसे रिपोर्टर भी तो रात के अंधेरे में ड्यूटी पर झपकी ले ही लेते होंगे। पुलिसवालों का रात में सोना मान्य है। दिनभर चालान काट-काटकर थक भी जाते होंगे बेचारे।  अंधेरे में सैकड़ों पेड़ों की हत्या कर दी गई और रातभर जागने वाली मायानगरी सोती रही। या मान लो जागकर सबकुछ अंदेखा करती रही। पेड़ कट गए तो कट गए। इसमे मुंबई के लोगों की कैसी ज़िम्मेदारी? भला दिनभर के थके हारे मुंबईकर भी कटे पेड़ की तरह ही बिस्तर पर गिरते हैं। बेचारे कुछ घंटे भी न सोएं तो काम कैसे करें। अगर आप यह सोच रहे हैं कि इसके लिए महाराष्ट्र की सरकार जिम्मेदार है तो फिर से आप गलती कर रहे हैं। भई, महाराष्ट्र में इसी महीने विधानसभा का चुनाव है...