संदेश

सितंबर, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एनकाउंटर का खौफ

चित्र
दिल्ली के जामिया नगर के बाटला हाऊस में एनकाउंटर। एक तरफ दिल्ली पुलिस के दावे और दूसरी तरफ बाटला हाऊस में रहने वाले लोगों की बातें। जाहिर है दोनों में सच तो कोई एक ही है। या तो वहां से निवासी या फिर दिल्ली पुलिस। एनकाउंटर पर तमाम पत्रकार और बुद्धिजावी सवाल उठा रहे हैं। उनके पास अपने तर्क हैं। पुलिस की बात को सही मानने वाले बौद्धिक मैथुन करने वालों की भी कमी नहीं। अपनी-अपनी काबिलियत माफिक हर कोई बहस को तैयार है। चलिए दोनों पक्ष के बौद्धिक जनों की बातों को भी स्वीकार कर लिया जाए। बड़ी अच्छी बातें ऐसे लोग अपने ब्लॉग पर लिख रहे हैं। मुझे पता चला कि तमाम अखबारों और न्यूज चैनलों की मीटिंग में इन बातों पर काफी गरमा-गरम बहस हो रही है। पुलिस का पक्ष लेने वालों को बीजेपी से सीधे तौर पर जोड़ा जा रहा है और जो पुलिस के एनकाउंटर पर सवाल खड़े कर रहे हैं उन्हें वामपंथी माना जा रहा है। सुनने में आया है कि तमाम न्यूज चैनलों के न्यूज रूम में भी लोग खुलेआम पुलिस का पक्ष लेते दिख रहे हैं और मुस्लमानों को अप्रत्यक्ष रुप से सुना भी रहे हैं। कुछ बदतमीज और बेबाक लोग खुलेआम अपनी आरएसएस वाली चड्ढी दिखाने को आतुर ...

कौन लौटाएगा सिमरन की हंसी?

चित्र
शिवराज पाटिल की उम्र कितनी होगी? 73 साल के पाटिल। अपनी इस उम्र में उन्होंने अपने घर में किसी को ऐसे बिलखते देखा होगा जैसे तड़प रही है पांच साल की मासूम सिमरन। शायद नहीं। राजनीति के जिस मकाम पर पाटिल साहब हैं कम से कम उससे तो नहीं लगता। बेसहारा और लाचार मासूम की तरह क्या उनके घर में कोई कभी रोया होगा? शायद नहीं। वजह है। धनी मानी परिवार से ताल्लुक रखने वाले पाटिल को बेबसी के आंसू के बारे में क्या पता। चलिए खुदा न करे। उन्हें इस उम्र में कुर्सी के अलावा किसी और चीज के लिए बेबसी के आंसू का एहसास हो। ऐसा नहीं कि वो पार्टी अध्यक्ष के तलवे चाटना नहीं जानते। धमाकों के समय भी तीन बार कपड़े बदलना नहीं जानते। ऐसे में भी बालों में जेल(क्रीम)लगाना नहीं जानते। ऐसा नहीं कि सरेआम खुद को चमचा कहलाने में उन्हें कोई हर्ज है। इन सबके एवज में बस जो उन्हें नहीं जानना है उसके लिए बहुत ज्यादा प्रयास नहीं करते। अकसर दफ्तर में कहा जाता है। जो काम नहीं करता है वो सबसे सुकून से रहता है और उसकी तरक्की तो पक्की होती है। नेतागीरी तो फिर बिना चमचागीरी के हो ही नहीं सकती। भले लोग उसे गॉड फादर की संज्ञा दें। पर वो विशु...

प्रचंड की खुली पोल

चित्र
नेपाल के नए प्रधानमंत्री प्रचंड। माओवादियों के प्रखर और ओजस्वी नेता। ऐसा नेपाल की जनता ही नहीं माओवाद को मानने वाले भी कहते थे। नेपाल में राजशाही को जब तक खत्म नहीं कर लिया तब तक चैन नहीं लिया। प्रचंड खुद अब सत्ता में हैं। लेकिन इससे पहले वो माओवादी नेता हैं। माओवाद के सिद्धांतों को मानने वाले। पर ऐसा नहीं है। सत्ता में आते ही प्रचंड की नंगई नजर आ गई। प्रचंड बिलकुल नेताओं की तरह बात करने लगे। किससे नफा और किससे नुकसान--इसका ख्याल सबसे पहले रखने लगे। प्रचंड का भारत दौर उनके लिए काफी महत्वपूर्ण है। बड़ी वजह है। नेपाल में भारतीय कंपनियों के निवेश की गुहार लगाना। प्रचंड ने हमेशा पूंजीपतियों के खिलाफ बेखौफ आवाज उठाई। जिंदगी का एक लंबा समय जंगलों और भारत के शहरों में छुप-छुपकर बिताया। लेकिन सत्ता में आते ही खुद पूंजीपतियों को निवेश के लिए अनुरोध कर रहे हैं। देश की तरक्की हर कोई चाहता है। पर एकदम से विकास मॉडल को हाईजैक करके उसे अमल में लाने की फिलहाल जरूरत नहीं थी। बुद्धदेव भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल के रोल मॉडल मुख्यमंत्री के तौर पर उभरे। विकास के नाम पर ज्योति बाबू से ज्यादा काम किया। इसके लि...