<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664</id><updated>2012-02-16T03:44:37.465-08:00</updated><title type='text'>KHULI KITAB</title><subtitle type='html'>MY LIFE MY THOUGHTS</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>55</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-4602906845400802957</id><published>2012-02-08T02:26:00.000-08:00</published><updated>2012-02-08T07:29:27.400-08:00</updated><title type='text'>सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-4Y9-b4p9DJQ/TzKUq2XvRuI/AAAAAAAAAQ0/Yg76nQQhSew/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 216px; height: 144px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-4Y9-b4p9DJQ/TzKUq2XvRuI/AAAAAAAAAQ0/Yg76nQQhSew/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5706787141702338274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                &lt;br /&gt;उदय प्रकाश की कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ से गुजरते हुए एक बार फिर वही अहसास बड़ी सिद्धत से हो रहा है कि लेखक का एकांत किसी संन्यासी या संत का एकांत नहीं है। वह मृत्यु का एकांत है। यानी मृत्यु रचना की पूर्व शर्त है। मृत्यु के बाद ही रचना संभव होती है। कैंसर और मृत्यु के आसन्न आगमन को अतिक्रमित करने या उससे टकराने की इच्छा ही उदय प्रकाश की कविताओं और कहानियों का मूल उदगम स्रोत है। जिसे उदय प्रकाश ने लंबे अरसे तक भीतर-भीतर संजोए रखा होगा, वहीं इंस्टिंक्ट या संवेग इस कहानी में भी फूट पड़ता है। इन तमाम कहानियों में एक जो आतंरिक लय विद्यमान है उसे अब आसानी से पहचाना जा सकता है। वह जीवन जगत के जटिल अनुभवों को बिना किसी तारतम्य के कहानी में फिर से जीने की चेष्टा करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार तो ऐसा भी लगता है कि उनकी सृजनात्मकता का जो कच्चा माल है वह कमोबेश हर कहीं चाहे वह कविता हो या कहानी उसी घुटन, पीड़ा और संत्रास को हराने की चेष्टा है। मेरी भी यही समझ है कि बिना किसी एक विशेष मनोदशा के कोई कालजयी रचना संभव भी नहीं होती। हां सालजयी रचनाओं को छोड़ ही दिया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी भाषा के कवि एजरा पाउंड ने कभी कहा था—लेखक समाज का एंटिना होता है, वह हर संवेग हर तरंग हर संदेश को ग्रहण करता चलता है और उचित समय आने पर उन्हीं तरंगों को नए रूप में समाज को वापस लौटा देता है। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के लिए जिस समय अन्य समकालीन लेखक कल्पना का सहारा ले रहे थे उसी समय में उदय प्रकाश का यह मानना कि रचना के धरातल पर कोई प्रतिद्धंद्धिता नहीं होती समकालीन सर्जनात्मकता की अपनी, अपनी भूमिकाएं हैं फिर हम क्यों अपनी भूमिका भुलाकर प्राय: दूसरे के कैरेक्टर में घुसने की कोशिश करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘और अंत में प्रार्थना’ कहानी में किसी प्लाट की खोज करना, कहानी और उदय प्रकाश दोनों के साथ बेमानी ही नहीं बेईमानी भी होगी। क्योंकि सब जानते हैं उनकी कहानियों में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं। वे खालिस वास्तविकता की ऊपज हैं। अत: जो वास्तविक है उसके लिए अवास्तविक प्रमाण जुटाने की क्या जरूरत है। अवास्तविक प्रमाण से परहेज करते हुए उदय प्रकाश ठेठ वास्तविकता की हद तक पहुंच जाते हैं और उनकी तमाम रचनाधर्मिता मृत्यु का ही प्रतिकार लगती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी का प्रमुख पात्र डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर, जो कथानक से भी अधिक महत्वपूर्ण है उसे आरंभिक दौर से ही नितांत अकेला, अलग, एलिएटेड दिखाया जाता है। वही अनिवती उसका वही विस्थापन और एलिएशन पूरी कहानी में मौजूद है। क्योंकि वह विशिष्टों के लिए अवशिष्ट है और तंत्र का मंत्र नहीं समझ पाता। या फिर कह लें हठी स्वभाव का होने के नाते जानबूझकर व्यवस्था के तिलिस्म को बार-बार तोड़ना चाहता है, तो ऐसी चरित्र की यही परिणति संभावित है। बालक वाकणकर का बचपन दूसरे बच्चों से भी अलग था। वहां न कोई आवेग था न रंग। न आकार। बस सड़ता गुथता बचपन था जो भविष्य के लिए फर्मिंटेशन के बावजूद दूसरे बच्चों के सामने दीन हीन बीमार लगता था। मैं समझती हूं यहां अकेलेपन की समस्या पारस्परिक सम्बन्धों की समस्या है और साथियों से कटे रहकर वाकणकर का यह अकेलापन निर्मल वर्मा की कहानियों के चरित्रों का आइसोलेशन है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ वाकणकर की जिंदगी में आने वाले तमाम पात्र चरित्र और घटनाएं किसी भी फिल्म से बढ़कर हैं। लेकिन किसी फिल्म का हिस्सा नहीं। क्योंकि वे पेशे से डॉक्टर होते हुए भी संघ के प्रति ईमानदार प्रतिबद्ध और निष्ठावान हैं। इसी सिलसिले में हरवंश पंडित थुकरा महाराज से उनकी आत्मीयता बढ़ती है। संघ की शाखा में नियमित जाने, भारतीयता को नियमित समझने समझाने की उनकी अपनी अलग ही दृष्टि थी, जिसमें राजाराम मोहन राय, गांधी, नेहरु पाश्चात्य मानसिकता के हिंदू माने जाते हैं और उनके स्थान पर महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोलवलकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे वीर नायकों और योद्धाओं को आज के समय और समाज के लिए ज़रूरी मानते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विधानपुर से डॉ वाकणकर को डिंगर गांव तबादला कर भेज दिया जाता है। सरकारी दफ्तरों में इस तरह के गांव को ना केवल पिछड़ा, अशिक्षित, रूका हुआ, सुस्त, ठहरा माना जाता है बल्कि सजाए काला पानी के रूप में देखा जाता है। प्रधानमंत्री के दौरे से इस गांव का तथाकथित भाग्य बदलना पूरे गांव में पुलिस, सीआरपीएफ, पीएसी, तंबू छावनी, वर्दी, जीप, ट्रक, कार, मोटरसाइकिलें की भागमभाग इस कहानी का तिलिस्मी तानाबाना है। उदय प्रकाश एक साथ दो विपरीत परिस्थितियों को उभारते हैं। जहां वर्तमान में गहरे डूबकर जीना और सुंदर भविष्य के लिए सड़े वर्तमान में जीना आमने सामने रखकर अकेलेपन की समस्या को कथाकार उभारता है। मेरा मानना है कि उदय प्रकाश की सृजनात्मकता का तनाव बिंदु भी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘और अंत में प्रार्थना’ कहानी का ओर (आरंभ) तो पकड़ में आता नहीं और छोर(अंत) जैसे कुछ निश्चित सा लगता है। जो कम से कम उदय प्रकाश के पाठकों को चौंकाता नहीं। क्योंकि व्यक्ति का स्वभाव उसके लड़कपन का हठ और जिद्द मनमानी की लत आजीवन बनी रहती है। इसलिए आलोचक कह सकते हैं कि वाकणकर की कहानी की आंतरिक अनिवती ही उसकी प्रामाणिकता भी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समीक्षक के तौर पर मैं कहना चाहूंगी कि कहानी वास्तविकता से जुड़ी हो यह तो ठीक है लेकिन जीवन के सभी तथ्यों का रचना में भी उसी रूप में समावेश हो सके ऐसा कोई जरूरी नहीं। उदय प्रकाश जैसे किसी फिल्म निर्माण में जुटे हों। जहां कई फ्लैशबैक हैं। कई घटनाओं, प्रति घटनाओं का पूरा संजाल है। किंतु वे उन सब को पकड़ते छोड़ते कहानी का तयशुदा अंत पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में दे देते हैं। जिस रिपोर्ट पर सबकी नजर है। कहानी के पात्रों की भी, पाठकों की भी और समीक्षक की भी। सब उत्सुक हैं जानने के लिए कि डॉ वाकणकर इस घुटन के बाद कॉज ऑफ डेथ क्या लिखते हैं----&lt;br /&gt;“....सेरेब्रल हेड इंजुरी, प्रूव्ड फैटल, कॉज्ड बाय दि गन शॉट, टाइम ऑफ डेथ: फाइव मिनिट्स टु फोर, पी. एम...”&lt;br /&gt;इसके बाद नीचे दस्तख्त—डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दुविधा कहानी के चरित्रों और पात्रों में होगी लेकिन उदय प्रकाश के पाठकों में नहीं क्योंकि बार-बार होने वाले तबादले उनकी कर्तव्यनिष्ठा, सत्य और ईमानदारी पर मिलने वाली व्यवस्था की चोट, उन्हीं पर उनके परिवार की शंका, मित्रों और सहकर्मियों का अलगाव और प्रधानमंत्री के दौरे में डॉ वाकणकर की दृढ़ संकल्पशक्ति कहानी के अंत के लिए जिम्मेवार है। वैराग्य, निराशा, आध्यात्मिकता और असहायता जैसे बोधों को अपने में समोये हुए डॉ वाकणकर देश दुनिया में फैले तमाम रोगों का अनुसंधान करने के पश्चात जिन निष्कर्षों पर पहुंचते हैं या उनको ताउम्र कार्यान्वित नहीं कर पाने की जो विवशता झेलते हैं वहां राजनीतिक पर्यावरण के प्रदूषण की तह तक जाने का अवसर उदय प्रकाश के पाठकों को मिलता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विज्ञान और अनुसंधान से जुड़ा हुआ जब एक पढ़ा लिखा व्यक्ति उन्हीं सिद्धांतों को व्यावहारिक प्रतिफलन में लाने की कोशिश करता है तो अपने आप को असमर्थ पाता है क्योंकि पूरी की पूरी सत्ता, राजनीतिक व्यवस्था और शासन तंत्र उसे नेस्तनाबूद करने पर तुला है। प्रकारांतर से डॉ वाकणकर को अपने तर्क ज्ञान और विवेक की हत्या करने के लिए बार-बार उकसाया जाता है। ऐसे में पूरी राजनीतिक चेतना और सामाजिक दायित्व पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर  मेडिकल साइंस पर भी कटाक्ष करते हैं।  वे पेशे से डॉक्टर जरूर हैं किंतु मनुष्य के ज्ञान को प्रकृति के नाश का कारण बताते हैं। ईश्वर की परिभाषा गजब के शब्दों में की है—अफीम, मार्फिन, एस्प्रीन, एनेस्थेसिया, या ट्रैंक्वेलाइजर के रूप में ईश्वर को मानते हैं जो पीड़ा, यंत्रणा, चीख और मृत्यु को सहिष्णु बनाता है। वस्तुत: डॉ वाकणकर का बहुपठित और बहुज्ञ होना ही उऩकी दुविधा और उनकी उलझन का कारण है। नीत्शे, काफ़ को, मेडेल, डार्विन को पढ़ते-पढ़ते उनका ह्दय और मस्तिष्क जूझ रहा है। अंतत: थुकरा महाराज की मृत्यु उन्हें क़ानूनन अपराध(हत्या) और मनुष्यता हिंदू धर्म के लिए कलंक भारतीय दंड संहिता के अनुसार होमिसाइड का लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढींगर गांव में तबादले के साथ डॉ को लगने लगा था सुस्त शांत और नैसर्गिक जीवन ही असली जीवन है। क्योंकि जंगलों को उजाड़ने और बाहरी या सरकारी लोगों की दखलअंदाजी आदिवासियों को भी पसंद नहीं थी। प्रधानमंत्री के दौरे के कारण जिस विकास, चौड़ी सड़कों का प्रपंच फैलाया गया-बात एकदम साफ थी(अगर सड़कें आदिवासियों के विकास के लिए बनाई गई होती तो उनके पास सड़क पर चलने वाली कोई न कोई चीज जरूर होती, मगर ऐसा नहीं है) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढींगर गांव और उसके आस पास के इलाकों जैसे पोंडी तथा खांडा में हैजा फैल चुका था। मरने वालों की संख्या तेरह से आगे निकलती जा रही थी। गांव में पीने के पानी की व्यवस्था एक प्रदूषित तालाब से था वही पांच छह गावों की प्यास बुझाने का जरिया था। महामारी फैलती जा रही थी और डॉक्टर वाकणकर ने जब जिलाधीश एनएस खरे को पांच छह गावों में हैजा फैलने और अबतक हुई सोलह मौतों के बारे में बताया तो इसे पॉलिटिक्स बतलाकर धुत्तकारा गया। मौजूदा जो सरकारी ढांचा है वहां किसी भी प्रकार की दखलअंदाजी सरकारी नुमाइंदे बर्दाश्त नहीं करते। डॉक्टर वाकणकर की डायरी का हिस्सा चीख-चीख तक तत्कालीन सर्वग्रासी राजनीति का पर्दाफाश करता है ---‘कही ऐसा तो नहीं कि जो तंत्र या व्यवस्था यहां बनी हुई है वह अपने आप में एक समानांतर प्रणाली है, वह सिर्फ अपनी ही दुनिया की चिंताओं में व्यस्त है। शायद उसका हित ही इसमें जुड़ा हुआ हो तो लोग भूख गरीबी महामारी से मरें, कहीं हमारे देश में लोकतंत्र का असली अर्थ जनता द्वारा अपनी शत्रु व्यवस्था का चुनाव तो नहीं है'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदय प्रकाश तमाम आधुनिक विसंगतियों से निजात पाने में सफल हो जाते हैं और उत्तर आधुनिक पेंच को खोलने की कोशिश करते हैं। डॉक्टर वाकणकर पेशेवर ईमानदार बेहतर भविष्य, बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर लोकतंत्र मुहैया कराना चाहता है पर अव्यवहारिक करार कर दिया जाता है। अपने अपनों में ही पराजित, असहाय और अकेला महसूस करता है। प्रधानमंत्री का सामिप्य या साक्षात्कार किसी फैंटेसी से कम नहीं। वह पचास वर्ष के आसपास का थुलथुल सा थका हुआ आदमी भारतवर्ष का प्रधानमंत्री है जो न केवल शरीर की चर्बी से परेशान है बल्कि पुरानी कब्ज और पाइल्स का मरीज भी है। ऐसा तनावग्रस्त चिढ़ा हुआ चरित्र विशाल भू-भाग, भाषाओं, जातीयों, राष्ट्रीयताओं, पहाड़ नगरों का स्वामी थी xxxxx&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस शहरीकरण, औद्योगिकरण विकास के नारों में किस नसल का भला होने जा रहा है। भारतीय राजनीति का सौभाग्य या सर्वग्रासी शक्तियों का दुर्भाग्य, पीएम के फूड टेस्टिंग की जिम्मेदारी डॉक्टर वाकणकर एमबीबीएस एमडी द्वारा होनी थी। जो मरीज की नब्ज टटोलने वाले तथा आंखों ही आंखों में रायते, मूंग की दाल और एक दो फुल्के पर पीएम को रिझा लेते हैं। यह अपराधियों का पूरा का पूरा संयुक्त परिवार है जिसमें तांत्रिक, बंबइया एक्टर, भारतीय प्रशासन का भ्रष्ट निकम्मा रिश्वतखोर अफसर, तस्कर दलाल, बेईमान, ठेकेदार, गिरोह के हत्या, सरगना दारू, भट्टे के ठेकेदार, पत्रकार और इन सब का मुखिया प्रधानमंत्री....जो ढींगर गांव के हरे भरे आदिवासी इलाके को कारखानों के उजाड़ और विषाक्त मैदान में बदल देने के लिए आया हुआ था। सत्ताधारी छद्म जाल फैलाता है। अंगोछा पहनकर उनका माझी(दुखहरण) बनने का झूठा प्रपंच करता है और आदिवासियों को उनके घर जमीन से उजाड़कर उन्हें अंतहीन गुलामी में हमेशा के लिए झोंक देता है---सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा का पाखंड पर्व शुरू होता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर का चरणामृत कंटामिनेटेड पानी से बना है। जिसे पीकर बाईस से अधिक आदिवासी महामारी के शिकार हो चुके हैं। इस एब्सर्ड नाटक के निर्देशक, लेखक, सूत्रधार डॉक्टर वाकणकर चुपचाप भारतीय प्रशासन के इस मामूले को पुर्जे(आईएएस अफसर) के होश फाख्ता होते देख रहे थे। पर यह विशाल अंत का अत्यंत नगण्य नटबोल्ट भी नहीं रबर का एक वॉशर था जो दोनों ओर से पिसता है। पेपरमिल, आदिवासी, तांत्रिक, अपराधी, प्रधानमंत्री, तस्कर, दलाल, अफसर, नेता, पत्रकार उद्योगपति सारे चरित्रों की धज्जियां उड़ रही हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एब्सर्ड रियलिटी तो यही थी कि पीएम का भाषण बदला। जिसमें हैजा है। हैजे से मरने वाले परिवारों के प्रति संवेदना है पीएम कोष से मुआवजा है, पेयजल की व्यवस्था सरकारी कल पुर्जों की झूठी मरम्मत। कुल मिलाकर प्रशासन की ओर से जो अनिश्चितता और उत्तरदायित्व परोसी जा रही है उदय प्रकाश उसकी ओर ध्यान दिलाते हैं। वहां से विस्थापित होकर डॉक्टर वाकणकर कोतमा पहुंचते हैं। तबादले की रिपोर्ट में उन्हें न केवल संघ का संचालक बल्कि नक्सलवादी गतिविधियों का भी संचालक बताया गया----“दरअसल सरकारी नौकरशाही जिस व्यक्ति विरूद्ध कोई ठोस आपराधिक प्रकरण नहीं बना सकती या सामाजिक गतिविधियों से खुद को परेशानी में महसूस करती है उसके लिए उसने नक्सलवाद की श्रेणी बना रखी है। ”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामर्थ्य पर संदेह होने लगा। परिवार और पत्नी भी उनकी ईमानदारी लगन, मूल्य निष्ठा को उनकी मूर्खता और जिद्दीपन समझने लगी। उनके अऩुसार डॉक्टर वाकणकर ने पूरे परिवार को एक प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया है। हर कोई उनके अंत के परिणाम देखने में इच्छुक है कि आखिर वे सामूहिक आत्मघात करते हैं या पलायन या फिर तमाम सामाजिक या असामाजिक ताकतों द्वारा निगल लिए जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर वाकणकर की सारी ईमानदारी और सच्चाई विस्थापन और अस्वीकृति पाती है। “कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरा पूरा जीवन व्यर्थ चला गया।” उदय प्रकाश की इस कहानी का अंत हिंदी सिनेमा की पटकथा का अंत लगता है। कुछ और भी सोचा जा सकता था कि जैसे तंत्र और व्यवस्था का शिकार डॉक्टर पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट देने से इनकार ही कर देता। या इस दमघोंटू व्यवस्था में रिजाइन कर देता या अपने मन मस्तिष्क पर पड़ने वाले दबाव को संभाल पाता और कॉज ऑफ देथ लिखकर हस्ताक्षर करने के बाद भी इस मुर्दा लोकतंत्र में जीवित रहने का साहस करता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर वाकणकर की मौत न तो हत्या कही जा सकती है ना तो आत्महत्या। किंतु यह एक स्वाभाविक मौत तो नहीं। पाठक समाज समझ रहा है कि अपने मन और मस्तिष्क, आदर्शों और सिद्धांतों, समय और समाज की जद्दोजहद को महसूस करता हुआ एक सत्यनिष्ठ डॉक्टर व्यवस्था के क्रूर जाल में फंसकर दम तोड़ देता है। फिर उसे हत्या क्यों न कही जाए। या फिर अपने बार-बार के तबादले, एलिएशन, तंत्र की टकराहट, देश व लोकतंत्र से क्षुब्ध, नाराज मरते हुए मूल्यों को पचा न पाना आत्महत्या भी तो है। डॉक्टर की बुदबुदाहट और अंत में प्रार्थना&lt;br /&gt;      प्रणम्य शिरसा देवम् गौरीपुत्रं विनायकम्&lt;br /&gt;      भक्तावासम् स्मरेनित्येमायु: कामार्थसिद्धये....&lt;br /&gt;      xxxxxxxxxxxxx&lt;br /&gt;लंबोदमरम पंचमम् षष्ठम विकट मेव च&lt;br /&gt;सप्तमम् विध्नराजम् ध्रूमवर्णम् तथाष्टमम्&lt;br /&gt;नवम्....&lt;br /&gt;इस प्रार्थना में न कोई कंपन है न भय। किसी ठंढे धातु सी आवाज दूसरे ग्रह से आते हुई अलौकिक। प्रार्थना खत्म होते होते डॉक्टर वाकणकर फर्श पर गिर गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह उलझाव और अस्पष्टता कहानी को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने के लिए है। उदय प्रकाश पर प्राय: पाठकों की रूढ़ अभिरुचि में बाधा पहुंचाने का आरोप लगता है। उनकी कहानियों में कथानक से बड़े चरित्र हो जाते हैं वे बिना कथावस्तु का सहारा लिए आगे बढ़ने लगते हैं। उदय प्रकाश नित नए प्रयोग कर रहे हैं। यह ठीक भी है पुराने को दोहराना उचित भी नहीं। लेकिन एक समीक्षक होने के नाते मैं ये जरूर कहूंगी कि कथानक और चरित्र का तालमेल होना ही चाहिए। पाठक अपने को घटनाक्रम से कथ्य संवेद्य से जोड़ नहीं पाता तो उसकी एकाग्रता भंग होती है। सांकेतिक स्थानों पर उदय प्रकाश डाक्यूमेंटरी सा विस्तार दे देते हैं। कभी तो अपने पाठकों की समझ पर भरोसा करके देखें। कुल मिलाकर इनकी ये कहानी नौस्टेल्जिक होने से नहीं बच पाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेख जानकी पुल में भी प्रकाशित&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-4602906845400802957?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/4602906845400802957/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=4602906845400802957' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4602906845400802957'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4602906845400802957'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2012/02/1-60.html' title='सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-4Y9-b4p9DJQ/TzKUq2XvRuI/AAAAAAAAAQ0/Yg76nQQhSew/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-6885524453435170385</id><published>2012-02-07T03:00:00.000-08:00</published><updated>2012-02-07T03:00:42.396-08:00</updated><title type='text'>जानकीपुल: सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://www.jankipul.com/2012/02/blog-post_07.html?spref=bl"&gt;जानकीपुल: सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं&lt;/a&gt;:  पिछले 1 जनवरी को उदयप्रकाश 60 साल  के हो गए. मुझे बहुत आश्चर्य है कि उनकी षष्ठिपूर्ति को लेकर किसी तरह की सुगबुगाहट हिंदी में नहीं हुई...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-6885524453435170385?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/6885524453435170385/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=6885524453435170385' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/6885524453435170385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/6885524453435170385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='जानकीपुल: सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं'/><author><name>Dr. SUDHA UPADHYAYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07958361936799614500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-66HIZDfgdj4/Tq-lJ04V1xI/AAAAAAAAAEg/jX0R3CNZgRM/s220/copy.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-2435159910205190946</id><published>2011-11-20T21:48:00.000-08:00</published><updated>2011-11-20T22:43:05.900-08:00</updated><title type='text'>रॉकस्टार: गंद और जुनून की जाल में</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-9I4JUnqM4S0/TsnxK7HEZxI/AAAAAAAAAQg/oR-k94m-1is/s1600/Ranbir-Kapoor-Movie-Rockstar-Wallpapers.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 211px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-9I4JUnqM4S0/TsnxK7HEZxI/AAAAAAAAAQg/oR-k94m-1is/s320/Ranbir-Kapoor-Movie-Rockstar-Wallpapers.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5677333975245547282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इम्तियाज अली की हाल की फिल्म रॉकस्टार प्यार की परिभाषा के नए एक सूत्र को पकड़ने की कोशिश है। प्यार ऐसा जो जुनून तक इंसान को ले जाए। प्यार ऐसा जो न टाइम देखे न स्पेस। बस करना है तो करना है। इम्तियाज ने फिल्म को शुरू से जैसा संभाला वो काबिले तारीफ है। अच्छा बिल्डअप किया। हिंदू कॉलेज और स्टीफेंस के बीच जो सोसायटी का अंतर दिखाया वो भी काफी हद तक सही दिखा। जिस तरह से स्टीफेंस की हाई सोसायटी एक लड़की एकदम से हिंदू के एक ऐसे लड़के के साथ गंद करने निकल पड़ती है जिसे अंग्रेजी भी बोलनी नहीं आती, ये थोड़ा अटपटा लगा। नर्गिस को देखते हुए लगा जैसे जब वी मेट की करीना के मस्ती और बिंदास किरदार को फिर से जीवित करने की कोशिश की जा रही है और रणबीर कपूर को देखकर बैंड बाजा बारात के रणबीर सिंह की याद बार-बार आती रही। खैर, फिल्म में मस्ती या फिर कह लें गंद ने दर्शकों को अपनी तरफ खूब खींचा। मजा आया। लेकिन जैसे ही नर्गिस की शादी होती है उसके बाद से हालात ऐसे बदलते हैं कि जैसे दोनों एक दूसरे को टूटकर प्यार करते रहे हैं और अब दोनों एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते। यहां तक आने से पहले न तो ऐसी भावनाएं प्रकट हुईं न ही माहौल दिखा। शादी से पहले सबकुछ सहज और अच्छा लगा। लेकिन शादी के बाद नर्गिस को मनोवैज्ञानिक परेशानियां होने लगीं। ऐसा लगा ये स्थिति जबरदस्ती क्रिएट की गई। जाहिर है ये बात दर्शकों को खली। एक ऐसी लड़की जो शादी से ठीक कुछ महीने पहले से गंद करने लगी वो अचानक उस बात की आदि हो गई?...वो अचानक एक ऐसे प्यार में पड़ गई जिसके लिए उसके मन में पहले से प्रबल भावनाएं नहीं थी। अगर यही दिखाना था तो इम्तियाज को इस तरफ इशारा करना चाहिए था। शादी से पहले मेहंदी लगाई नर्गिस का एक बार गले मिलना बहुत कुछ कहने में असमर्थ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों का प्राग में मिलना और उसके बाद प्यार की पिंगे बढाना समझ में आता है। इससे नर्गिस मानसिक तौर पर ठीक होने लगती है एकबारगी यह भी समझ में आता है। पर समस्या अब शुरू होती है। रॉकस्टार में अपनी प्रेमिका को किस करने के लिए किसी भी हद तक जाना। अजीब लगने लगता है। प्यार और वासना के बीच एक हल्की दीवार है जो बिना जोर लगाए टूट जाती है। बस इस दीवार का बार-बार टूटना फिल्म का सबसे ढीला पहलू है। दोनों के प्यार में वो दर्द नहीं दिखा। वासना उसपर लगातार हावी रहा। माना जाता है कि कलाकार दिमाग से ज्यादा दिल से सोचता है। लेकिन एक कलाकार समाज में रहता है और इज्जत और शोहरत में समाज की भूमिका है इसे नहीं भूलता। क्या ये प्यार सलमान का प्यार तो नहीं? जो ऐश्वर्या से संबंध टूटने के बाद आक्रोश के चरम पर था।यहां से फिल्म ऊबाउ होने लगती है। एक मरन्नासन लड़की को जीवित करने के लिए किस करने का बहूदा सीन हैरान करता है। रोमांटिक फिल्में बनाने वाले इम्तियाज को इतनी समझ तो है कि प्यार नई जिंदगी दे सकता है पर ऐसी हरकत घिनौनी लगती है। एक कलाकार का प्यार सिर्फ किस करने तक सीमित रहता है ऐसा नहीं है और एक कलाकार का आक्रोश उसकी कला में निकलता तो ज्यादा अच्छा लगता। पर हर कदम पर मारपीट अजीब लग रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म में कुछ तथ्यात्मक गलतियां भी हैं। एक शख्स जब दूसरे देश की जेल में सजा काट चुका है तो फिर बकायदा पुलिस के साथ उसे अपने देश भेजना भी हास्यास्पद लगा। प्रत्यर्पण तो तब होता है जब किसी शख्सने गुनाह कहीं और किया और गिरफ्तार किसी और देश में हुआ। लेकिन जिस कदर रॉकस्टार को भारत लाया गया उसको देखकर मन खटकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-kw6qRtX6IS4/Tsnw9yYOpqI/AAAAAAAAAQU/_ca5gyaKTws/s1600/210457xcitefun-ranbir-kapoor-rockstar-2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 290px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-kw6qRtX6IS4/Tsnw9yYOpqI/AAAAAAAAAQU/_ca5gyaKTws/s320/210457xcitefun-ranbir-kapoor-rockstar-2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5677333749563303586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाने फिल्म की जान हैं पर जब प्रोमो आया था और साडा हक वाला गाना दिखाया जाता था तो लगता था रॉकस्टार ने कुछ ऐसा कर दिया जिससे पंजाब से लेकर कश्मीर तक के लोगों को झकझोर दिया हो। पर फिल्म में उस गाने का संदर्भ एकदम असर नहीं छोड़ता। एक प्यार करने वाली लड़की अगर अपने प्रेमी के साथ नहीं आना चाहती है तो इसमें अधिकार की बात क्या है और इसे कैसे साबित किया जा सकता है? इसमें पंजाब कश्मीर को लाने का क्या मतलब।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है गाने को संदर्भ के हिसाब से रखा जाता तो इसके नए मतलब निकलते। रहमान का संगीत और मोहित की आवाज ने चार चांद लगाया है। पर एक बात मैं जरूर कहूंगा---ऐसा नहीं कि रहमान ने सूफी संगीत के लिए संगीत नहीं दिया है। रहमान ने जोधा अकबर और दिल्ली 6 में शानदार सूफी गाने बनाए। लेकिन इस फिल्म का सूफी गाना उन दोनों के मुकाबले कमजोर है। जितना अच्छा सूफी गाना बन सकता है वैसा कतई नहीं बन पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तस्वीरें-सौजन्य फिल्म रॉकस्टार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-2435159910205190946?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/2435159910205190946/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=2435159910205190946' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/2435159910205190946'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/2435159910205190946'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='रॉकस्टार: गंद और जुनून की जाल में'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-9I4JUnqM4S0/TsnxK7HEZxI/AAAAAAAAAQg/oR-k94m-1is/s72-c/Ranbir-Kapoor-Movie-Rockstar-Wallpapers.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-83551579048121918</id><published>2011-08-02T01:32:00.000-07:00</published><updated>2011-08-02T01:47:53.020-07:00</updated><title type='text'>भाव शून्य समाज में पदार्थ की महत्ता</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-y7JkRST1FYw/Tje5mqLQLYI/AAAAAAAAACw/jHEfNry4HKc/s1600/EMOTIONLESS.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 197px; FLOAT: left; HEIGHT: 255px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5636177532485119362" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-y7JkRST1FYw/Tje5mqLQLYI/AAAAAAAAACw/jHEfNry4HKc/s320/EMOTIONLESS.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इस दौर में जब बार-बार कला के अनुशासनों पर प्रश्न चिन्ह उठ रहा हो तो संवेदनशील ह्दय कराह उठता है। अफसोसजनक है नितांत कलाप्रिय समाज में भारतीय जन मानस में विज्ञान और वाणिज्य की बार-बार स्थापना और कला को नकारना जैसे इस युग की विवशता हो चुकी है। कला की समाज में घटती महत्ता ने पूरे साहित्य समाज को गहरे असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया है। हम सब जानते हैं कला भाव को समृद्ध करती है वहीं विज्ञान और वाणिज्य पदार्थ को। यद्यपि समाज में भाव और पदार्थ दोनों की आवश्यकता है लेकिन भाव की प्रधानता से जहां समाज का ढांचा मजबूत होता है वहीं पदार्थ की प्रधानता से सह्दय समाज की संवेदना शून्य हो जाती है। इस पदार्थ आधारित घोर वैज्ञानिक युग में हर कोई रोटी कपड़ा और मकान की जद्दोजहद में व्यस्त है। ऐसे में जीवन के समक्ष और सह्दय समाज के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भाषा साहित्य और संस्कृति को लेकर है। शिक्षा का उद्देश्य जीवन के स्थूल और सूक्ष्म रूप को जानना और समझना है और आज हम केवल स्थूल रूप को संचालित कर रहे हैं। मानों जीवन की आंतरिक लय और धुन(कला) को भूलते जा रहे हैं। क्या ये सही है? &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-83551579048121918?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/83551579048121918/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=83551579048121918' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/83551579048121918'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/83551579048121918'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='भाव शून्य समाज में पदार्थ की महत्ता'/><author><name>Dr. SUDHA UPADHYAYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07958361936799614500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-66HIZDfgdj4/Tq-lJ04V1xI/AAAAAAAAAEg/jX0R3CNZgRM/s220/copy.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-y7JkRST1FYw/Tje5mqLQLYI/AAAAAAAAACw/jHEfNry4HKc/s72-c/EMOTIONLESS.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-4458397561062712523</id><published>2010-09-14T15:54:00.000-07:00</published><updated>2010-09-18T16:02:12.728-07:00</updated><title type='text'>सामाजिक परिवर्तन के नए स्रोत</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/TJHGYxhDFGI/AAAAAAAAAOQ/w6I9ce89fco/s1600/sir2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 84px; height: 93px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/TJHGYxhDFGI/AAAAAAAAAOQ/w6I9ce89fco/s320/sir2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5517409147416679522" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर(प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी--पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग...दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रख्यात समालोचक) के साथ यह बातचीत इस दशक में प्रकाशित उपन्यासों में लगातार बदलते चरित्रों और उनका सामाजिक परिवर्तन के स्रोत को ध्यान में रखकर की गई है।  &lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;सुधा-- सर, अब इतनी विवेचना के बाद, तमाम उठा-पटक और जांच पड़ताल के बाद हम वास्तविक राजनीति किसे कहें? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर--- वस्तुत: सामाजिक परिवर्तन के नए स्रोतों से उभरी हुई राजनीति ही वास्तविक राजनीति है। मोटे तौर पर इसके दो प्रमुख स्रोत हैं---(1) समाज का दलित वर्ग और (2) स्त्री वर्ग।  ये दोनों स्रोत समाज के सबसे अधिक दलित, शोषित समुदाय है। इनमें परिवर्तन करते हुए सामाजिक संरचना का बदलाव या सामाजिक संरचना में बदलाव लाना यदि शुरु होता है तो राजनीति का वास्तविक रुप यही होगा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा— सर, इन दोनों स्रोतों को अपने-अपने हित में हथियाने की राजनीति भी तो हो सकती है?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर-- हां, ऐसा देखा गया है कि दलित औऱ स्त्री इन दोनों स्रोतों का इस्तेमाल केवल राजनीतिक सत्ता पाने के लिए किया जाए तो वह राजनीतिक पाखंडपूर्ण हो सकती है। मुख्यरुप से सामाजिक परिवर्तन और नई सामाजिक संरचनाओं का उभार और उससे उत्पन्न नए राजनीतिक तर्क यदि पैदा हो सकते हैं तो दोनों ही राजनीति और समाज के नए स्रोत जीवन को नई दिशा दे सकते हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा— सर, दीर्घकालीन राजनीति क्या होती है? मतलब यह कि सत्ता समीकरण से परे जिस प्रकार की राजनीति की आज सर्वाधिक ज़रूरत है उसे कैसे पहचाने ?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर-- देखो, जैसे आरक्षण का जो ये मुद्दा है—पिछड़े वर्ग का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा उच्च शिक्षा पर अपनी मांग कर रहा है। ये नई सामाजिक संरचना है। जिसमें ओबीसी(अदर बैकबर्ड क्लास) जो अपेक्षाकृत अपने को अधिक पिछड़ा समझ रहे हैं वे उच्च शिक्षा और उच्च पदों के लिए मांग कर रहे हैं तो एक प्रकार का उद्वेग समाज में बढ़ रहा है। मैं मानता हूं कि कुछ प्राकृतिक परिस्थितियां आती हैं, आयेंगी, किंतु इस समस्या के भीतर से ही परिवर्तन होते हुए एक नया सामाजिक सूत्र निकल सकता है। दरअसल सामाजिक स्तर पर, देश स्तर पर उसको एक दिशा में ले जाना ज़रूरी है। यह केवल सत्ता समीकरण के लिए किया गया तो लक्ष्यच्युत हो जाएगा। दीर्घकालीक राजनीति के लिए इसे राजनीतिक, सामाजिक दर्शन को मानवीय मूल्यों के हक में देखना होगा तभी नए मानवीय मूल्य पैदा होंगे और उससे एक इनर सेल्फ यानी ‘आंतरिक आत्म’ भी विकसित होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा— सर, इनर सेल्फ क्या है ? और यह मध्युगीन आंतरिक आत्म से कैसे अलग है?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर-- देखों, आत्मबोध का प्रयोग मनुष्य की आंतरिकता के लिए प्राय: प्रयोग किया जाता रहा है। किंतु यह कोई मध्ययुगीन आत्म का रूप ना होकर यह सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक आत्म है। आज ऐतिहासिक प्रक्रिया में यह परिवर्तनशील है। दूसरी तमाम प्रक्रियाओं, संघर्षों, द्धन्द्धों के भीतर से अर्जित किया जाता है। यह आंतरिकता की बिलकुल नई व्याख्या है जो अस्तित्वाद से बिलकुल अलग है। अस्तित्ववाद का आत्म भले ही पकड़ में नहीं, परिभाषित नहीं हो पाता, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। ऐसे ही अनडिफाइंड आंतरिकता भले ही भौतिक जैविक ढांचे में सही ठहरे पर बड़ा ही रहस्यमय, सूक्ष्म और वायवी लगता है। हम जिस आत्म की बात कर रहे हैं ऐतिहासिक तौर पर यदि कोई युग इस आंतरिकता को पाने में अपनी भूमिका नहीं निभाता तो युग की तमाम उपलब्धियां नगण्य होंगी। ठीक इसी प्रकार संघर्ष करता हुआ व्यक्ति चरित्र यदि अपनी भूमिका भुला देता है तो वह भी अपने इस आंतरिक आत्म से साक्षात्कार नहीं कर पाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा— सर, तमाम सफल राजनीतिक चरित्रों में यह आंतरिक आत्म सदैव विद्यमान रहा होगा ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर-- चाहे वह इनडिविजुअल या सामाजिक समूह हो, दोनों को ऐतिहासिक प्रक्रिया में संघर्ष करते हुए परिस्थितियों से जूझते हुए अपना ‘इनरसेल्फ’, ‘इनर पॉवर’ अर्जित करना होता है। विजयदेव नारायण साही ने इसी आंतरिक आत्म का उल्लेख करते हुए गांधी जी पर लिखा है---“साउथ अफ्रीका से गांधी जब भारत आए तो गुलामी की यातना भोगे हुए गांधी राजनीतिक गुलामी और सभ्यताओं के नस्लवाद की ठोस मार खा चुके थे जिसके छाप गांधी पर विद्यमान थे। किंतु ये ठोस वास्तविकताएं भी गांधी के मन पर सामान्य मनुष्यता को इन सबसे उपर ठहराती थी। जब गांधी ने कहा था---‘मैं सत्य के लिए सारे भारत को अरब सागर में डूबो सकता हूं’---- तो उनका सत्य वृहत्तर था। जिसमें सत्य की लड़ाई राष्ट्रीयता, भारत वर्ष की स्वाधीनता और सार्वभौमिक मनुष्यता—जो किसी राष्ट्र के घेरे में नहीं आती---से था।” गांधी के मन में अपने संघर्षों को लेकर एक क्रम बना हुआ था। जिसमें गरीबी, गुलामी, उपनिवेशवाद, नस्लवाद –इन सबसे संघर्ष तो था ही लेकिन सामान्य मनुष्यता सबसे बड़ी चीज है और अगर इस संघर्ष में वृहत्तर मनुष्यता, सार्वभौम मनुष्य भाव पर कहीं चोट पहुंचती है तो गांधी सारी लडाई को अरब सागर में डूबो देंगे। क्योंकि गांधी के लिए जो सत्य था वह कई तरह के उद्वेगों से बना हुआ सत्य था। वह केवल ईश्वरीय सत्य नहीं था। एक ठोस तथ्य के रुप में जो औपनिवेशिक गुलामी, गरीबी, नस्लवाद से लड़ने का एक ऐतिहासिक ठोस तथ्य इस सत्य में विद्यमान था। जिसका पूरा दबाव गांधी के मन पर था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा— तो क्या आंतरिक आत्म को ही विजयदेव नारायण साही ने अंतर्ध्वनि कहा है ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर-- नहीं थोड़ा समझने की बात है। साही के अनुसार जब गांधी कहते हैं---- “मैं क्षितिज के पार सत्य वह देख रहा हूं। तो यह क्षितिज के पार वही ‘इनर वॉयस’ (अंतर्ध्वनि) थी जो इतिहास के ठोस तथ्य से टकराते हुए निकलती थी। यानी अंतर्ध्वनि के स्वर पर इन ऐतिहासिक ठोस तथ्यों का पूरा दबाव दिखलाई पड़ता है और इस “अंतर्ध्वनि” का मिजाज इन्हीं स्थितियों से निर्मित होता है। यह नई आंतरिकता अपनी पुरानी आध्यात्मिकता की भिनभिनाहट भी लिए हुए है लेकिन इसकी दिशा अलग है—रहस्यवादी नहीं है। छायावादी कवियों ने इस भिनभिनाहच को सुना और इस आंतरिक लय को बखूबी व्यक्त भी किया। कई अच्छी राष्ट्रवादी कविताएं लिखी गईं। जैसे दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त आदि के द्वारा। पर इनमें गांधी के ऊपरी रुप का उल्लेख भर ही था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा-- सर, इस आंतरिक आत्म को अनुभव करने में या पाने में जो वर्तमान राजनीतिक सामाजिक संघर्ष है, कितनी दूर तक हमारा साथ देते हैं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर--- देखो, दरअसल वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष इस आंतरिक आत्म को कितनी गहराई से व्यक्त कर पाते हैं इसी पर हमारे साहित्य की गहरी संरचना निर्भर करेगी। तो चरित्रों के निर्माण और चरित्रों के व्यापार या कहें चरित्रों की भूमिकाएं इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा-- आमतौर पर उपन्यासकार परिस्थितियों के अंतर्विरोधों को कभी व्यंग्य में प्रस्तावित करता है कभी दिशा की ओर सचेत भी करता है, जहां इनरसेंस आंतरिक आत्मबोध होता है या इनरसेंस को प्रस्तावित भी करता है। तो क्या ये नए सामाजिक संघर्ष उसी आंतरिक आत्म को संबोधित होने चाहिए? क्योंकि यही मनुष्य और उसके साहित्य के लिए उपयोगी होगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर--- बिलकुल, हम स्पष्टत: देखते हैं कि तमाम उत्कृष्ट कहानियों और उपन्यासों में वे जाति, सम्प्रदाय और स्थानीयता की आलोचना ही मिलती है। क्योंकि कोई भी उपन्यास जो विशेषत: जाति और संप्रदाय को लेकर लिखा गया है वह स्थायी असर नहीं छोड़ पाता। आमतौर पर साहित्य की तमाम विधाएं, जाति, संप्रदाय और स्थानीयता के लिए प्रतिरोध का स्वर बराबर इनरसेल्फ की ओर ले जा रहा है। लोग यह अब जानने समझने लगे हैं कि यही तीन इनरसेल्फ को तोड़ने और घटाने के लिए उत्तरदायी हैं। इसलिए तमाम उत्कृष्ट रचनाओं में यह प्रतिरोधी स्वर विद्यमान है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-4458397561062712523?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/4458397561062712523/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=4458397561062712523' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4458397561062712523'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4458397561062712523'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='सामाजिक परिवर्तन के नए स्रोत'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/TJHGYxhDFGI/AAAAAAAAAOQ/w6I9ce89fco/s72-c/sir2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-6615115102782026617</id><published>2010-08-07T23:05:00.000-07:00</published><updated>2010-08-08T12:41:19.139-07:00</updated><title type='text'>'मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा'</title><content type='html'>कुछ तो होगा&lt;br /&gt;कुछ तो होगा&lt;br /&gt;अगर मैं बोलूंगा&lt;br /&gt;न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का &lt;br /&gt;मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा&lt;br /&gt;टूट मेरे मन टूट&lt;br /&gt;अब अच्छी तरह टूट&lt;br /&gt;झूठ मूठ मत अब रूठ---रघुवीर सहाय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहाय जी ये पंक्तियां ज़िंदगी के लिए रामबाण की तरह है। सत् प्रतिशत मन को शांति मिलती है। अगर ध्यान से पढ़ें और अमल करें तो कम से कम मन की परेशानियां तो ज़रूर दूर होती हैं। लेकिन दिक्कत ये है कि लोग जानने समझने के बाद भी कुछ नहीं बोलते। मुक्तिबोध हमेशा ऐसे लोगों के खिलाफ लिखते रहे। पाश ने कहा था-बीच का रास्ता नहीं होता। बस सच यही है अगर ग़लत है तो ग़लत और सही है तो सही। पर लोग कहां ऐसा करते हैं। &lt;br /&gt;अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-6615115102782026617?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/6615115102782026617/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=6615115102782026617' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/6615115102782026617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/6615115102782026617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='&apos;मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा&apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-4597829619504982824</id><published>2010-07-18T00:49:00.000-07:00</published><updated>2010-07-18T01:07:27.024-07:00</updated><title type='text'>ए महाराज कौन किसको बदलता है ?</title><content type='html'>मुझे याद नहीं कि बदलते हालात में कौन किसको बदल रहा है---वक्त ने हमें बदला है या हम हालात के मारे हैं। कुछ तो ऐसा हो गया है जिसे देखकर पहले हमारे और आपके जेहन में खून खौलने लगता था अब उसे इग्नोर माकर आगे चल देते हैं। जिसके लिए पहले हम घंटों मशक्कत करते थे अब उसपर ध्यान भी नहीं देते। लगता है कौन किसके लिए करता है। अगर मेरे साथ ऐसा हो जाएगा तो कौन आएगा सामने। बस हम निकल जाते हैं उससे आगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल की बात है। सड़क पर एक बाइक वाले का एक्सिडेंट हुआ। दर्द से कराहता रहा। लोग आसपास से गुजरते रहे। पर किसी ने रूककर उसे उठाने की जहमत नहीं ली। मैं भी उन्हीं में से एक था। ऑफिस जाने में पहले से ही देर हो गई थी। और फिर ये भी लगा कि अगर यहां रूक जाऊंगा तो बॉस को लगेगा नए तरीके का एक और झूठ। आखिर क्या करत। गाड़ी वहां से ऐसे निकाली जैसे मैंने कुछ नहीं देखा। कमोबेश हम सब की यही हालत है। हम तमाम तरह की बड़ी बातें करते हैं। तमाम बड़े विषयों पर ब्लॉग लिखते हैं। बुद्धिजीवी कहलाते हैं पर सब दिखावा। मुफ्त में ज्ञान देने का अवसर मिले तो न जाने कितने समय होते हैं हमार पास। पर जब किसी की मदद के लिए समय निकालने की बात की जाए तो हर कोई एक दूसरे से ज्यादा व्यस्त है। व्यस्तता इतनी कि अगर वो मदद करने में जुट जाएगा तो दुनिया भर के लोग आज सांस नहीं ले पाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुनहगार जाहिर तौर पर हम हैं। पर क्या हालात हमारे ऐसे हैं कि हम गुनहगार होते जा रहे हैं या फिर हम आलसी, संकीर्ण और परम स्वार्थी होते जा रहे हैं। क्या आपके साथ भी ऐसा ही होता है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-4597829619504982824?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/4597829619504982824/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=4597829619504982824' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4597829619504982824'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4597829619504982824'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='ए महाराज कौन किसको बदलता है ?'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8068572903065943969</id><published>2010-03-09T23:23:00.000-08:00</published><updated>2010-03-10T00:22:57.213-08:00</updated><title type='text'>हुसैन और तसलीमा में फर्क़</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/S5dWuf3vZyI/AAAAAAAAAIs/34WJ5ixhB6M/s1600-h/HUSSAIN.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 233px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/S5dWuf3vZyI/AAAAAAAAAIs/34WJ5ixhB6M/s320/HUSSAIN.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5446917631157167906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मकबूल फिदा हुसैन कलाकार हैं। तसलीमा नसरीन भी कलाकार हैं। हुसैन का जन्म भी मुस्लिम परिवार में और तसलीमा का भी मुस्लिम परिवार में जन्म। लेकिन हुसैन साहब भारत को अलविदा कह गए और तसलीमा भारत को अपना दूसरा घर मानती हैं। दोनों में भारत को लेकर जो नजरिया है उसमें आसमान ज़मीन का अंतर है। दोनों में सबसे बड़ा मानसिकता का है। हुसैन के लिए अगर कोई ये कहता है कि कलाकार को आज़ादी मिलनी चाहिए और उसे उसकी इच्छाशक्ति के आधार पर काम करने देना चाहिए। इस तर्क से मैं कतई सहमत हूं। जाहिर है अगर कलाकार प्रगतिशील है तो वो समाज और समय को कुछ ऐसा देने की कोशिश करेगा, जिससे आम जनता को भी फायदा हो। हुसैन कितने प्रगतिशील रहे हैं ये तो शायद वही जानते होंगे पर अकसर जब वो हिंदू देवियों के जिस्म को अपनी तस्वीर में जगह देते हैं तो उनके कपड़े उतरने लगते हैं। याद रहे हुसैन ने शायद ही कभी किसी और धर्म के साथ खिलवाड़ किया हो। मुस्लिम धर्म से खिलवाड़ की तो उनकी हिम्मत ही नहीं। उन्हें पता है अगर वो ऐसा करेंगे तो मोटे पैसे वाले गल्फ देशों के शेख उनकी तस्वीरों की मुंह मांगी कीमत कैसे देंगे। जाहिर है हुसैन पहले मधुबाला और बाद में माधुरी की सुंदरता पर ऐसे ही नहीं मर मिटते रहे। कलाकार सुंदरता का पुजारी है..माना। पर एक खास धर्म को लगातार नंगा करने की आदत सोची समझी साजिश है। मैं खुद प्रगतिशील हूं। पर हुसैन का भारत छोड़ना मुझे कतई गलत नहीं लगा। न ही मैं हुसैन के समर्थन में आवाज उठाउंगा। हालांकि मेरी आवाज उठाने से क्या फर्क पड़ेगा पर वैचारिक तौर पर हुसैन का समर्थन अब नहीं। दरअसल हुसैन को इस उम्र में भी पैसे की ललक ज्यादा है। मैं सवाल पूछता हूं---क्या अमिताभ बच्चन के खिलाफ राज ठाकरे ने आंदलोन किया तो उन्होंने मुंबई छोड़ने का फैसला कर लिया? क्या शाहरुख खान के बयान के बाद शिवसेना ने इतना बवाल किया तो क्या शाहरुख ने मन्नत छोड़ दिया और दुबई जाकर बस गए? जब सुप्रीम कोर्ट ने हुसैन को पूरी सुरक्षा देने का वादा किया तो फिर वो भारत क्यों नहीं लौटे? ये सारे ऐसे सवाल हैं जिसका हुसैन के पास कोई जवाब नहीं है। हाल ही में एनडीटीवी 24x7 पर बरखा दत्त के साथ इंटरव्यू में हुसैन ने कहा कि वो बड़ा काम करना चाहते थे। उसके लिए स्पांसर मिल गया। कतर के लिए अरब सभ्यता पर चित्रकला बनाने का काट्रैक्ट मिल गया। किसी स्पांसर के लिए भारतीय सभ्यता की तस्वीरें किसी दूसरे के लिए बॉलीवुड पर तस्वीरें बनाएंगे। गौरतलब है कि कुछ समय पहले हुसैन साहब के बेटे ने एक साक्षात्कार में कहा था कि आर्थिक दृष्टि से हुसैन साहब को भारत से ज्यादा विदेशों में लाभ है। भारत में उनकी करोड़ो रुपए की महंगी कलाकृतियों को खरीदने की क्षमता वाले मॉर्डन आर्ट के प्रशंसकों की संख्या काफी कम है जबकि विदेशों में इन कलाकृतियों की कीमत भी ज्यादा लगती है और मांग भी ज्यादा है।&lt;br /&gt;  &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/S5dVxbM53vI/AAAAAAAAAIk/7fo9MatGxBM/s1600-h/TASLIMA.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 228px; height: 243px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/S5dVxbM53vI/AAAAAAAAAIk/7fo9MatGxBM/s320/TASLIMA.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5446916581931736818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अब जरा तसलीमा नसरीन को देखिए। तसलीमा ने हुसैन के लिए लिखा है---"हुसैन के सरस्वती की नंगी तस्वीर बनाने को लेकर भारत में विवाद शुरु हुआ तो मैं स्वाभाविक तौर पर चित्रकार की स्वाधीनता के पक्ष में थी। मुसलमानों में नास्तिकों की तादाद बहुत कम है। मैंने हुसैन के चित्रों को हर जगह से खोजकर देखने की कोशिश की कि हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म, खासकर अपने धर्म इस्लाम को लेकर उन्होंने कोई व्यंग्य किया है या नहीं। लेकिन देखा कि बिलकुल नहीं किया है। बल्कि वे कैनवास पर अरबी में शब्दश: अल्लाह लिखते हैं। मैंने यह भी स्पष्ट रुप से देखा है उनमें इस्लाम के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास है। इस्लाम के अलावा वे किसी दूसरे धर्म में विश्वास नहीं करते। क्या वे मोहम्मद साहब को नंगा चित्रित कर सकते हैं? (जनसत्ता, 28 फरवरी 2010) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है तसलीमा के इस वक्तव्य से साफ है कि हुसैन को कतर में कोई दिक्कत क्यों नहीं होगी। आप बताएं दोनों बड़ा कौन है? तसलीमा हर हाल में ज्यादा हुसैन से बहुत ज्यादा प्रगतिशील है। मैं इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि वो हमारी संवेदनाओं में स्वर मिला रही है। बल्कि इस लिए कि वो कला को समाज का दर्पण मानती है। हुसैन की तरह नहीं जो ये मानते हैं कि कला समाज के लिए नहीं, बल्कि समाज कला के लिए होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8068572903065943969?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8068572903065943969/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8068572903065943969' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8068572903065943969'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8068572903065943969'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='हुसैन और तसलीमा में फर्क़'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/S5dWuf3vZyI/AAAAAAAAAIs/34WJ5ixhB6M/s72-c/HUSSAIN.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-9008718224466818604</id><published>2010-02-22T22:00:00.000-08:00</published><updated>2010-02-22T22:19:48.028-08:00</updated><title type='text'>बिंदास का इमोशन अत्याचार</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/S4NvHs4A8II/AAAAAAAAAH4/UBbFi558PqM/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 131px; height: 98px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/S4NvHs4A8II/AAAAAAAAAH4/UBbFi558PqM/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5441314952889561218" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंटरटेनमेंट टीवी बिंदास वाकई बिंदास है। उस पर इन दिनों एक खास शो बड़ा पॉपलर है। इमोशनल अत्याचार। शब्द भले ही अनुराग कश्यप की फिल्म देव डी के गाने से लिया गया हो पर इसमें दिखाई जाने वाली कहानी बिलकुल अलग कलेवर की है। अगर आपको अपनी प्रेमिका या अपने प्रेमी पर शक है तो बिंदास टीवी के पास आपका इलाक है...वो अपने अंडर एजेंट जो पेशेवर तौर पर प्यार का नाटक कर आपकी गर्ल फ्रेंड के पास जाएंगे उसे रिझाने की कोशिश करेंगे अगर आपकी गर्लफ्रेंड उसकी शक्ल सूरत और बिंदास की तरफ से मुहैया कराई गई गाड़ी पर रिझ गईं तो फिर समझिए आप कम से कम अपनी इस गर्ळ फ्रेंड के साथ आगे की जिंदगी की प्लानिंग नहीं कर सकते। नाटकीय तरीके से तीन चार स्पाई कैम से शूट कर वो सारी चीजें दिखा जाते हैं जिसे देखने के लिए अकसर आदमी टीवी देखता है। कम कपड़े, चूमते चाटते सीन और फिर गंदी बातें। और शो के आखिर में एक सीन जरूर ऐसा आता है कि अजीब इत्तेफाक से अचानक दूसरे के प्यार में पागल हो गए प्रेमी या प्रेमिका उसी बिल्डिंग में होते हैं जहां स्टूडियो होता है और जहां पर बिठाकर एक शख्स को उसके दोस्त की असलियत का पर्दाफाश किया जाता है। &lt;br /&gt;बिंदास टीवी ने पैसे खर्च कर, म्यूजिक इफेक्ट और वीडियो इफेक्ट के साथ रोचक बनाने की कोशिश करता है। एंकर गलत और तथ्यहीन आंकड़े लगातार पेश करता है पर मेरा एक सवाल है----लेकिन क्या टीवी शोज़ का ये चरम है? क्या हमें मान लेना चाहिए कि बस अब ब्लू फिल्म दिखाया जाना बाकी रह गया है। सूचना प्रसारण मंत्रालय जहां मीडिया की नकेल कसने के लिए इतने सारे सर्कुलर लगातार भेजता है क्या उसे बिंदास का ये शो नजर नहीं आता। सूचना प्रसारण को कलर्स के सीरियल में  बच्चों की एक्टिंग पर एतराज है लेकिन सरेआम सेक्स परोसने और भद्दे औऱ भौंडे तरीके से कहानी बनाकर पेश करना नजर नहीं आता। क्या टीवी को स्वस्थ बनाने की मुहिम जारी है या फिर बच्चों को कम उम्र में सयाना बनाने की। &lt;br /&gt;इन सबसे से बड़ा सवाल ये है कि अगर इनमें से कोई भी लड़का या लड़की सुसाइड करता है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। बिंदास की, समाज की या फिर सूचना प्रसारण मंत्रालय की। जानकारी ऐसी भी मिली है कि ये पूरा शो योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है। सिर्फ दर्शकों को गरमा गरम मसाला पेश करने के लिए ऐसे प्रेमी प्रेमिका को लिया जाता है जो इस तरह अफने संबंध को दिखा सकें और बदले में पैसे ले सकें। अगर ऐसा है तो फिर टीवी शो किस तरह का मैसेज देने की कोशिश कर रहा है। पुरुष और महिलाओं में शक की मात्रा ज्यादा करने की कोशिश या फिर जो घर तबाह हो रहा है उसे और बर्बाद करने की कोशिश। वाकई समाज का ये कौन सा रुप है जो बिंदास टीवी पर बड़े बिंदास अंदाज में कर रहे हैं इमोशन अत्याचार।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-9008718224466818604?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/9008718224466818604/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=9008718224466818604' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/9008718224466818604'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/9008718224466818604'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='बिंदास का इमोशन अत्याचार'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/S4NvHs4A8II/AAAAAAAAAH4/UBbFi558PqM/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8130451498924999984</id><published>2010-01-01T21:41:00.000-08:00</published><updated>2010-01-01T22:27:19.274-08:00</updated><title type='text'>क्या सचमुच कविता एक सैल्फिश विधा है ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sz7mtl51XaI/AAAAAAAAAHw/7L4bJ3qfiAM/s1600-h/hindi_language.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 198px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sz7mtl51XaI/AAAAAAAAAHw/7L4bJ3qfiAM/s320/hindi_language.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5422024672343842210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हंस के नवंबर अंक के संपादकीय में राजेंद्र यादव लिखते हैं-"कविता की सारी संभावनाएं निचोड़ी जा चुकी हैं। वहां नया करने के लिए कुछ भी नहीं। सामान्यीकरण की प्रक्रिया में अपने असली व्यक्तिगत को छिपाया जा सकता है। कविता एक सैल्फिश विधा है। कविता में स्रोत और संदर्भ आप स्वयं होते हैं। और उम्मीद करते हैं कि पाठक आपके कहे के साथ साधारणीकरण कर ले।" माफ कीजिएगा राजेंद्र जी, मैं आपके इस तर्क से असहमत हूं। मेरी छोटी सी बुद्धि तो इतना ही समझ पायी है कि कविता जैसी लोकतांत्रिक विधा ना तो जन्मी है ना जनमेगी। वह पर्सनल तो कतई नहीं होती। वह उतनी ही सामूहिक या कह लें सामाजिक जितनी की इस दौर की कहानियां। आपने शायद कविता की धार को अपने जीवन में अनुभव ही नहीं किया। गनीमत है गद्य के बहाने कहानी को कम करके नहीं आंका। कहानी तो तर गई आपके इतना भर कह देने से कि 'गद्य' में संदर्भ 'दूसरे' होते हैं। अपने को अपने आप से तोड़कर दूसरों में घुलाना पड़ता है और व्यापक सामाजिक संबंधों के माध्यम से अपनी बात कहनी पड़ती है। राजेंद्र जी शायद आप इधर कुछ नया नहीं पढ़ रहे वरना इधर जो नई कविताएं लिखी जा रही हैं उनमें आपको स्व नहीं दिखाई पड़ता। इतने बड़े पाठकीय मंच पर से ऐसा अनर्गल प्रलाप आपको शोभा नहीं देता। मेरा अनुरोध है इन सभी नए कवियों से जो इधर लगातार सार्थक लिखते रहने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। वो हंस को इसका करारा जबाव दें। हमेशा चुनौती देते रहने की आदत इस बार राजेंद्र जी को महंगी पड़ सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  मन पीटो सपने जोड़ो&lt;br /&gt;          अपनी घुटन समेटो&lt;br /&gt;  उनींदी घड़ियों में &lt;br /&gt;  उसे बो आओ&lt;br /&gt;  जब पक कर खड़ी हो जाए फसल&lt;br /&gt;  बांट दो बूरा-बूरा चूरा-चूरा&lt;br /&gt;  ऐसे ही होता है सृजन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा उपाध्याय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8130451498924999984?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8130451498924999984/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8130451498924999984' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8130451498924999984'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8130451498924999984'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='क्या सचमुच कविता एक सैल्फिश विधा है ?'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sz7mtl51XaI/AAAAAAAAAHw/7L4bJ3qfiAM/s72-c/hindi_language.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-4374237132304806717</id><published>2009-10-28T21:19:00.000-07:00</published><updated>2009-10-28T21:41:38.125-07:00</updated><title type='text'>इस्तेमाल की भाषा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sukc70VnQlI/AAAAAAAAAHo/mCJtTuRm2tQ/s1600-h/alphabet.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 282px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sukc70VnQlI/AAAAAAAAAHo/mCJtTuRm2tQ/s320/alphabet.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5397877442367406674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूज एंड थ्रो की इस दुनिया में मैं बिकाऊ बनकर नहीं रह सकती। आप भले कह लें कि जब से आपने मुझे बाजार में उतारा है, मेरी कीमत बढ़ गई है। लोग मुझे इस्तेमाल करने लगे हैं। मेरे सहारे जाने क्या-क्या खरीद बेच लेते हैं। कब तक इस शर्मनाक दौर से गुजरती रहूंगी। फूहड़ से फूहड़ मनोरंजन मेरा उद्देश्य नहीं हो सकता। मैं जीविकोपार्जन के हद से गुजर रही हूं, लोग कहते हैं हम संघर्ष करते हैं। संघर्ष तो मैं कर रही हूं। किसी भी समाज की भाषा सिनेमा, टीवी या विज्ञापनों से मजबूत नहीं होती। भाषा की जड़ें मजबूत होंती हैं- राजनीति,प्रशासन,न्यायालय, व्यवसाय, सामाजिक संवाद आदि में व्यापक पैमाने पर प्रयोग से। साहित्य और पत्रकारिकता के ठेकेदारों ने मेरी ऐसी की तैसी कर दी है। न जनता मुझमें प्रवेश करती है न मैं जनता में। जब सारे महत्वपूर्ण निर्णय मेरी सौतन की झोली में जाते हैं ऐसे में गंभीर चिंतन सोच-समझ और विवेक का ठेका सैंया ने सौतन को दे रखा हो तो मैं तो केवल इस्तेमाल की वस्तु बनकर रह गई। कब से कह रही हूं कोई भी समाज इस विदेशी सौतन के सहारे उन्नति कैसे कर सकता है। मैं अपने ही घर में निर्वासित प्रवासिनी बनकर सम्मान पा रही हूं। जबकि मेरे ससुराल में ज्ञान-विज्ञान बड़ी कंपनियों का सारा कामकाज मेरी सैंया ने इस विदेशी मेम को दे रखा है। अखबार भी इसकी ज़ुबान बोलते हैं। अंतरराष्ट्रीय सारे पुरस्कार सारे यही ले जाती है। मेरे हिमायती चाहने वालों को गंवार औऱ कम पढ़े लिखे की उपाधि दी जाती है। अफसोस है कि यह कोई नहीं देख पाता कि मुठ्ठी भर लोगों की प्रगति के लिए एख बड़ा तबका पिछड़ते रहने के लिए बाध्य है। मेरे ये कम पढ़े लिखे गंवार कब जागेंगे और मुझे पहचानकर इस गोरी मेम को बेपर्दा करेंगे। मुझ से ही मेरे सैंया का वर्चस्व है ये उन्हें कब समझ में आएगा। मैं कब पुन: उस पद पर आसीन हूंगी जो मेरा है जिससे सबकुछ है जो सबकुछ है। हा...हा....भारत दुर्दशा देखी न जाइ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा उपाध्याय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-4374237132304806717?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/4374237132304806717/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=4374237132304806717' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4374237132304806717'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4374237132304806717'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/10/blog-post_28.html' title='इस्तेमाल की भाषा'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sukc70VnQlI/AAAAAAAAAHo/mCJtTuRm2tQ/s72-c/alphabet.gif' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-1659219372466908693</id><published>2009-10-05T21:15:00.000-07:00</published><updated>2009-10-06T01:14:23.215-07:00</updated><title type='text'>कथाकार, हंस के कार्यकारी संपादक और राजेंद्र यादव</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Ssr8EVVm6LI/AAAAAAAAAHg/3Nl4i6439Cc/s1600-h/rajendra.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 132px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Ssr8EVVm6LI/AAAAAAAAAHg/3Nl4i6439Cc/s320/rajendra.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5389397055479670962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हंस के संपादक श्री राजेंद्र यादव की बौद्धिकता, उनके भाषण, उनका आचार व्यवहार, उनका आक्षेप लगाने का तरीका--और वगैरह-वगैरह न जाने कितने रूप की दुनिया कायल है। माफी चाहता हूं दुनिया नहीं हिंदी साहित्य का एक मठ। एक ऐसा मठ जो उन्हें कहानीकार के तौर पर उत्कंठ स्वर में स्वीकार करने से लगातार हिचकिचाता है। जाहिर तौर पर पत्नी मन्नू भंडारी के सामने कहानीकार के तौर पर उनकी कोई हैसियत भी नहीं है। मेरे इस विचार को बदलने के लिए कोई चाहे कितने बड़े प्रलोभन दे दे मैं अपनी जगह से हिल नहीं सकता। दरअसल अपने ब्लॉग पर ये लेख मैं श्री राजेंद्र यादव जी के लिए नहीं बल्कि उनकी पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजीव के लिए लिखना चाह रहा हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पाखी'का सितंबर अंक में कथाकार संजीव पर आधारित था। बहुत बढ़िया प्रयास था अपूर्व जोशी जी का। संजीव के लेखन से आम लोगों को परिचित कराने की सफल कोशिश। लेकिन जब आप पत्रिका के पेज 170 पर पहुंचेंगे तब आप अजीबोगरीब पसोपेश में डूब जाएंगे। उस पेज पर शीर्षक है--'सावधान! यह लेखक का जीवन है'इस लेख में जैसे-जैसे आप उतरते जाएंगे एक अजीब सा दर्द आपको अपने अंदर महसूस होगा। ये दर्द है मानवीयता का। एक ऐसा दर्द जो कहानीकार संजीव के घर तक जाने वाली तंग गलियों से होते हुए उनके दो कमरे के डेरे तक पहुंचता तो है, पर उसके बाद सुनाई पड़ती है उस दर्द की चीत्कार। जो हंस के दफ्तर और और संजीव के घर की कोठरी में दम तोड़ देती है। क्योंकि वहां हवा और रोशनी नहीं आती। संजीव ने तल्खी के स्वर में खुद माना कि इन दोनों जगहों पर एक बात सामान्य है---हवा और रोशनी नहीं आती। अपने कमजोर कंधे पर कथाकार संजीव घर का खर्चा ढो रहे हैं। कहने को बहुत बड़े साहित्यकार। लेकिन हालत ऐसी कि राजेंद्र यादव को तरस तक नहीं आता। कसीदे पढ़ने में राजेंद्र यादव ने पता नहीं क्या-क्या लिखा। प्रेमचंद की परंपरा को बढ़ाने वाले कहानीकार के तौर पर स्थापित किया। संभव है इन्हीं खूबियों की वजह से अपनी पत्रिका में उन्हें जगह भी दिया। अब तो संजीव सिर्फ पत्रिका हंस के ही हैं। लेकिन सिर्फ हंस के होकर वो परिवार के लिए कितना रह गए। ये कोई उनकी पत्नी से पूछे। घर की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है। किसी तरह घर का गुजारा चल रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप सोच रहे होंगे कि संजीव इतनी बड़ी पत्रिका(हंस) के कार्यकारी संपादक हैं, फिर ऐसी हालत कैसे? वो हंस जिसके मालिक और सबकुछ, जिसकी आमदनी के हर पैसे पर घनी व्यक्तित्व वाले राजेंद्र जी का अधिकार है...वो राजेंद्र जी, जो तमाम दलितों और स्त्रियों के उद्धार करने वाले साहित्यकार हैं, वो राजेंद्र जी, जो अपने यादवत्व को छुपाने के लिए प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार को भला बुरा कह सकते हैं, वो राजेंद्र जी, जो दलितों के अत्याचार पर टेलीविजन चैनलों पर घंटों बोलने के लिए तैयार रहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं नहीं समझ पाता--क्या दलित शब्द सिर्फ जाति से जुड़ा हुआ है? क्या राजेंद्र यादव जैसे दलितों के हिमायती संजीव जैसे कार्यकारी संपादक को इस रूप में पहुंचाने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या संजीव जैसे प्रख्यात लोगों को कम पैसे पर बंधुआ मजदूर की तरह काम कराने वाले राजेंद्र यादव शोषक नहीं हैं। हंस पत्रिका के व्यवसाय पर अंग्रेजी दारू पीने वाले राजेंद्र यादव सिर्फ बौद्धिक मैथुन नहीं करते? सवाल सैकड़ों हैं पर मैं जानता हूं आपको लगेगा, मैं ऐसी बातें क्यों कर रहा हूं? मेरा लेना-देना सिर्फ मानवीयता से है। अगर कहानी की ऐसी समझ रखने वाले संजीव किसी विदेशी कंपनी में काम करते तब भी ऐसी ही हालत होती? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस देश का दुर्भाग्य है यहां लोग बौद्धिक मैथुन खूब करते हैं और जब खुद की बारी आती है तो असलियत सबके सामने आ जाती है। मैं जानता हूं, मैं राजेंद्र यादव की बौद्धकता के सामने शून्य के बराबर हो सकता हूं। लेकिन दिखावे की दुनिया में वो हर शख्स राजेंद्र यादव से बेहतर है जो ज्ञान में कम और मानवीयता में ज्यादा विश्वास रखता है। शायद यही वजह है कि मन्नू भंडारी राजेंद्र यादव से बहुत बड़ी रचनाकार हैं। क्योंकि एक रचनाकार बौद्धिक भले ही कम हो पर मानवीयता के धरातल पर खड़ा जरूर नज़र आएगा। &lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-1659219372466908693?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/1659219372466908693/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=1659219372466908693' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/1659219372466908693'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/1659219372466908693'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/10/blog-post_05.html' title='कथाकार, हंस के कार्यकारी संपादक और राजेंद्र यादव'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Ssr8EVVm6LI/AAAAAAAAAHg/3Nl4i6439Cc/s72-c/rajendra.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-646544371614665842</id><published>2009-10-04T18:02:00.000-07:00</published><updated>2009-10-04T18:14:35.085-07:00</updated><title type='text'>आखिर क्या चाहती है भारत सरकार</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SslFrHt2e9I/AAAAAAAAAHY/kjIFHiXxDZo/s1600-h/wasim-akram.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 221px; height: 230px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SslFrHt2e9I/AAAAAAAAAHY/kjIFHiXxDZo/s320/wasim-akram.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5388915036233563090" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलों को जोड़ने वाला खेल और भारत में जुनून और धर्म का दर्जा रखने वाला क्रिकेट एक बार फिर राजनीति और कूटनीति की भेंट चढ़ चुका है। मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंध फिर से नाजुक दौर में पहुंच गए। और दोनों देशों के संबंधों के उतार-चढ़ाव से यहां का क्रिकेट भी नहीं बच पाया। भारत-पाक के तनावपूर्ण रिश्ते के असर से टी20 चैंपियंस लीग भी नहीं बच पाया है। अब जो खबर आ रही है वो बेहद चौंकाने वाली है। भारत में 8 अक्टूबर से होने वाले चैंपियंस लीग के मैचों की कमेंट्री वसीम अकरम नहीं कर पाएंगे। खबरों के मुताबिक पाकिस्तानी के पूर्व तेज गेंदबाज और कमेंटेटर वसीम अकरम को कमेंट्री करने से रोक दिया गया है। पाकिस्तान के अखबार जंग के दावे को सही मानें तो भारत सरकार ने अकरम को इसकी इजाजत देने से इनकार कर दिया है। अकरम इस फैसले से भौंचक हैं। अकरम से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा--मुझे इस फैसले की जानकारी मिली है। मुझे नहीं पता कि इस फैसले के पीछे भारत सरकार है या नहीं। मुझे पता करने दीजिए कि असलियत क्या है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकरम इस वक्त दक्षिण अफ्रीका में हैं। वहां वो चैंपियंस ट्रॉफी के मैचों की कमेंट्री कर रहे हैं। खबरों के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका में ही अकरम को चैंपियंस लीग के आयोजकों की तरफ से बताया गया कि उन्हें कमेंट्री के लिए भारत आने की जरूरत नहीं है। अकरम को बताया गया कि भारत सरकार ने बीसीसीआई को हिदायत दी कि वो अकरम को चैंपियंस लीग के दौरान भारत न बुलाए। यहां हम आपको ये भी याद दिला दें कि चैंपियंस लीग में जो टीमें हिस्सा ले रही हैं, उनमें दुनियाभर की टीमें हैं... सिवाय पाकिस्तान के। इससे पहले आईपीएल सीजन 2 में भी पाकिस्तान के किसी खिलाड़ी को खेलने की इजाजत नहीं दी गई थी। मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भारत-पाक संबंध में आई कटुता के बाद ये बदलाव हुआ था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या अकरम भारत-पाक के खराब संबंधों के शिकार हो गए? क्या अकरम दो देशों के खराब रिश्तों की बलि चढ़ गए? पाकिस्तान का मीडिया इस फैसले के पीछे जहां बीसीसीआई और भारत सरकार का हाथ देख रहा है... तो वहीं चैंपियंस लीग के ब्रॉडकास्टर ईएसपीएन-स्टार स्पोर्ट्स की राय है कि चूंकि चैंपियंस लीग में एक भी पाकिस्तानी खिलाड़ी हिस्सा नहीं ले रहा है... इसलिए अकरम को पैनल में नहीं रखा गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर ब्रॉडकास्टर का ये दावा हजम कर लिया जाए तो इस फैसले को भारत-पाक रिश्तों से अलग करके देखा जाना चाहिए। लेकिन ये दावा इतनी आसानी से हजम नहीं होता। क्रिकेट के जानकार होने की वजह से और बेहतरीन कमेंटेटर होने की वजह से भला कोई ब्रॉडकास्टर क्यों चाहेगा कि अकरम उसके पैनल में नहीं हो। खेलों की समझ और खेलों को लेकर पैने नजरिये की वजह से दुनिया के किसी भी क्रिकेट मैच की कमेंटरी की कूबत अकरम रखते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में फिर यही लगता है कि भारत-पाक के तनावपूर्ण रिश्ते का असर खेल के मैदान से निकलकर कमेंट्री बॉक्स में जा पहुंचा है। तमाम कटुता को भुलाने में अहम भूमिका निभाने वाला खेल धीरे-धीरे कूटनीति का जरिया बन गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए चैंपियंस लीग में कोई जगह नहीं। लेकिन पाकिस्तान का कोई खिलाड़ी अगर दूसरे देश के किसी लीग से खेल रहा हो तो? ऐसे में क्या होगा। सवाल थोड़ा टेढा है... लेकिन इससे बचा नहीं जा सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैंपियंस लीग में एक टीम ऐसी शामिल हो रही है... जिसका हिस्सा होगा एक पाकिस्तानी खिलाड़ी। ये लीग है ब्रिटेन का... काउंटी टीम का नाम है ससेक्स और इसके पाकिस्तानी सदस्य का नाम है यासिफ अराफात। चैंपियंस लीग में ससेक्स के जिन खिलाड़ियों को हिस्सा लेना है उसमें यासिर अराफात भी शामिल है। यानी सेसेक्स की तरफ से एक पाकिस्तानी खिलाड़ी चैंपियंस लीग का हिस्सा हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में अब बीसीसीआई का रुख क्या होगा? क्या भारत सरकार को दूसरी टीम के जरिये आने वाले पाकिस्तानी खिलाड़ियों के नाम पर भी आपत्ति होगी? यासिर अराफात को लेकर बीसीसीआई और भारत सरकार के रवैये का इंतजार पाकिस्तान के कई खिलाड़ियों को भी रहेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या क्रिकेट में सियासी कूटनीति जायज है---आपकी राय का इंतजार है....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-646544371614665842?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/646544371614665842/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=646544371614665842' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/646544371614665842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/646544371614665842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/10/blog-post_04.html' title='आखिर क्या चाहती है भारत सरकार'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SslFrHt2e9I/AAAAAAAAAHY/kjIFHiXxDZo/s72-c/wasim-akram.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8013888723492328769</id><published>2009-10-01T13:31:00.000-07:00</published><updated>2009-10-01T13:50:08.047-07:00</updated><title type='text'>वाह! रे तेरी माया</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SsUVy8yE87I/AAAAAAAAAHQ/oH66bae-mqk/s1600-h/mayawati.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 224px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SsUVy8yE87I/AAAAAAAAAHQ/oH66bae-mqk/s320/mayawati.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5387736494272476082" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसा वक्त आ गया है। मां-बाप के लाखों रुपए खर्च करके MBA की पढ़ाई की। मां-बाप ने सपना देखा, बेटा/बेटी किसी बड़ी कंपनी में एमबीए बनेंगे। अच्छी सैलरी होगी। बच्चे की ज़िंदगी संवर जाएगी। लेकिन वक्त का तकाज़ा देखिए। बच्चे लाइन में खड़े हैं। वो भी मायावती द्वारा बनाए गए अंबेडकर, काशीराम मेमोरियल और बौद्ध उपवन के लिये। जी हां, मैनेजमेंट पास लोगों की भर्ती इन पार्कों के रख रखाब के लिए की जा रही है। जब इस पोस्ट के लिए आवेदन का इश्तेहार निकला। युवाओं ने जमकर हिस्सा लिया। युवाओं की भीड़ देखकर में अंदाजा हो चला कि समय कितना खराब आ गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मायावती ने अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल, काशीराम स्मारक और बौद्ध विहार शांति उपवन की देखरेख के लिये एक सोसाइटी बनाने का फैसला किया है। ये सोसाइटी उन लोगों से टिकट के जरिये पैसा इकट्ठा करेगी जो मेमोरियल्स देखने आयेंगे। सोसाइटी के फंड से ही मैनेजरों, असिस्टेंट मैनेजरों और बाकी कर्मचारियों की तनख्वाह दी जायेगी। सरकार ने मैनेजर और असिस्टेंट मैनेजरों के लिये जहां एमबीए पास लोगों को इंटरव्यू के लिये बुलाया है तो वहीं बौद्ध विहार उपवन के लिये होटल मैनेजमेंट कर चुके लोगों को मौका दिया जा रहा है। मैनेजर पोस्ट के लिये 25 हजार रूपये की तनख्वाह तय की गयी है। लेकिन ऐसा नहीं है कि सबके सब मैनेजर ही बन जाएंगे। अगर मैनेजर की तनख्वाह 25 हजार होगी तो उसके नीचे वालों की हालत क्या होगी...अंदाजा लगा सकते हैं। लेकिन बेरोजगारी का आलम ऐसा है कि तमाम ऐसे एमबीए हैं जो इन मेमोरियल्स में भी काम करने को तैयार हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद पहला मौका होगा जब किसी इमारत या मेमोरियल की देखरेख के लिये एमबीए पास लोग रखे जायेंगे। सरकार का मानना है कि इससे इन मेमोरियल्स की देखरेख बेहतर ढंग से हो सकेगी। हालांकि ये एक प्रयोग है और शायद इसीलिये नौकरी दी तो जा रही है लेकिन सिर्फ एक साल के कांट्रैक्ट पर। इस वायदे के साथ कि अगर सब कुछ बेहतर रहा तो फिर बढा दी जायेगी कांट्रैक्ट की मियाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8013888723492328769?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8013888723492328769/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8013888723492328769' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8013888723492328769'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8013888723492328769'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='वाह! रे तेरी माया'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SsUVy8yE87I/AAAAAAAAAHQ/oH66bae-mqk/s72-c/mayawati.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-4307206055131690535</id><published>2009-09-10T00:46:00.000-07:00</published><updated>2009-09-10T01:20:33.009-07:00</updated><title type='text'>मठाधीशों और चमचों की जमात</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sqi2xBD9nII/AAAAAAAAAHI/yxx0aXT3lrc/s1600-h/%E0%A5%87%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%97%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A5%8B.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sqi2xBD9nII/AAAAAAAAAHI/yxx0aXT3lrc/s320/%E0%A5%87%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%97%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A5%8B.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379750708108958850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मित्रों, &lt;br /&gt;हंस के सितम्बर अंक में मेरी-तेरी उसकी बात में राजेंद्र यादव ने आखिरकार अपनी पुरानी कुंठा उजागर कर दी। अपनी पत्रिका है वो चाहे जो लिखें। किसी के बाप की हिम्मत है जो उन्हें रोक ले। उन्होंने शुरुआत परसई जी की लघुकथा से की है--सुबह-सुबह एक नेता तलवार लेकर बैठ गए। 'आज तो अपनी गर्दन काटकर रहूंगा' आसपास के लोग जितना ही समझाने की कोशिश करते, उतनी ही उनकी जिद्द बढ़ती जाती कि नहीं, आज तो यह गर्दन कटकर ही रहेगी. लोगों ने पूछा कि कोई तो कारण होगा ? झल्लाकर बोले, यह भी कोई गर्दन है जिसमें सात दिनों से कोई माला ही नहीं पड़ी. अब इस गर्दन की खैर नहीं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बातें राजेंद्र यादव जी ने नामवर जी के लिए लिखी। उन्होंने कहा कि मैं सोचता हूं कि नामवर जी को भी क्या कभी ऐसी पवित्र बेचैनी होती होगी कि दो दिन हो गए, किसी ने अध्यक्षता करने नहीं बुलाया ? नामवर जी हर गोष्ठी में शाश्वत अध्यक्ष या फिर अंतिम वक्ता होते हैं। जाहिर है नामवर बड़े साहित्यकार है। एक जमात है उनके साथ। स्वार्थ और अवसर के साथ जुड़े लोग। राजेंद्र यादव भी बड़े साहित्यकार हैं। अपनी पत्रिका की धौंस से साहित्य में महिलाओं और दलितों के मसीहा। एक मसीहा को दूसरे मसीहा की तरक्की का क्षोभ तो रहता ही है। और फिर यह भी दर्द रहता है कि मैं भी तो उससे कम नहीं फिर मैं क्यूं दबूं। जाहिर है राजेंद्र यादव का साहित्य में बड़ा योगदान है। नए लेखकों को परखते हैं...अच्छे से परखते हैं, उन्हें मौका देते हैं, उनके साथ बातें करते हैं और फिर उन्हें साहित्यकार बनाते हैं। अपने ठप्पे के साथ। नामवर चूंकि इन चीजों में सीधे-सीधे नहीं पड़ते इसलिए उनका रूप दूसरे तरह से नजर आता है। सभाओं में वो जिसके लिए अच्छा बोलते हैं वो बड़ा साहित्यकार बनने का दमखम रखने लगता है। जाहिर है दुनियाभर की नजरें रहतीं है नामवर जैसे साहित्य के पुरोधा पर। जिन्होंने साहित्य में जो कुछ कह दिया वो तो ब्रह्म वाक्य है। राजेंद्र यादव जो करें या फिर नामवर जी। मेरी तकलीफ दूसरी है। आखिर साहित्य कब तक इन जैसे लोगों की गेंद रहेगा? इनके अलावा साहित्य की दूसरी कोई कल्पना नहीं हो सकती। राजेंद्र यादव और नामवर जैसे लोगों ने जो कह दिया वही कबतक मान्य रहेगा? इनसे इतर क्या साहित्य की चर्चा बेकार है? साहित्य किसी की बपौती नहीं है। दिक्कत ये है कि इनके बैग और झोला उठाने वाले लोगों की भरमार है। शायद इन्हीं के दम पर कहीं कुछ हो जाए।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इन लौडों को मुंह मत लगाओ, ये तुम्हारे हाथ काट डालेंगे' नामवर सिंह जैसा आदमी युवाओं के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल कैसे कर सकता है। इसके पीछे कारण है--चूंकि युवाओं ने नामवर जैसे लोगों को सहलाना नहीं छोड़ा है। राजेंद्र यादव तो तब भी टीम बी बनाने की कोशिश में लगे हैं। पर नामवर जैसे लोगों के तलवे कबतक चाटते रहेंगे युवा। ये जानने के बाद भी कि युवाओं के प्रति देश के सबसे महान आलोचक की क्या राय है। मुझे याद है रामचंद्र शुक्ल ने जब छायावाद को गलियाना शुरु किया था तब निराला ने उन्हें आड़े हाथो लिया था। जाहिर है शुक्ल जी बौखलाए होंगे। पर निराला ने बिलकुल ठीक किया था। साहित्य गिने चुने लोगों की कठपुतली नहीं। जाहिर है जब तक युवा एकजुट नहीं होंगे ऐसे साहित्य के मठाधीश जमे रहेंगे। मेरा तो सीधा कहना है कि नामवर और राजेंद्र यादव जैसे लोगों को युवा गोष्ठियों में बुलाना बंद कर दें। फिर देखिए तस्वीर क्या होती है। संभावनाएं बहुत हैं उसे बाहर निकालने की जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-4307206055131690535?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/4307206055131690535/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=4307206055131690535' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4307206055131690535'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4307206055131690535'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/09/blog-post_10.html' title='मठाधीशों और चमचों की जमात'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/Sqi2xBD9nII/AAAAAAAAAHI/yxx0aXT3lrc/s72-c/%E0%A5%87%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%97%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A5%8B.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-7361085120864427684</id><published>2009-09-08T00:45:00.000-07:00</published><updated>2009-09-08T00:52:52.150-07:00</updated><title type='text'>अपराजिता</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SqYNHdrx5OI/AAAAAAAAAHA/JZlRBQoRN7k/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 106px; height: 113px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SqYNHdrx5OI/AAAAAAAAAHA/JZlRBQoRN7k/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379001226819134690" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़ने और जूझने का दम बचपन से ही भरती थी। क्या पता था कि पल-पल प्रतिपल यही दिनचर्या में शामिल हो जाएगा। उसके लिए कभी कोई हरा भरा चिकना रास्ता नहीं था और शायद इसीलिए फिसलने का डर भी कम था। रास्ते बीहड़ सुनसान या थकान से भरे हों तो उठते गिरते आदमी संभल ही जाता है। या यों कह लें खड़ा होने लायक बन जाता है। जय पराजय का प्रश्न उन्हें बेचैन करता होगा, जो अपनी जिंदगी दूसरों की शर्तों पर जीते हैं। न तो उसके पास उधार का चश्मा है और न ही अंतर्भेदी आंखें। जब जो कुछ देखा, भोगा जीया या कह लें सहा, वही उसकी पूंजी बन गई और इसी अनुभव संसार ने उसे समृद्ध कर दिया। कहने को न उसके पास कोई चतुराई है न मीठी बोली पर हां जहां तक मुझे पता है जानबूझकर तो कभी किसी का मन नहीं दुखाया। दुनिया भर की उपलब्धियां हासिल कर लेने पर भी यदि मन में शंका संदेह और संबंधों में असहजता अविश्वास भरा हो तो वो सिकंदर नहीं, पराजित ही कहलाएगा। ठोकरें खाते हुए उपहास झेलकर ताने सुनकर जिसने अपना दमखम संभाला हो वही अपराजिता। भौतिक चकाचौंध में हमसे हमारी दुर्लभ मुस्कान आदमीयत सहजता छीन ली है। यही चिंता का विषय है। उसे जीवन में न कोई रियासत मिली, न कभी कोई उसपर मेहरबान हुआ। इसीलिए यथार्थ उसे अपने ज्यादा करीब और सगा लगा। किसी की आंख में आंख डालकर बात करने का साहस उसने अपने संस्कारों से कमाया था। पर वही साहस उसे बाद में जिद्दी, अड़ियल, सुप्रीरियर कॉम्प्लेक्स का तमगा पहनाने लगा। पराजित नहीं है उसका साहस। क्योंकि वह अपराजिता से भी बहुत बड़ा है और जब-जब कुछ ग़लत होते दिखता है, वही साहस हर सुविधाजीवी सत्ताधारी से लड़ा है। उसे गर्व है कि जो वह है वही रहना चाहती है। लोग समझें तो ठीक और ना समझें तो और ठीक। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधा उपाध्याय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-7361085120864427684?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/7361085120864427684/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=7361085120864427684' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7361085120864427684'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7361085120864427684'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/09/blog-post_08.html' title='अपराजिता'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SqYNHdrx5OI/AAAAAAAAAHA/JZlRBQoRN7k/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-991337895260631803</id><published>2009-09-07T13:41:00.001-07:00</published><updated>2009-09-07T14:15:24.467-07:00</updated><title type='text'>नवाज के इस रूप को देखिए</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SqVwFa2dwyI/AAAAAAAAAG4/K48XMTQVYOM/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 310px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SqVwFa2dwyI/AAAAAAAAAG4/K48XMTQVYOM/s320/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5378828568373347106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तस्वीर को देखकर आप एक बार के लिए चौंकेंगे तो जरूर। है भी चौंकाने वाली। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ और दुनिया का सबसे खूंखार और हजारों बेगुनाहों को मौत की नींद सुलाने वाला आतंकी ओसामा बिन लादेन। आप को लग रहा होगा कि दोनों की तस्वीर एक साथ कैसे ? इस हकीकत को जानना है तो सुनिए। मियां नवाज शरीफ और ओसामा के बीच करीबी रिश्ते रहे हैं। नवाज शरीफ ने ओसामा ने एक बार नहीं कम से कम पांच बार तो जरूर मुलाकात की है। ऐसा नहीं कि ये आरोप हम लगा रहे हैं या फिर भारत सरकार ने लगाया है। बल्कि ये सनसनीखेज खुलासा खुद नवाज शरीफ के पुराने सहयोगी और आईएसआई के पूर्व अधिकारी खालिद ख्वाजा ने किया है। खालिद के मुताबिक 1990 में नवाज शरीफ ने बतौर प्रधानमंत्री ओसामा से मुलाकात की थी। खालिद का कहना है कि नवाज शरीफ ओसामा से कई बार मिल चुके हैं। उन्होंने ये भी दावा किया कि कम से कम पांच बार तो दोनों के बीच मुलाकात का जरिया वो खुद बने। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरोप सिर्फ इतना ही नहीं है। खालिद के अनुसार नवाज शरीफ का सऊदी शाही परिवार से कोई परिचय नहीं था। इस परिचय का सूत्रधार ओसामा बिन लादेन ही बना। उसी ने नवाज की शाही परिवार से मुलाकात कराई थी। खालिद के मुताबिक शरीफ ने ओसामा बिन लादेन से सऊदी अरब में पाकिस्तानी नागरिकों को नौकरी दिलवाने कि सिफारिश की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है जिस दावे के साथ खालिद ने नवाज और ओसामा के रिश्तों का खुलासा किया है उसके आधार पर कई सवाल खड़े हो जाते हैं। लोकतंत्र की दुहाई करने वाले मियां नवाज का अगर आतंकी से निजी संबंध हैं तो फिर दूसरे लोकतांत्रिक देशों के लिए ये खतरे की घंटी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-991337895260631803?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/991337895260631803/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=991337895260631803' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/991337895260631803'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/991337895260631803'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='नवाज के इस रूप को देखिए'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SqVwFa2dwyI/AAAAAAAAAG4/K48XMTQVYOM/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8721538851535557180</id><published>2009-08-19T21:30:00.000-07:00</published><updated>2009-08-19T21:57:34.566-07:00</updated><title type='text'>कलियुग के 'हनुमान'</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SozRfYzT4MI/AAAAAAAAAGw/pW2LgRQuCMc/s1600-h/jaswant.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 235px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SozRfYzT4MI/AAAAAAAAAGw/pW2LgRQuCMc/s320/jaswant.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5371898792709972162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में एक कहावत है---पड़ी डंडी को उठा लिया। जी हां, कलियुग के हनुमान के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। कलियुग के राम(अटल बिहारी वाजपेयी)के शिथिल पड़ते ही बीजेपी की औकात सामने आ गई। एक-एक कर पार्टी के तमाम दिग्गज धूल फांकने लगे हैं। लौह पुरुष(आडवाणी) कितने दिन बाद मुंह के बल गिरेंगे ये नजारा देखना भी दिलचस्प होगा। फिलहाल उनको सहारा देने वाले पार्टी में मौजूद हैं। इसलिए थोड़ा वक्त लग सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजेदार बात है कि बीजेपी चिंतन बैठक करने ठंढे प्रदेश शिमला में एकत्रित हुई। माना जा रहा था कि पार्टी हार के कारणों का ऐसा विश्लेषण करेगी कि अगले चुनाव में स्थितियां अपने हक में हो सके। लेकिन ये किसी को नहीं मालूम कि हार के तीन महीने बाद जिस मसले पर पार्टी एकजुट होकर चिंता करने वाली थी उसका रेशा-रेशा तो उधड़ चुका है। न तो अब वो पार्टी रही और न ही पार्टी में नेताओं की वो इज्जत। एनडीए की सरकार के संकट मोचक जसवंत सिंह को राजनाथ सिंह ने ऐसी पटकनी दी बेचारे में मुंह से कुछ न निकला। अब करें तो क्या करें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल खुद को लोकतांत्रिक कहने वाली पार्टी में तानाशाही शुरु हो गई है। तानाशाह हैं राजनाथ सिंह। जिनको शह मिल रहा है संघ प्रमुख से। ऐसे संघ प्रमुख जिनका खुद का जनाधार कितना है इसका अंदाजा किसी को नहीं है। अपने घर में हर कोई शेर होता है बाहर निकलने पर जैसे ही गली के कुत्ते झपट्टा मारते हैं तब समझ में आता है...कौन कितने पानी में है। संघ को दरअसल इस बात का अच्छे से ध्यान है कि अब बीजेपी में दम नहीं है। इसलिए संघ को फर्क नहीं पड़ता पार्टी में कौन रहता है और कौन जाता है। संघ सुविधाभोगी तरीके से अपना जवाब तैयार करता है। आडवाणी ने जिन्ना को महान बताया तब बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखाया गया। आज अचानक सबके पास जुबान है। हिम्मत होती...पार्टी के अनुशासन की बात होती तो आडवाणी पर भी लागू होना चाहिए था। लेकिन एक ही गलती के लिए दो अलग-अलग तरह की सजा। ये तो मुंह देखकर किया गया फैसला है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस का फंडा साफ है। पार्टी का आलाकमान गांधी परिवार के इर्द-गिर्द ही रहेगा। ये सबको मान्य है। इसलिए हर कोई गांधी परिवार की चमचागीरी में लगा रहता है। जरूरत पड़ने पर लोग प्रियंका के बच्चों की भी चमचागीरी करने में भी नहीं चूकते। लेकिन बीजेपी ने अपना तरीका डेमोक्रेटिक रखा था। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि पार्टी लगातार सिमटती जा रही है। इतिहास गवाह रहेगा---राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में पार्टी मिट्टी में मिल जाएगी। बस देर है आडवाणी की सक्रिय राजनीति से हटने की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस अरुण जेटली पर पार्टी इतरा रही है उसका कोई जनाधार नहीं है। ग्रास रुट पर उसकी कोई पकड़ नहीं है। विधानसभा का चुनाव अपने दम पर जीत कर नहीं दिखा सकता। फिर ऐसे नेता को उत्तराधिकारी बनने का कोई हक नहीं है। ये भी तय है कि सुषमा स्वराज जैसी नेता क्यों चुप बैठें। कम से कम अरुण जेटली से तो राजनीतिक काबिलियत उनमें ज्यादा है ही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौ बात की एक बात जिस पार्टी ने सबसे ज्यादा चाल चरित्र और चेहरे की बात की आज उसकी न तो कोई चाल है और न ही चेहरा। ऐसे में चरित्र की तो कोई अहमियत ही नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8721538851535557180?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8721538851535557180/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8721538851535557180' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8721538851535557180'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8721538851535557180'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='कलियुग के &apos;हनुमान&apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SozRfYzT4MI/AAAAAAAAAGw/pW2LgRQuCMc/s72-c/jaswant.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-7015218297157159358</id><published>2009-05-20T14:05:00.000-07:00</published><updated>2009-05-20T15:28:18.462-07:00</updated><title type='text'>अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ShRxT6hS9YI/AAAAAAAAAGo/vg42rMkGFyE/s1600-h/laloo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 104px; height: 119px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ShRxT6hS9YI/AAAAAAAAAGo/vg42rMkGFyE/s320/laloo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5338016045281244546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं हर किसी का अंत आता है। चाहे वो रावण हो या फिर प्रभाकरण। अंत तो तय है। इन दिनों लालू को देखकर आपको क्या महसूस होता है? क्या लालू का 20 साल का राजयोग अब खत्म होने पर है? या हो चुका है? मुझे तो लगता है लालू का राजनीतिक करियर अगले पांच साल तक कुछ खास नहीं दिखता। न तो बिहार में न ही केंद्र में। हाथ की रेखाओं और तांत्रिकों पर भरोसा करने वाले लालू इन दिनों एक नए और अवतारी बाबा की तलाश में हैं। उन्हें कोई ऐसे बाबा की तलाश है जो ये कह सके कि आने वाला समय अच्छा रहेगा। जाहिर है जो सच बोलने वाला बाबा होगा वो ऐसा नहीं कहेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू ने ये माना है कि जनता ने उन्हें जनाधार नहीं दिया है। लालू ने ये भी माना है कि कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन न करना सबसे बड़ी भूल रही। दरअसल लालू को ये लगने लगा था कि उनके सामने कोई नहीं। उनमें बाली की शक्ति आ गई है। लेकिन जब बाली का अंत हो सकता है तो फिर लालू तो तिकड़म और जाति के आधार पर बने एक नेता हैं। जो लोहिया के चेले होने का राग अलापने वाले रंगे सियार हैं। लालू ने बिहार के अपने 15 साल के शासन में वो सबकुछ किया जिसकी कल्पना हम और आप नहीं कर सकते। कानून-व्यवस्था की हालत बिहार की ऐसी कर दी कि दिनदहाड़े चोरी-डकैती और हत्या की घटनाएं सरेआम हो गई थी। लालू के दोनों साले गुंडों के सरताज बन गए। पटना में इन दोनों का आलम ये था कि जब जो मन आया किया। न तो इनकी दीदी बोलने वाली और न ही जीजा। मुझे याद है लालू की बेटी की शादी थी। पटना में गाड़ियों के शोरूम वालों, टीवी, फ्रीज के शोरूम वालों की शामत आ गई थी। गुंडागर्दी की इंतेहा हो गई। मजबूर होकर कई कंपनियों ने बिहार से अपना बोरिया-बिस्तर बांध लिया। लोगों में लालू का खौफ था। लेकिन जवाब किसी के पास नहीं था। प्रशासन और सरकार सब घर का। सिविल सर्विसेज में चुन कर आने वाले अच्छे रैंक के लड़के बिहार कैडर लेने से डरने लगे। लेकिन वक्त बदला। नीतीश कुमार ने बाहर की राह दिखाई। इसके बाद लालू ने केंद्र में आकर अपनी दावेदारी बढ़ाई। पर अब लालू अब न तो घर के हैं न घाट के। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू की खीझ, झुंझलाहट और परेशानी पिछले महीने भर में काफी बढ़ गई है। लेकिन जनता के सामने सब बौने हैं। जनता सबको उठाने और गिराने का तरीका जानती है। अब जनता जाग चुकी है। बस जरूरत यही है कि वो इस समझदारी को बनाए रखे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-7015218297157159358?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/7015218297157159358/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=7015218297157159358' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7015218297157159358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7015218297157159358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/05/blog-post_20.html' title='अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ShRxT6hS9YI/AAAAAAAAAGo/vg42rMkGFyE/s72-c/laloo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8929396866671373599</id><published>2009-05-19T15:11:00.001-07:00</published><updated>2009-05-19T17:27:07.919-07:00</updated><title type='text'>इसे जरूर पढ़ें</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ShMv_NOI7cI/AAAAAAAAAGY/Yw0shjIK810/s1600-h/boy22.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ShMv_NOI7cI/AAAAAAAAAGY/Yw0shjIK810/s320/boy22.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5337662746291400130" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बच्चे की गोद में जो नवजात शिशु है वो न तो इसका अपना भाई है न ही इसके अंकल का बेटा। नवजात किसी पड़ोसी का भी बच्चा नहीं है। जिसकी गोद में बच्चा है उसका दावा है कि ये नवजात किसी और का नहीं बल्कि उसी की बेटी है। जी हां, इस 13 साल के बच्चे का दावा है कि इस नवजात का पिता कोई और नहीं बल्कि ये खुद है। इसका नाम है एल्फी पैटन। ब्रिटेन के एल्फी ने दावा किया कि उसकी गर्ल फ्रेंड चैंटले की बेटी मैसी का असली पिता कोई और नहीं वही है। इस दावे पर उसके 14 साल के दोस्त टेलर बार्कर ने आपत्ति जताई थी। इसके बाद एल्फी और मैसी का डीएनए टेस्ट कराया गया। डीएनए टेस्ट रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ कि टेलर बार्कर एल्फी की गर्लफ्रैंड चैंटले की बेटी मैसी का असली पिता है। इसके बाद मामला एकदम बदल गया। अब तक मैसी की देखभाल की बातें करने वाला एल्फी हताश हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ShNNvYz-h4I/AAAAAAAAAGg/ty0MkPCqDWo/s1600-h/BOY2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 95px; height: 132px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ShNNvYz-h4I/AAAAAAAAAGg/ty0MkPCqDWo/s320/BOY2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5337695459873818498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;टेलर बार्कर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा माना जा रहा है कि एल्फी का क्लासमेट टेलर अब अपनी बेटी मैसी के पालन-पोषण करेगा। टेलर ने भी मैसी के जन्म के बाद दावा किया था कि 9 महीने पहले उसका चैंटले के साथ शारीरिक संबंध हुआ था। जाहिर है टेलर खुद हैरान है कि वो अब एक बच्ची का पिता बन गया है। लेकिन उसे अजीब सी खुशी भी हो रही है। उसका कहना है कि उसके दोस्त उसके पिता बनने पर खिंचाई करते हैं लेकिन टेलर का कहना है कि ये मजाक की बात नहीं है। यह गंभीर मामला है। दरअसल ये मामला तीन महीने पहले से चल रहा था। फरवरी महीने में मैसी के जन्म के बाद से एल्फी के उसका पिता होने पर संदेह किया गया। इसके बाद कई युवकों ने मैसी के पिता होने का दावा किया जिसके बाद डीएनए टेस्ट करवाए गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामला कोर्ट में पहुंचा। मजेदार बात ये है कि इस मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस बैरन ने चैंटले, एल्फी और मैसी से संबंधित कोई भी खबर मीडिया में न पहुंचने का आदेश जारी कर दिया था लेकिन ईस्ट ससैक्स काउंटी काउंसिल इस खबर को दबाने में असफल रही। असल में कोर्ट सिर्फ इसलिए इस बात को दबाना चाहता था ताकि इसको बढ़ावा न मिले। इस मामले ने ब्रिटेन में यौन शिक्षा की मांग को बढ़ावा दिया है। उसके पड़ोसियों ने बताया कि इस खबर के बाहर आने के बाद चैंटले अपने परिवार के साथ ईस्टबोर्न स्थित घर छोड़कर कहीं और चली गई है लेकिन एल्फी से उसका संपर्क बना हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में सवाल ये उठता है कि यौन शिक्षा कितना जरूरी है। यौन शिक्षा न सिर्फ भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए जरूरी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8929396866671373599?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8929396866671373599/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8929396866671373599' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8929396866671373599'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8929396866671373599'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/05/blog-post_19.html' title='इसे जरूर पढ़ें'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ShMv_NOI7cI/AAAAAAAAAGY/Yw0shjIK810/s72-c/boy22.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-4903305315953606482</id><published>2009-05-17T14:13:00.001-07:00</published><updated>2009-05-17T14:51:56.938-07:00</updated><title type='text'>जाग गई जनता</title><content type='html'>15 वीं लोकसभा के परिणाम में जीत भले ही यूपीए को मिली हो। लेकिन इस जीत को गौर से देखे तो कई महत्वपूर्ण बदलाव के संकेत मिलते हैं। जनता अब लाचार और बेचारी नहीं रही। जनता ने ये समझना शुरु कर दिया है कि क्या अच्छा है और क्या खराब। &lt;br /&gt;बहकावे की राजनीति करने वालों को जनता ने सबक सिखाया है। &lt;br /&gt;भावनात्मक स्तर पर वोट हासिल करने वालों की हवा निकली है। &lt;br /&gt;जाति के आधार पर घटिया राजनीति करने वालों के मुंह पर तमाचा लगा है। &lt;br /&gt;मौकापरस्ती और फिरकापरस्ती करने वालों को भी जनता ने उसकी औकात दिखा दी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों के लिए सबसे अहम मुद्दा अब विकास बन गया है। इस चुनाव ने कम से कम ये साबित करने में पूरी सफलता पाई है। विकास हो और होता हुए दिखे दोनों ही चीजें जनता के लिए अब मायने रखने लगे हैं। बिना विकास के वोट की कामना करने वाले धुरंधर नेता अब भूल जाएं कि जनता उनके महिमा मंडन से प्रसन्न हो जाएगी। अब सिर्फ सेलीब्रेटी का टैग काम नहीं करने वाला है। आप को आम जनता की चिंता करनी पड़ेगी। चाहे कोई कितना बड़ा नाम क्यों न हो। विनोद खन्ना और राज बब्बर की हार से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पासवान और लालू की हार ने ये साबित कर दिया कि जनता जब चाहे आपको धूल में मिला सकती है। जनता को TAKEN FOR GRANTED लेने वाले लालू यादव को अब समझ में आ रहा है कि उनसे क्या भूल हुई है। अपनी मसखरी और मजाकिए अंदाज से लोगों को बेवकूफ बनाने वाले लालू की हार से ज्यादातर लोग खुश हैं। लालू के चेहरे पर जो मुलमा चढ़ा था वो उतर गया। उनकी असलियत सामने आ गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छी बात ये भी है कि युवाओं में संभावनाएं जागी है। चाहे वजह जो भी हो। पर युवाओं को समझ में आया है कि जब कोई है जो उनकी चिंता कर रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुनाव के फैसले का सबसे ऐतिहासिक पहलू है बाहुबलियों को करारी शिकस्त। उत्तर-प्रदेश के पूर्वांचल में बाहुबल की लाठी के जरिए संसद तक पहुंचने की तमन्ना रखने वाले मुख्तार और अफजाल अंसारी  को जनता ने आउट कर दिया ..मुख्तार अंसारी वाराणसी से तो उनके भाई अफजल अंसारी गाजीपुर से चुनाव हार गए । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह गोरखपुर से 6 बार सांसद रहे और बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय तिवारी को भी गोरखपुर की जनता ने नकार दिया । ऐसा ही हाल रहा अतीक अहमद का जो रहा जो प्रतापगढ़ से हार गए। बदायुं से बाहुबली नेता डी पी यादव भी जनता ने बाहर का रास्ता दिखा। पश्चिमी उत्तर-प्रदेश बागपत में अजीत सिंह के सामने खडे दागी गुड्डु पंडित के भाई की भी जनता ने हवा निकाल दी । बिहार की बात करें तो सजायाफ्ता पप्पू यादव को जब चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं मिली तो उन्होंने अपनी मां शांतिप्रिया को आरजेडी के टिकट पर पूर्णियां से खड़ा कर दिया लेकिन बिहार की जनता ने आरजेडी के साथ-साथ इनकी भी सफाया कर दिया। मोहम्मद शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब को भी हार का मुंह देखना पड़ा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि जनता को अब समझ में आने लगा है कि किस समय अब क्या करना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-4903305315953606482?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/4903305315953606482/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=4903305315953606482' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4903305315953606482'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4903305315953606482'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='जाग गई जनता'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-3567439792123231112</id><published>2009-04-26T13:57:00.000-07:00</published><updated>2009-04-26T14:50:23.478-07:00</updated><title type='text'>ये महापर्व नहीं है</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SfTXC_qH9dI/AAAAAAAAAGQ/z45Xux-H-14/s1600-h/Election-2009.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 160px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SfTXC_qH9dI/AAAAAAAAAGQ/z45Xux-H-14/s320/Election-2009.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5329120705533965778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कैसा लोकतंत्र है? चुनाव मुद्दाविहीन है। पिछले डेढ़ महीने में हर पार्टी ने अपना एजेंडा बदला है। घोषणा पत्र में जो कुछ प्रकाशित करवाया, उसपर किसी रैली में उस दल के नेता ने जोर नहीं दिया। अगर आप गंभीरता से चुनाव को फॉलो कर रहे हों तो आप को इस बात का अंदाजा जरूर होगा। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि चावल तीन रुपए किलो हो जाएगा। लेकिन न तो पीएम न सोनिया और न ही स्टार प्रचार राहुल गांधी कहीं ये बोलते सुने गए कि ऐसा वाकई होने जा रहा। जहां रैली हो रही है या तो वहां की सरकार को गलिया दिया गया या फिर उनके बड़े नेता को भला बुरा कहा गया। मैं एक बात कहना चाहता हूं जिस कदर अमेरिका में चुनाव होता है वैसे चुनाव की कल्पना भारत में अगले कम से कम 20 साल तक नहीं कर सकते। जिन मुद्दों पर बहस होती है, जिन बातों पर जनता झूमने लगती है, जिसे लेकर देश और दुनिया में बदलाव की नई व्यवस्था बन सकती है वो सब होता है यहां। पर हमारे यहां वो नहीं होता बाकी सबकुछ होता है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं जब से मैंने होश संभाला है तब से लेकर आज तक चुनाव में एजेंडा लगभग एक ही रहा है--विपक्षी पार्टी को गाली देना। विकास की दुहाई जरूर देते हैं लोग पर निशाना सरकार पर होता है। शिकायत और नीचा दिखाने की राजनीति। राजनीति के बड़े जानकार, चिंतक का मानना है कि उत्तरोत्तर विकास की पहली प्रक्रिया है राजनीति। पर राजनीति स्वस्थ और स्वच्छ हो। &lt;br /&gt;जाहिर है भारत में जिस कदर संभावनाएं है उसका अंदाजा विदेशी कंपनियों और सरकारों को है पर यहां की सरकारों को शायद उतनी नहीं जितनी होनी चाहिए। यही वजह है कि हर पार्टियां सिर्फ इस फिराक में रहती है कि सरकार कैसे बने। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप ने पिछले कुछ दिनों में देखा होगा---पीएम बनने के लिए किस कदर की होड़ लगी है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता एल के आडवाणी। ऐसा लगता है जैसे आडवाणी पीएम नहीं बने तो जिंदगी का सबसे बड़ा सपना अधूरा रह जाएगा। उन्हें इस बात की तकलीफ रहेगी कि अटल जी तो बन गए वो रह गए। एक टीस हमेशा चुभती रहेगी। दूसरे शरद पवार। राज्य की सरकार में उलटफेर का माद्दा रखने का दम तो रखते हैं। केंद्र में उठा-पटक की राजनीति कर सकते हैं। सोनिया के विदेशी मुद्दे पर कांग्रेस से टूटकर अलग पार्टी बना सकते हैं पर गाहे-बगाहे उनकी जुबान से ये निकल ही जाता है पीएम कैसा हो। जाहिर है मंशा झलक जाती है। जिन्हें अदब और तहजीब आज तक नहीं आई--वो भी पीएम बनकर पैसा बटोरना चाहती हैं---मैं बात कर रही हूं मायावती का। मायावती को लेफ्ट ने इतना लिफ्ट कर दिया कि वो इन दिनों पीएम बनने की तिकड़मी राजनीति में जुटी रहती हैं। मनमोहन के लिए खुद सोनिया ऐलान कर चुकी हैं। पर ये भी आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस जिस बात को पहले कभी नहीं बताती थी उसका खुलासा सोनिया ने चुनाव से पहले कर दिया। छुपी बात तो यही है कि अगर प्रणव दा जैसे लोग पीएम बन गए तो सोनिया की राजनीति का बंटाधार हो जाएगा। और फिर राहुल एक-दो साल बाद पीएम कैसे बन पाएंगे। ये सारी बातें ऐसी हैं जिसे समझता हर कोई है पर बोलने की हिममत कोई नहीं करता। चूंकि कांग्रेस में अलग तरह की तानाशाही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे पीएम कोई भी बने। जोड़तोड़ की राजनीति का खेल कोई भी खेले। पर ये तय है कि जनता खाली पैर रेलियों में नहीं आती। और अब उसने साहस भी कर लिया है पीएम के ऊपर भी जूता फेंकने का। इसलिए नेताओं को इस बात का डर तो हमेशा सताने लगा है कि कहीं कोई जूता न फेंक दे। यही है असली लोकतंत्र। मैं जूता फेंकने वालों को तहे दिल से हिम्मती मानता हूं। क्योंकि जब जनता लाचार और विवश हो जाती है। उसकी सुनने वाली कोई नहीं रह जाता तब उसके पास जूता फेंकने की ताकत आती है। कोई नहीं जानता जूता फेंकने वाला फिलहाल किन परिस्थितियों से गुजर रहा हो। जूते का सीधा संबंध विकास और पिछड़ेपन से है। नाराजगी से है। दर्द से है। पीएम का सम्मान होना चाहिए। लेकिन जिसने जूता फेंका उसके सम्मान का रखवाला कौन है? जाहिर है पूरा लोकतंत्र मौन है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-3567439792123231112?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/3567439792123231112/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=3567439792123231112' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3567439792123231112'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3567439792123231112'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='ये महापर्व नहीं है'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SfTXC_qH9dI/AAAAAAAAAGQ/z45Xux-H-14/s72-c/Election-2009.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-422767059493230849</id><published>2009-03-20T21:02:00.000-07:00</published><updated>2009-03-26T02:10:01.853-07:00</updated><title type='text'>सीरियल का सुनहरा दिन</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ScSB2htparI/AAAAAAAAAGI/BRO97Nscq_M/s1600-h/balika-vadhu.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 157px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ScSB2htparI/AAAAAAAAAGI/BRO97Nscq_M/s320/balika-vadhu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315516233966774962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात गए दिन सास-बहू और उनकी लड़ाई के। हिंदी सीरियल में नया ट्रेंड चल पड़ा है। सामाजिक कुरीतियों को नए सिरे से उजागर करने का। एक झटके में सात-आठ साल से चल रहे सास-बहू के सीरियल के दर्शकों में कमी आ गई। दर्शक को ऐसे सीरियल पकाऊ लगने लगे। दरअसल दर्शक बेहतर विकल्प की तलाश में थे। देश में टेलीविजन देखने वाले ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवार के दर्शक हैं। उन्हें बड़े और अमीर घरों के झगड़े तो शुरु में अच्छे लगे। सिर्फ इस वजह से मध्यवर्गीय परिवार के दर्शक ये जानना चाहते थे कि आखिर बड़े घराने के लोग किस कदर रहते हैं। उनकी दिनचर्या कैसी होती है। क्या उनके परिवार में कोई टकराव है या नहीं। क्या पैसे को लेकर उनमें आपस में खींचतान मचती है कि नहीं। हर इनटरटेंनमेंट चैनल पर छूआछूत की तरह ऐसे सीरियल चलने लगे। कई साल तक तो लोगों ने खूब चाव से देखा। पर एक तरह की चीज लंबे समय तक कोई नहीं झेलता। परिवर्तन शाश्वत सत्य है। टीवी दर्शक विकल्प की तलाश में थे। जैसे ही विकल्प मिला कि एक सिरे से तमाम सास-बहू के सीरियल धाराशायी हो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़ाहिर है इसका सारा श्रेय जाता है इंटरटेंनमेंट चैनल कलर्स को। कलर्स ने एक प्रयोग किया। उसने जिंदगी के सभी रंगों को एक साथ टीवी स्क्रीन पर उतारने की कोशिश की। कलर्स ने प्रयोग के चक्के पर बालिका वधू को चढ़ाया। हालांकि कलर्स को इस बात का इल्म था कि अगर नहीं चला तो उसके चैनल को करारा झटका लगेगा। पर दर्शक ऐसे ही किसी प्रयोग के इंतजार में थी। पब्लिक को प्रयोग पसंद आया। पब्लिक को एक नई चीज देखने को मिली। नई दिक्कतों को जानने का मौका मिला। कलर्स ने बालिका वधू के बहाने राजस्थान के दो तबकों को एक साथ दिखाने का मौका मिला। परंपरा और रुढ़िवादी मानसिकता को समझने का मौका मिला। समाज में फैली विषमताओं को बारीकी से महसूस किया। उन तमाम छोटी बड़ी दिक्कतों को जानने का अवसर मिला कि रुढ़िवादी मानसिकता की वजह से हर तबका किस कदर त्रस्त है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस शुरुआत ने इंटरटेंनमेंट चैनल में खलबली मचा दी। बालिका वधू का हर तरफ डंका बजने लगा। फिर क्या था। प्राइम टाइम में लंबे समय से काबिज सीरियल को तगड़ा झटका लगा। एड एजेंसियों ने भी पुराने ठहरे हुए सीरियल को ठेंगा दिखाना शुरु किया। मजेदार बात ये है कि खुद कलर्स ने भी एक ऐसा सीरियल रात साढ़े दस बजे शुरु किया 'जाने क्या बात हुई' । राजा चौधरी की पूर्व पत्नी श्वेता तिवारी अहम भूमिका में थी। कुछ हफ्ते इस स्लॉट पर चलाने के बाद चैनल ने तय किया कि वहां एक और परंपरा और रूढ़िवादी मानसिकता का सीरियल भर दिया और जाने क्या बात हुई को शाम साढ़े छ बजे कर दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलर्स की देखादेखी बालाजी टेलीफिल्मस भी रूढ़िवादी मानसिकता और राजस्थानी बैकग्राउंड को पकड़ने में लग गया है। जाहिर है जो पहला है वो तो सबसे पहले ही देखा जाएगा। बस डर इस बात का है कि सास-बहू की लड़ाई की तरह ही ये भी लंबा न खिंचने लगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-422767059493230849?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/422767059493230849/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=422767059493230849' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/422767059493230849'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/422767059493230849'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html' title='सीरियल का सुनहरा दिन'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ScSB2htparI/AAAAAAAAAGI/BRO97Nscq_M/s72-c/balika-vadhu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-32055877459590022</id><published>2009-03-06T20:10:00.000-08:00</published><updated>2009-03-06T22:19:35.809-08:00</updated><title type='text'>संतन को कहां सीकरी सो काम...बिसर गए हरिनाम</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SbIQ3t_6ysI/AAAAAAAAAGA/oroV1FQxPeY/s1600-h/gandhi+photo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SbIQ3t_6ysI/AAAAAAAAAGA/oroV1FQxPeY/s320/gandhi+photo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310325460049775298" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'शराब आत्मा और मन दोनों को खोखला कर देता है' ये उक्ति देश के राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी के है। ऐसा नहीं कि वो सिर्फ कहने के लिए कोई भी बात कहते थे। बल्कि ज़िंदगी भर उन्होंने उसको निभाया भी। गांधी के सत्य के प्रयोग का यही अचूक हथियार था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वाकये को मैंने इसलिए याद नहीं किया क्योंकि मैं गांधी पर कोई लेख लिखना चाह रहा हूं। मैं गांधी के विचारों से लंबे समय से सहमत रहा हूं और बहुत हद तक उन्हें मानने की कोशिश भी करता रहा हूं। गांधी के सामान को लेकर पिछले दिनों जो छिछालेदर हुई उससे मेरा मन काफी आहत हुआ। मैं बड़ा परेशान रहा हूं। पहले तो सामान की नीलामी का पूरा ड्रामा। और फिर एक और बड़े ड्रामे के तहत शराब बेचने वाले विजय माल्या का सामान खरीदना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय माल्या चाहे कितान ही बड़ा आदमी क्यों न हो...गांधी के सामने बहुत छोटा है। उसके पास करोड़ों अरबों रुपए क्यों न हो..गांधी के सामने बहुत गरीब है। लेकिन दुर्भाग्य, आंधी ऐसी चल रही है कि देश की सरकार को इसकी अहमियत समझ में नहीं आती। केंद्र सरकार को भी पैसे वालों की चमचागीरी में मजा आता है। सरकार के पास 10 करोड़ रुपए नहीं थे कि वो गांधी के सामान खुद खरीद सके। लानत है ऐसी सरकार पर। जिसे अपने राष्ट्रपिता की अहमियत का कोई ज्ञान नहीं है। भाषण देने के लिए सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री और न जाने कौन-कौन, सब गांधी की तारीफ करते नहीं थकते। लेकिन सिर्फ मतलब के लिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुखद ये है कि केंद्रीय पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी ने बड़े फ़क्र से दावा किया कि भारत सरकार विजय माल्या के संपर्क में थी। अगर नीलामी को अपने हक में करने की सरकार ने योजना बनाई ही थी तो किसी और पूंजीपति को कहा होता। जो कम से कम शराब का धंधा न करता हो। गांधी के आदर्शों का इतना तो ख्याल रख लिया होता। ये बात दीगर है कि गांधी व्यक्तिगत सामान की नीलामी के पक्षधर नहीं रहे हैं। पर अगर सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही थी तो कम से कम इसका ढोंग न किया होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं राजा गए, प्रजा गई अब तो लोकतंत्र है...पर आदर्शों और मानदंडो की कोई जगह नहीं है...सही है अब वो समय दूर नहीं जब गांधी के सामान की नीलामी पर सियासत शुरु हो जाएगी। चुनाव पास है। देखना ये है कौन सी पार्टी इसको अपना एजेंडा बनाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्य है सरकार। धन्य हैं पूंजीपति विजय माल्या।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-32055877459590022?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/32055877459590022/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=32055877459590022' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/32055877459590022'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/32055877459590022'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='संतन को कहां सीकरी सो काम...बिसर गए हरिनाम'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SbIQ3t_6ysI/AAAAAAAAAGA/oroV1FQxPeY/s72-c/gandhi+photo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-5042119882892513577</id><published>2008-12-29T01:47:00.000-08:00</published><updated>2008-12-29T02:16:34.938-08:00</updated><title type='text'>धमाके में मेरी मौत हुई तो....</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVijbQPrmgI/AAAAAAAAAFc/R1cYr2fZr7s/s1600-h/Blast-Text-Effect17.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 186px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVijbQPrmgI/AAAAAAAAAFc/R1cYr2fZr7s/s320/Blast-Text-Effect17.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5285153851331811842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डरने लगा हूं लगातार हो रहे धमाके से। सोचता हूं अगर मेरी भी मौत किसी धमाके में हो गई तो क्या होगा? कई बार तो ये भी सोचता हूं कि धमाके में मेरी मौत हो गई और साथ में कोई आईडेंटिटी कार्ड नहीं रहा तो कोई मेरी लाश को कैसे पहचानेगा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि मेरी भी लाश लावारिस कहलाएगी। खुदा से बस यही गुजारिश है कि अगर ऐसे धमाकों में मौत हो तो मेरी पहचान जरूर हो जाए। कितना जरूरी हो गया है आज की तारीख में खुद की पहचान बनाए रखना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगातार ये भी सोचता हूं कि अगर मेरी मौत हो गई तो क्या होगा? सबसे ज्यादा तकलीफ किसको होगी? जाहिर है पत्नी और बच्चे टूट जाएंगे। मेरे बिना मेरी पत्नी और बच्चे एक मिनट की भी कल्पना नहीं कर सकते। जानता हूं कि पत्नी खूब रोएगी। तमाम शिकायतें होगीं। रोते-रोते बातें करेगी। मुझसे बार-बार कहेगी...कहां चले गए तुम? आस पड़ोस के लोग और रिश्तेदार बार-बार मेरी पत्नी को ढाढस दिलाने की कोशिश करेंगे पर ऐसे समय में कौन रुकता है। जिंदगी की सबसे खराब घड़ी यही तो होती है। मेरी बेटी को मौत और जिंदगी की समझ होने लगी है। उसको पता है मौत का मतलब। वो जानती है कि जिसकी मौत हो जाती है वो वापस नहीं आते। वो पहले भी इसका एहसास कर चुकी है। लेकिन अपने पापा को न पाकर उसकी जिंदगी में कितना कुछ बदल जाएगा। कई वर्षों तक हर छोटी-बड़ी बात पर अपने पापा को याद करेगी। कई बार ये भी कहेगी कि पापा होते तो उन्हें कहना नहीं पड़ता, पापा होते तो अभी इस दिक्कत को दूर कर देते। काश! पापा होते। लेकिन बच्चे लाख कुछ भी कह लेते उनका सपना कम से कम उसके पापा के माध्यम से पूरा नहीं होता। मैं सोचता हूं...मेरा बेटा छोटा है। उसे अपने पिता की याद उतनी नहीं आएगी जितनी बेटी को आएगी। संभव है अपनी दीदी को बार-बार ये कहते हुए सुनता तो शायद उसके जेहन में भी ये बात धीरे-धीरे बैठने लगती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी मौत के बाद दफ्तर के सह्दय लोग कुछ दिन तक तो मेरी पत्नी और मेरे बच्चों से संपर्क बनाए रखते। फिर धीरे-धीरे उनकी याद भी ढीली पड़ती जाती और एक समय बाद उनके जेहन में भी एक हल्की सी याद रहती। बाद में किसी चर्चा के दौरान जब पुरानी बात होगी तो शायद मैं वहां याद किया जाऊं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दफ्तर में काम करने वालों के लिए पहली प्रतिक्रिया तो होगी...ओह!नो। ये क्या हो गया। उसके बाद वो ये भी कहेंगे बेचारा बड़ा अच्छा आदमी था। संभव है जीते जी चाहे नाम में दम कर रखा हो। पर मौत के बाद यकायक अच्छा हो जाऊंगा। कुछ तो इसलिए अच्छा कहते हैं कि उन्हें कहना होता है। और जो वाकई आपके अच्छे गुण के प्रशंशक हैं उनका अपना स्वार्थ रहा है। संभव है मैंने पहले उनके मनमाफिक बात की होगी। संभव है मैं उनकी ज़रूरतों में काम आया हूंगा। वरना खाली-खाली कोई अच्छा नहीं कहता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अंत में एक बात कहना चाहता हूं---मौत, जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है। एक दिन तो आनी है। इसलिए इससे हम जितना भागेंगे उतनी ही तकलीफ होगी। हर किसी को मान कर चलना चाहिए कि अगर मौत हुई तो विकल्प क्या होगा। क्योंकि बिना विकल्प के जिंदगी संभव नहीं है। इस अटल सत्य को स्वीकारना ही होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-5042119882892513577?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/5042119882892513577/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=5042119882892513577' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/5042119882892513577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/5042119882892513577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/12/blog-post_29.html' title='धमाके में मेरी मौत हुई तो....'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVijbQPrmgI/AAAAAAAAAFc/R1cYr2fZr7s/s72-c/Blast-Text-Effect17.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8008985555388834450</id><published>2008-12-27T07:09:00.000-08:00</published><updated>2008-12-27T07:39:21.643-08:00</updated><title type='text'>आमिर खान का 'बाज़ारवाद'</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVZLs15HWMI/AAAAAAAAAFU/vNInzO3fY-k/s1600-h/aamir+gha.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 242px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVZLs15HWMI/AAAAAAAAAFU/vNInzO3fY-k/s320/aamir+gha.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5284494446518819010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रिय मित्रों, &lt;br /&gt;अगर आप आमिर खान के फैन्स क्लब के सदस्य हैं तो मुझे माफ कीजिएगा। अगर आप आमिर के मिस्टर परफेक्शनिस्ट वाले व्यक्तित्व को आदर्श मानते हैं तो फिर से माफी मांगता हूं। और अगर आप ये मानते हैं कि आमिर लीक से हटकर चलने वाले अभिनेता हैं तो आपके साथ कुछ बातें शेयर करना चाहता हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमिर खान को अचानक बुद्धि आ गई है। बुद्धि आने का मतलब है आमिर दुनियादारी सीख चुके हैं। शाहरुख खान से किसी मायने में अब कम नहीं रहे। न तो पैसे कमाने में और न ही स्टोरी सलेक्शन में। कहते हैं जैसे ही आदमी में पैसे कमाने की धुन सवार होती है वो हर चीज को प्रोडक्ट के तौर पर देखने लगता है। अमुक चीज से संवेदनात्मक लगाव खत्म हो जाता है। अब तक आमिर ने स्टोरी के चयन में भले ही एक मिसाल कायम किया हो। पर गजनी के लिए ऐसा कहना सरासर गलत होगा। मैं स्पष्ट कर दूं--मैंने फिल्म गजनी नहीं देखी। पर जिस तरह से आमिर ने इसके लिए प्रचार की सारी हदें पार की उससे साफ लगता है कि आमिर अब बिक चुके हैं। अपना प्रोडक्शन हाउस क्या खोला, दुनियादारी तुरंत समझ में आने लगी। &lt;br /&gt;सड़कों पर गजनी कट बाल काटने से लेकर पता नहीं क्या-क्या प्रमोशनल कैंपेन चलाया। मक़सद--फिल्म को बेचना। लोगों को सिनेमा हॉल तक खींचकर लाना।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको याद होगा--ये वही आमिर खान हैं जिनकी एक बाइट के लिए न्यूज चैनल के लोग तरसते थे। जिनको बाइट या इंटरव्यू मिल जाता था वो बकायदा एक्सक्यूलिसव का मोटा बैंड स्क्रीन पर चिपका कर रखते थे। लेकिन आज हालत ये है कि आमिर हर चैनल के स्टूडियो में घंटों बैठे नजर आते हैं। आमिर को इस बात की समझ आ गई है कि मीडिया ही शाहरुख को किंग खान बनाता है और शीर्ष पर पहुंचाता है। बस क्या था। शाहरुख से सीधे पंगा ले लिया। अब कोई आमिर को रोक कर दिखा तो दे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गजनी ने पहले और दूसरे हफ्ते की बुकिंग से तकरीबन 30 करोड़ का बिजनेस किया है। शाहरुख के सदमे के लिए ये काफी है। मजेदार बात तो ये है कि फिल्म रिलीज के बाद भी आमिर सारे चैनल पर नजर आ रहे हैं। मतलब साफ है--अगर फिल्म नहीं देखी है तो आपने बहुत कुछ मिस कर दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमतौर पर गंभीर फिल्म दर्शक आमिर से फिल्मों के जरिए एक संदेश की उम्मीद करते हैं। लेकिन सुना है गजनी में बॉडी, ऐब्स और हिंसा के अलावा कुछ नहीं है। जाहिर है इस स्तर पर भी आमिर में गिरावट आई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8008985555388834450?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8008985555388834450/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8008985555388834450' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8008985555388834450'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8008985555388834450'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/12/blog-post_27.html' title='आमिर खान का &apos;बाज़ारवाद&apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVZLs15HWMI/AAAAAAAAAFU/vNInzO3fY-k/s72-c/aamir+gha.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8659146256728236484</id><published>2008-12-26T03:11:00.000-08:00</published><updated>2008-12-26T20:00:48.282-08:00</updated><title type='text'>26/11 एक महीने बाद</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVTFOmnpa2I/AAAAAAAAAFM/72tTyOxCq3w/s1600-h/KASAB.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 206px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVTFOmnpa2I/AAAAAAAAAFM/72tTyOxCq3w/s320/KASAB.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5284065117488114530" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोशनी को इस बात का ठीक-ठीक एहसास नहीं है कि उसके पापा कहां चले गए हैं। मम्मी को टूटकर घंटों रोते देखती है, दादी को रोते देखती है तो उसे एक मिनट के लिए लगता है कि पता नहीं ये लोग इतना क्यों रो रहे हैं? दादा जी तो कहते हैं कि पापा काम पर गए हैं। काम खत्म होते ही घर आ जाएंगे। लेकिन सबके बुलाने के बाद भी जब पापा नहीं आते तो रोशनी उनसे शिकायत करती है। कहती है पापा बहुत बुरे हैं। आएंगे तो उनसे मैं बात नहीं करूंगी। और जब प्यार करेंगे, मनपंसद चीज लाकर देंगे तब उनके पास जाऊंगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोशनी बच्ची है। महज पांच-छह साल की मासूम। घर वालों ने उसे ये कहकर बहला दिया है कि उसके पापा काम पर गए हैं और जब आएंगे तो उसके लिए बुक और पेंसिल लाएंगे। बस वो उस दिन की ताक में है कि कब उसे नई किताब और पेंसिल मिलेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोशनी के पापा मुंबई हमले में आतंकी इस्माइल की गोलियां के शिकार हो गए। रोशनी के पापा ठाकुर वाघेला मुंबई के जीटी अस्पताल में काम करते थे। रात के तकरीबन ग्यारह बजे का समय रहा होगा। कुछ देर पहले ही ठाकुर अपने घर लौटा था। लेकिन इसी समय आतंकियों ने कहर बरपाना शुरु कर दिया। गोलियां उगलती बंदूकों ने लोगों को छलनी करना शुरु किया। हमले के बाद घायलों को अस्पताल में भर्ती कराने की सिलसिला शुरु हुआ। ऐसे में अस्पताल के सभी स्टाफ को काम के लिए बुलाया गया। ठाकुर को भी अस्पताल से फोन गया। ठाकुर अस्पताल के लिए तैयार होने लगा। लेकिन मां ने जोर दिया कि खाना खाकर अस्पताल जाओ। बस यही चीज ठाकुर की मौत बनकर खड़ी हो गई। चूंकि आतंकी हमले की वजह से कई इलाकों में ब्लैक आउट कर दिया गया। इलाके को अंधेरे में डुबोने का आदेश दिया गया। लेकिन ठाकुर वाघेला को दफ्तर जाना था ऐसे में घर में बत्ती जलानी पड़ी। लेकिन कोई क्या जानता था कि बत्ती जलते ही आतंकी आ धमकेंगे। अजमल कसाब वहां पहुंचा। दरवाजा खुला देख उसने ठाकुर से पानी मांगा। ठाकुर को इस बात का कतई इल्म नहीं था कि जिसे वो पानी पिला रहा है वो लोगों के खून से नहा चुका है। ठीक इसी समय कसाब के आतंकी दोस्त इस्माइल ने गोलियां चलाईं और ठाकुर को छलनी कर दिया। इस घटना की चश्मदीद बनी ठाकुर की मां। अपने बेटे खून-खून होता देख मां बेहोश होकर गिर पड़ी। और जब मां की नींद खुली तो ठाकुर हमेशा के लिए सो चुका था। जब से ठाकुर सोया है घर का हर सदस्य जाग रहा है। किसी को नहीं पता ये जागरण कितना बड़ा है। जिसके बदौलत घर चलता था वो तो अब उस पार चला गया। जहां जाने वाले से कोई संवाद नहीं होता। इस तरफ वाले चाहे जितनी आवाज लगा लें। वो न तो जवाब देता है और न उसे किसी की याद आती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचमुच हम सब रंगमंच की कठपुतली हैं। जो मंच से उतर गया वो न जाने कहां भटक जाता है। किस ओर चला जाता है। &lt;br /&gt;वाकई मौत सबसे बड़ा सच है। जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। &lt;br /&gt;धीरज&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8659146256728236484?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8659146256728236484/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8659146256728236484' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8659146256728236484'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8659146256728236484'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/12/2611.html' title='26/11 एक महीने बाद'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SVTFOmnpa2I/AAAAAAAAAFM/72tTyOxCq3w/s72-c/KASAB.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-9055842268598901572</id><published>2008-12-09T05:27:00.000-08:00</published><updated>2008-12-09T06:22:13.833-08:00</updated><title type='text'>' डिप्रेशन में आडवाणी '</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ST5-DnS1ZkI/AAAAAAAAAE8/oF2jf4TpLJ8/s1600-h/Shivraj-Singh-Chouhan.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 141px; height: 143px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ST5-DnS1ZkI/AAAAAAAAAE8/oF2jf4TpLJ8/s320/Shivraj-Singh-Chouhan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5277794413877487170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पांच राज्यों के विधानसभा के नतीजे से बीजेपी को सबक लेने की जरूरत है। बीजेपी के थींक टैंक अरुण जेठली जैसे नेताओं को तो खासतौर से। उन्हें समझ लेना चाहिए कि राष्ट्रीय मुद्दे अब मायने नहीं रखते। जनता को विकास की चीजें नजर आएंगी तो फिर कोई कुछ भी कर ले...ऊंट उसी करवट बैठेगा। इन नतीजों ने गुजरात के तेजतर्रार मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को भी एक झटका दिया है। नरेंद्र भाई मोदी ये कतई न समझें की बीजेपी में सिर्फ वही एक ऐसे नेता नहीं बच गए हैं जो अपने बलबूते पर चुनाव जीत सकते हैं। &lt;br /&gt;शिवराज सिंह चौहान और चावल वाले बाबा यानी रमन सिंह उनके सामने सामने हैं। मजेदार बात ये है कि इन दोनों मोदी के फार्मूले का इस्तेमाल भी नहीं किया। बीजेपी में खुद को एकमात्र कद्दावर नेता मानने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने भोपाल में बड़ा सोच समझकर हिंदूत्व का कार्ड खेलने की कोशिश की। साध्वी प्रज्ञा का जमकर हिमायत किया। लेकिन उसके बाद भी शिवराज सिंह ने विकास के मुद्दे को ही अपना एजेंडा बनाए रखा। बात बन गई। उधर चावल वाले बाबा की छवि हमेशा से बड़ी साफ सुथरी रही है। हैम्योपैथिक डॉक्टर रमन सिंह ने सिर्फ विकास को ही एकमात्र आधार बनाया। न तो उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए और न ही मोदी का अनुसरण किया। जनता पहचानती है। जानती है कौन क्या बोल रहा है। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ST5-qtDWCxI/AAAAAAAAAFE/4wPBUY6VC-8/s1600-h/advani.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 210px; height: 232px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ST5-qtDWCxI/AAAAAAAAAFE/4wPBUY6VC-8/s320/advani.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5277795085438028562" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बड़े पत्रकार और बीजेपी के कोटे से राज्यसभा के सांसद चंदन मित्रा ने काउंटिग के दिन कहा--आडवाणी जी से जब उनकी मुलाकात हुई तो उन्हें समझ में आया कि वो डिप्रेशन में हैं। अगर एनडीए की तरफ से भावी प्रधानमंत्री आडवाणी जी डिप्रेशन में हैं तो निश्चय ही कोई बड़ी बात है। आडवाणी जी को इस बात का एहसास हो चला है कि अब प्रधानमंत्री बनने का सपना अधूरा रह जाएगा। जाहिर है मुरली मनोहर जोशी और भैरोसिंह शेखावत के लिए ये अच्छी खबर है। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं होगा। संभव है बीजेपी को दिल्ली की हार सबसे ज्यादा सता रही होगी। दिल्ली में बीजेपी ने आखिरी के 48 घंटे में अपना सबकुछ झोंक दिया था। सौ से ज्यादा रैलियां कराईं। स्टार प्रचारकों की भरमार थी। आडवाणी से लेकर मोदी और सिद्धू सब जनता को बेवकूफ बनाने में जुटे रहे। पर शीला दीक्षित का जबाव नहीं। दिल्ली में आतंकी हमले और डिमोलेशन जैसे तमाम ऐसे उदाहरण हैं जिसके आधार पर ये अंदाजा लगाया जाता था कि इस बार तो शीला का सवाल ही नहीं है। लेकिन एक बात तय है दिल्ली में खासतौर से इलीट क्लास को शीला दीक्षित की जीत पर खुशी है। वो किसी भी सूरत में बीजेपी को पचा नहीं पा रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौ बात की एक बात। अगले तीन-चार महीने बाद क्या होगा इसकी एक झलक तो लोगों ने दे दी है। पर ये भी तय है कि जीत के लिए अब राष्ट्रीय मुद्दे नहीं बल्कि स्थानीय मुद्दे मायने रखेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप सहमत नहीं हैं तो बताएं क्या होगा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-9055842268598901572?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/9055842268598901572/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=9055842268598901572' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/9055842268598901572'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/9055842268598901572'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='&apos; डिप्रेशन में आडवाणी &apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/ST5-DnS1ZkI/AAAAAAAAAE8/oF2jf4TpLJ8/s72-c/Shivraj-Singh-Chouhan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-770321707263437856</id><published>2008-11-24T07:31:00.000-08:00</published><updated>2008-11-24T08:11:36.711-08:00</updated><title type='text'>साध्वी प्रज्ञा को बचाना है !</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSrSIJkpKDI/AAAAAAAAAD0/MG3b1Z74QmQ/s1600-h/ADVANI.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 235px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSrSIJkpKDI/AAAAAAAAAD0/MG3b1Z74QmQ/s320/ADVANI.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5272257351240984626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज से ठीक दो दिन पहले बीजेपी के शीर्षस्थ लालकृष्ण आडवाणी ने भोपाल में चुनावी सभा में सरेआम ऐलान किया कि साध्वी प्रज्ञा को मुंबई एटीएस ने जानबूझकर फंसाया है। उन्होंने दावे के साथ जिक्र किया कि साध्वी प्रज्ञा पर ये उनका पहला वक्तव्य है। उन्होंने इसका कारण भी दिया। बताया कि उन्होंने साध्वी का एफिडेविट पढ़ा है। जिसमें साफ-साफ लिखा है कि एटीएस ने 16 दिनों तक हिरासत में रखा। इस दौरान कोर्ट में पेश तक नहीं किया गया। जाहिर है कानूनी तौर पर इसे जायज नहीं माना जा सकता। दूसरी वजह बताई कि साध्वी को हिरासत में लगातार परेशान किया जा रहा है। इसके बाद आडवाणी ने कांग्रेस और यूपीए सरकार को खरी खोटी सुनाई। अच्छा है साध्वी के बहाने राजनीति का नया पैंतरा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी दिन आरएसएस के वरिष्ठ मदन दास देवी ने भी पत्रकारों से बात की। साफ किया कि इंद्रेश कुमार संघ के कर्मठ और अहम कार्यकर्ता है। संघ में न तो उनकी हैसियत कम होगी और न ही उन्हें किसी से परेशान होने की जरूरत है। इसी के साथ संघ ने ये भी कहा कि साध्वी को जानबूझकर परेशान किया जा रहा है। और इसकी वजह है सरकार और उससे भी बड़ी वजह है वर्तामान और आगामी चुनाव। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSrR0_jcJyI/AAAAAAAAADs/Xkibrp-XSzg/s1600-h/PRAGYA.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 175px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSrR0_jcJyI/AAAAAAAAADs/Xkibrp-XSzg/s320/PRAGYA.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5272257022134069026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इन सब प्रतिक्रियाओं के दो दिन बाद पूरे 9 लोगों को आज मुंबई में मकोका कोर्ट में पेश किया गया। साध्वी ने एटीएस पर गंभीर आरोप लगाए। मारपीट, टॉर्चर और अश्लील सीडी सुनाने जैसे तमाम आरोप लगाए गए। आश्चर्य ये है कि न सिर्फ साध्वी बल्कि बाकी सभी आठ आरोपियों ने भी लगभग ऐसे ही आरोप लगाए। मीडिया ने हाथो-हाथ खबर को लिया। चटखारे लेकर, साध्वी को बार-बार टॉर्चर किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी बात ये है कि अचानक ऐसा क्या हो गया कि पूरे फील्ड वर्क के साथ एटीएस पर आरोपों की झड़ी लग गई। नेताओं से लेकर आरोपियों ने वैसा ही क्या जैसी प्लानिंग हुई। सरकारी वकील ने इसपर टिप्पणी भी की। अचानक इतने दिन हिरासत में रहने के बाद अचानक आज के दिन ही ऐसा क्या हो गया कि आरोपों के अलावा किसी और ने कोई बात ही नहीं की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संभव है एटीएस अपने पुलिसिया रौ में हो। मानवाधिकार का उल्लंधन भी किया जाता हो। लेकिन सच्चाई ये है कि जिन लोगों पर धमाके कराने का आरोप है, उन्हें आसानी से कैसे छोड़ा जा सकता है। अगर कुल 11 लोग मालेगांव धमाके मामले में गिरफ्तार किए हैं तो फिर कोई तो बात होगी? कहते हैं पुलिस चाह ले तो बड़ी से बड़ी गुत्थी आसानी से सुलझा सकती है। ऐसे में अगर एक बड़ा मामला अंजाम की राह पर है तो फिर हर्ज ही क्या है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर बटला हाऊस में घुसकर पुलिस आतंकियों को एनकाउंटर में मार सकती है तो फिर साध्वी प्रज्ञा और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और स्वयंभू शंकराचार्य दयानंद इसके दायरे में आता है तो फिर हैरानी किस बात की। गुनाह तो गुनाह है। वो चाहे एक के लिए किया गया हो या फिर सैंकड़ों के लिए। इसमें न तो हिंदू होता है और न ही मुसलमान।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-770321707263437856?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/770321707263437856/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=770321707263437856' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/770321707263437856'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/770321707263437856'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/11/blog-post_24.html' title='साध्वी प्रज्ञा को बचाना है !'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSrSIJkpKDI/AAAAAAAAAD0/MG3b1Z74QmQ/s72-c/ADVANI.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-5395274324596242578</id><published>2008-11-07T21:50:00.000-08:00</published><updated>2008-11-07T22:52:35.274-08:00</updated><title type='text'>सबसे बड़ा सच---'झूठ'</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SRU3DVj_6pI/AAAAAAAAAC8/NFWKpal7mZs/s1600-h/rahul+raj.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 260px; height: 173px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SRU3DVj_6pI/AAAAAAAAAC8/NFWKpal7mZs/s320/rahul+raj.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5266175869746932370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जिस दौर में जी रहे हैं वहां सबसे बड़ा सच है 'झूठ'। जो जितनी चालाकी से झूठ बोलता है, जो अपने ग़लत कारनामों को आसानी से छुपा सके--वो ही है आज की सबसे बड़ी जीत। राहुल राज का एनकाउंटर नहीं हुआ उसकी हत्या की गई--ये कोई और नहीं बल्कि फॉरेंसिक एक्सपर्ट कह रहे हैं। मुंबई के जे जे अस्पताल के फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉक्टरों ने साफ-साफ कहा है कि उसे दो फीट की दूरी से गोली मारी गई है। क्योंकि उसके चेहरे पर गन पाउडर और काले धब्बे मौजूद हैं। ज़ाहिर है उसे पहले पकड़ा गया है फिर उससे बात की गई है उसके बाद उसकी हत्या की गई है। राज ठाकरे को कोई लाख गालियां दे ले पर ये मानना होगा कि पूरा सिस्टम राज ठाकरे का साथ दे रहा है। देशमुख सरकार तो मानों राज की दलाली में जुटा है। चूंकि कई राज्यों में चुनाव नजदीक है इसलिए केंद्र सरकार देशमुख सरकार को नहीं लताड़ रही है। लेकिन सच तो यही है जिसे लगातार झुठलाया जा रहा है। महाराष्ट्र सरकार लगातार राज ठाकरे को सुरक्षित बनाने में जुटी है। केंद्र सरकार ईसाईयों के हमले पर अगर उड़ीसा और कर्नाटक सरकार को राष्ट्रपति शासन लगाने की धमकी दे सकती है तो फिर महाराष्ट्र में क्यों नहीं। राज्य सरकार से राज ठाकरे काबू में नहीं आ रहा है तो फिर वहां केंद्र अपना चाबुक क्यों नहीं चला रहा है। बात सिर्फ इतनी सी है कि केंद्र को भी लगता है कि अगली बार महाराष्ट्र चुनाव में मराठियों से किस एवज में कांग्रेस वाले वोट मांगेंगे। बीजेपी तो धीरे से बाल ठाकरे को आगे करके मराठियों का मुद्दा भुना लेगी पर कांग्रेस क्या करेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SRU269WNW9I/AAAAAAAAAC0/rPV3IkNnymc/s1600-h/laloo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 84px; height: 115px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SRU269WNW9I/AAAAAAAAAC0/rPV3IkNnymc/s320/laloo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5266175725807688658" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राहुल राज का एनकाउंटर लोकतांत्रिक देश में एक ऐसा सच है जिसे न सिर्फ एक घिनौनी घटना के रूप में याद किया जाएगा अपितु राजनीतिक के निचले स्तर पर गिरे नेताओं के लिए भी याद किया जाएगा। वर्तमान रेल मंत्री लालू यादव राज ठाकरे से किसी सूरत में कम नहीं है। राहुल राज एनकाउंटर को उन्होंने एक संवेदनात्मक घटना नहीं बल्कि उसे राजनीति का एक मोहरा बना लिया। अगले साल लोकसभा चुनाव है इसलिए लालू ने इसे अपना एक मुद्दा बना लिया। पहले तो जेडीयू को ललकार और उनके बिहार के सांसदों को इस्तीफा देने की चुनौती दी। पर जब जेडीयू के सांसदों ने वाकई लोकसभा स्पीकर को अपना इस्तीफा दे दिया तो लालू ने अपने फूहड़,दोगले और घटिया अंदाज फिर से कहा कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें तब उनके सांसद इस्तीफा देंगे। इन नपुंसक नेताओं को इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं कि एक घर में चिराग बुझ गया है। उसकी बहनें रोज़ टीवी पर रो-रोकर इंसाफ मांग रही है पर नेताओं के लिए राजनीति उससे ज्यादा जरूरी है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SRUvD_pJUSI/AAAAAAAAACU/95K5TBzhjio/s1600-h/nitish.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 114px; height: 130px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SRUvD_pJUSI/AAAAAAAAACU/95K5TBzhjio/s320/nitish.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5266167084949786914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एनकाउंटर के बाद एक दिन अपना धर्म समझकर राहुल के घर पहुंच गए। बस हो गया। खानपूर्ति हो गई। अब उसको रोज़ मारने के लिए राजनीति चमकाने लगे। शर्म किसी को नहीं आती। सबका पहला धर्म है राजनीति। जिसमें नीति कुछ भी नहीं है और को चलाने के लिए दूसरी सारी चीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन नेताओं के घर में कभी ऐसी विपदा नहीं आती। काश! इन्हें समझ में आता कि दूसरों के घर में जब ऐसी नौबत आती है तो क्या गुजरता है। मरना तो आम आदमी की नियति है। नेता तो देश पर मर मिटते हैं। देश को लूटने, आम लोगों की संवेदनाओं को खत्म करने, अपनी डफली बजाने के लिए मर मिटते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मैंने शुरु में कहा था--हम जिस दौर में जी रहे हैं वहां सबसे बड़ा सच है 'झूठ'। जो जितनी चालाकी से झूठ बोलता है, जो अपने ग़लत कारनामों को आसानी से छुपा सके--वो ही है आज की सबसे बड़ी जीत। संभव है हम लगातार हार रहे हों पर ये तय है कि हमारी हार में ही हमारी जीत है। और जीतने वाले वाकई हार रहे हैं। खुद को। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहुल राज या उस जैसे लोगों का यहां मरना तय है पर याद रखना जिस दिन राज ठाकरे जैसे लोग मरेंगे उन्हें भगवान का दर्जा दिया जाएगा। लोगों की लंबी कतारें रहेंगी। पूरा मीडिया लाइव कवरेज कर रहा होगा। और अखबारों की पहली हेडलाइन भी।&lt;a href="http://"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-5395274324596242578?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/5395274324596242578/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=5395274324596242578' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/5395274324596242578'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/5395274324596242578'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='सबसे बड़ा सच---&apos;झूठ&apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SRU3DVj_6pI/AAAAAAAAAC8/NFWKpal7mZs/s72-c/rahul+raj.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-1317718794211813216</id><published>2008-09-28T23:37:00.000-07:00</published><updated>2008-09-29T00:12:52.043-07:00</updated><title type='text'>एनकाउंटर का खौफ</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SOB5qwDYb1I/AAAAAAAAABw/SkYO3C4Y9Os/s1600-h/encounter.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SOB5qwDYb1I/AAAAAAAAABw/SkYO3C4Y9Os/s320/encounter.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5251330940874551122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के जामिया नगर के बाटला हाऊस में एनकाउंटर। एक तरफ दिल्ली पुलिस के दावे और दूसरी तरफ बाटला हाऊस में रहने वाले लोगों की बातें। जाहिर है दोनों में सच तो कोई एक ही है। या तो वहां से निवासी या फिर दिल्ली पुलिस। एनकाउंटर पर तमाम पत्रकार और बुद्धिजावी सवाल उठा रहे हैं। उनके पास अपने तर्क हैं। पुलिस की बात को सही मानने वाले बौद्धिक मैथुन करने वालों की भी कमी नहीं। अपनी-अपनी काबिलियत माफिक हर कोई बहस को तैयार है। चलिए दोनों पक्ष के बौद्धिक जनों की बातों को भी स्वीकार कर लिया जाए। बड़ी अच्छी बातें ऐसे लोग अपने ब्लॉग पर लिख रहे हैं। मुझे पता चला कि तमाम अखबारों और न्यूज चैनलों की मीटिंग में इन बातों पर काफी गरमा-गरम बहस हो रही है। पुलिस का पक्ष लेने वालों को बीजेपी से सीधे तौर पर जोड़ा जा रहा है और जो पुलिस के एनकाउंटर पर सवाल खड़े कर रहे हैं उन्हें वामपंथी माना जा रहा है। सुनने में आया है कि तमाम न्यूज चैनलों के न्यूज रूम में भी लोग खुलेआम पुलिस का पक्ष लेते दिख रहे हैं और मुस्लमानों को अप्रत्यक्ष रुप से सुना भी रहे हैं। कुछ बदतमीज और बेबाक लोग खुलेआम अपनी आरएसएस वाली चड्ढी दिखाने को आतुर हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब के बीच में एक सवाल लगातार खड़ा हो रहा है। &lt;br /&gt;जो बच्चे जामिया में पढ़ रहे हैं। जो छात्र बाटला हाऊस में रह रहे हैं उनमें एनकाउंट का खौफ क्यों पैदा किया जा रहा है? &lt;br /&gt;उन मुस्लिम बच्चों को भी दबी जुबान में आतंकवाद से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है?&lt;br /&gt;ऐसे बच्चे जो आजमगढ़ से आकर यहां रह रहे हैं उन्हें आतंकियों से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है? &lt;br /&gt;मकान मालिक मुस्लमान बच्चों को किराये पर कमरा देने से साफ क्यों मना कर रहे हैं? &lt;br /&gt;खुलेआम समाज में ऐसा भेद क्यों किया जा रहा है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो आने वाले समय में समाज विभाजन के लिए जिम्मेदार साबित होंगे। धमाकों की लगातार बढ़ती वारदात से जाहिर है ये सारे सवाल उन तमाम जगहों पर जवाब मांगेंगे जहां ब्लास्ट हो रहे हैं। अब तक धमाकों को समाज एक नजरिए से देखता था। चूंकि दहशतगर्दों के लिए हिंदू और मुस्लिम बराबर हैं। खून दोनों के बह रहे हैं। लेकिन बीच में कोई समाज का ठेकेदार है जो दोनों तरफ आग लगाने में जुटा है। हालत ये है कि जामिया यूनिवर्सिटी में जो बच्चे पढ़ रहे थे, एनकाउंट के बाद बेतहाशा घर भाग रहे हैं। उनके मां बाप को डर है कहीं पुलिस उनके बच्चों को भी उठाकर न ले जाए और आतंकवादी घोषित कर दे। ऐसा हो जाएगा तो फिर क्या होगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुलिस के इस नजरिए का फायदा वो लोग उठा रहे हैं जिनका किसी मुस्लिम से 36 का आंकड़ा रहा है। लोग सोचते हैं मौका अच्छा है खेल डालो हिंदू मुस्लिम का कार्ड। पुलिस मदद करेगी ही। इंडियन आर्मी में एक कहावत है---आतंकी सबसे अच्छा तब लगते हैं जब उन्हें गोली मार दी जाती है और वो मर जाते हैं। मैं भी इसी पक्ष में हूं। पर उन लोगों का क्या होगा जिन्हें जबरन आतंकी बनाकर मौत के घाट उतार दिया जा रहा है। मैं जानता हूं एक इंस्पेक्टर शर्मा की मौत ने पूरे पुलिस विभाग को झकझोर दिया। उनक घर को तोड़ दिया। लेकिन मेरा सीधा सा सवाल ये है कि उनके बुढ़े बाप और कब्र में पांव लटाई मां का क्या होता होगा जिनके बेगुनाह बेटे को आतंकी बनाकर मार दिया जाता है। क्या इनकी हालत उनके जैसी नहीं है जिन्होंने धमाकों में अपना सब कुछ खो दिया?   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन है इसके लिए जिम्मेदार? पुलिस या फिर समाज।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-1317718794211813216?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/1317718794211813216/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=1317718794211813216' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/1317718794211813216'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/1317718794211813216'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/09/blog-post_28.html' title='एनकाउंटर का खौफ'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SOB5qwDYb1I/AAAAAAAAABw/SkYO3C4Y9Os/s72-c/encounter.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8443438734536999227</id><published>2008-09-18T01:55:00.000-07:00</published><updated>2008-09-18T15:09:25.996-07:00</updated><title type='text'>कौन लौटाएगा सिमरन की हंसी?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SNIcugUDOGI/AAAAAAAAABo/loYGwqm4r7I/s1600-h/SHIVRAJ+PATIL.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SNIcugUDOGI/AAAAAAAAABo/loYGwqm4r7I/s320/SHIVRAJ+PATIL.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5247288101113641058" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवराज पाटिल की उम्र कितनी होगी? 73 साल के पाटिल। अपनी इस उम्र में उन्होंने अपने घर में किसी को ऐसे बिलखते देखा होगा जैसे तड़प रही है पांच साल की मासूम सिमरन। शायद नहीं। राजनीति के जिस मकाम पर पाटिल साहब हैं कम से कम उससे तो नहीं लगता। बेसहारा और लाचार मासूम की तरह क्या उनके घर में कोई कभी रोया होगा? शायद नहीं। वजह है। धनी मानी परिवार से ताल्लुक रखने वाले पाटिल को बेबसी के आंसू के बारे में क्या पता। चलिए खुदा न करे। उन्हें इस उम्र में कुर्सी के अलावा किसी और चीज के लिए बेबसी के आंसू का एहसास हो। ऐसा नहीं कि वो पार्टी अध्यक्ष के तलवे चाटना नहीं जानते। धमाकों के समय भी तीन बार कपड़े बदलना नहीं जानते। ऐसे में भी बालों में जेल(क्रीम)लगाना नहीं जानते। &lt;br /&gt;ऐसा नहीं कि सरेआम खुद को चमचा कहलाने में उन्हें कोई हर्ज है। इन सबके एवज में बस जो उन्हें नहीं जानना है उसके लिए बहुत ज्यादा प्रयास नहीं करते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकसर दफ्तर में कहा जाता है। जो काम नहीं करता है वो सबसे सुकून से रहता है और उसकी तरक्की तो पक्की होती है। नेतागीरी तो फिर बिना चमचागीरी के हो ही नहीं सकती। भले लोग उसे गॉड फादर की संज्ञा दें। पर वो विशुद्ध रुप से चमचागीरी से ज्यादा कुछ नहीं होती। पाटिल तो इस खेल में माहिर हैं। जाहिर है पाटिल जब चमचागीरी पर ध्यान देंगे तो मंत्रालय तो इसका खामियाजा भुगतेगा ही। और अगर मंत्रालय खामियाजा भुगत रहा है तो फिर धमाकों के बारे में पहले से पता कैसे चलेगा। इंटेलिजेंस सिस्टम भी वैसा ही काम करेगा जैसा पाटिल करते हैं। धमाके होते हैं तो होने दो। महिलाएं विधवा होती हैं तो होने दो। मासूम अनाथ होते हैं तो होने दो। किसको फर्क पड़ता है। मुआवजे का ऐलान तो कर ही आएंगे नेता। लाख, दो लाख, पांच लाख क्या ताउम्र उसकी जिंदगी के साथ चिपका रहेगा। उसके बाद कौन देखेगा पीड़ितों को। लेकिन पाटिल साहब ये सोच कर खुश न हों। जब लोगों की जुबान से बददुआएं निकलेंगी तो उसका नतीजा भुगतना पड़ेगा। बारी सबकी आएगी। स्वरुप अगल हो सकता है। दुख भोगने के तरीके अलग हो सकते हैं। पर चुकाना पड़ेगा। सिमरन के आंसुओं का कर्ज चुकाना होगा।  &lt;br /&gt; &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SNIY50p9gcI/AAAAAAAAABg/FidVTvTH9o4/s1600-h/simran.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SNIY50p9gcI/AAAAAAAAABg/FidVTvTH9o4/s320/simran.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5247283897506300354" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिमरन को जब-जब देखता हूं गुस्सा और अफसोस होता है। मैं धमाकों के समय करोल बाग में ही था। धमाकों के बारे में पता चलते ही स्पॉट की तरफ भागा। वहां का हाल ऐसा था कि बयान करने का मतलब है खुद को धमाके से जुड़ी उन बारीक बातों को याद करना। सड़क पर खून और चीत्कार। भयानक कोहराम। लाशें बिछी थीं। खुद को बचाने की जद्दोजहद जारी थी। चूंकि बंजारे सड़क पर बैठे रहते हैं इसलिए सबसे ज्यादा नुकसान उनका ही हुआ। चूंकि करोल बाग में आमूमन भीड़ रहती है। इसलिए धमाके की चपेट में मार्केट में खरीददारी करने वाले भी आ गए। उसी अफरा तफरी में कहीं मदद कोने में रो रही थी सिमरन। धमाके में सिमरन ने अपने प्यारे पापा को, दादा को और बुआ को खो दिया। हालांकि मासूम सिमरन को पता नहीं कि ये लोग कहां गए। लेकिन धमाके का खौफ, दहशत उसके दिलोदिमाग पर इस कदर छा गई है कि वो उससे ऊबर नहीं पा रही है। उसकी हंसी कहीं खो गई है। सिमरन खामोश हो गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या पाटिल में इतनी हिम्मत है कि वो सिमरन की हंसी लौटा दें। उसका बचपन लौटा दें। क्या पाटिल की खुफिया एजेंसी सिमरन के वे पल लौटा सकती है जिसमें वो अपने पापा के साथ हंसती खेलती थी। दादा के साथ मस्ती करती थी। कोई है जो सिमरन की हंसी लौटा दे। &lt;br /&gt;ईश्वर उन सब लोगों को हिम्मत दे जिनको धमाकों ने उजाड़ दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8443438734536999227?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8443438734536999227/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8443438734536999227' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8443438734536999227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8443438734536999227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/09/blog-post_18.html' title='कौन लौटाएगा सिमरन की हंसी?'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SNIcugUDOGI/AAAAAAAAABo/loYGwqm4r7I/s72-c/SHIVRAJ+PATIL.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-160931970331185255</id><published>2008-09-16T15:31:00.000-07:00</published><updated>2008-09-16T16:12:23.950-07:00</updated><title type='text'>प्रचंड की खुली पोल</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SNAz7mdYlsI/AAAAAAAAABY/vYpYvQzPEHQ/s1600-h/manmohan+prachand.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SNAz7mdYlsI/AAAAAAAAABY/vYpYvQzPEHQ/s320/manmohan+prachand.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5246750664915719874" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेपाल के नए प्रधानमंत्री प्रचंड। माओवादियों के प्रखर और ओजस्वी नेता। ऐसा नेपाल की जनता ही नहीं माओवाद को मानने वाले भी कहते थे। नेपाल में राजशाही को जब तक खत्म नहीं कर लिया तब तक चैन नहीं लिया। प्रचंड खुद अब सत्ता में हैं। &lt;br /&gt;लेकिन इससे पहले वो माओवादी नेता हैं। माओवाद के सिद्धांतों को मानने वाले। पर ऐसा नहीं है। सत्ता में आते ही प्रचंड की नंगई नजर आ गई। प्रचंड बिलकुल नेताओं की तरह बात करने लगे। किससे नफा और किससे नुकसान--इसका ख्याल सबसे पहले रखने लगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रचंड का भारत दौर उनके लिए काफी महत्वपूर्ण है। बड़ी वजह है। नेपाल में भारतीय कंपनियों के निवेश की गुहार लगाना। प्रचंड ने हमेशा पूंजीपतियों के खिलाफ बेखौफ आवाज उठाई। जिंदगी का एक लंबा समय जंगलों और भारत के शहरों में छुप-छुपकर बिताया। लेकिन सत्ता में आते ही खुद पूंजीपतियों को निवेश के लिए अनुरोध कर रहे हैं। देश की तरक्की हर कोई चाहता है। पर एकदम से विकास मॉडल को हाईजैक करके उसे अमल में लाने की फिलहाल जरूरत नहीं थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुद्धदेव भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल के रोल मॉडल मुख्यमंत्री के तौर पर उभरे। विकास के नाम पर ज्योति बाबू से ज्यादा काम किया। इसके लिए उन्हें पार्टी की बेरुखी भी सहनी पड़ी। लेकिन उस विकास मॉडल को आगे कैसे बढ़ाया जाए इसकी जानकारी उनके पास नहीं है। यही वजह है कि पहले नंदीग्राम और बाद में अब सिंगूर उनके साथ सांप और छुछुंदर का खेल खेलता रहा है। न उगलते बन रहा है न निगलते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-160931970331185255?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/160931970331185255/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=160931970331185255' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/160931970331185255'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/160931970331185255'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='प्रचंड की खुली पोल'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SNAz7mdYlsI/AAAAAAAAABY/vYpYvQzPEHQ/s72-c/manmohan+prachand.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-6626099342847091221</id><published>2008-08-25T14:59:00.000-07:00</published><updated>2008-08-25T16:14:09.662-07:00</updated><title type='text'>"मोहल्ला" के अविनाश (नए ब्लागर्स के पालनहार)</title><content type='html'>नए ब्लागर्स के पालनहार। उन्हें मंच देने वाले। उनकी आवाज को एक मंच देने वाले। यशवंत के भड़ास से नफरत करने वाले पर नए ब्लागर्स की भड़ास को अहमियत देने वाले---अविनाश। मोहल्ला ब्लागर्स चलाने वाले अविनाश। एनडीटीवी में बड़े पद पर काम करने वाले अविनाश। टेलीविजन के पुराने पत्रकार अविनाश। हिंदी के सबसे पुराने हिंदी ब्लागर्स में से एक अविनाश। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे उम्मीद है अब आप लोगों के जेहन में अविनाश के 'मोहल्ला' की छवि उभर गई होगी। रवीश के साथ एक अलग मोहल्ला चलाने वाले अविनाश ने अच्छा किया कि एक नए पत्रकार की स्क्रिप्ट को अपने ब्लाग पर रखा। न तो आजतक मेरी अविनाश से मुलाकात हुई है और न ही नए पत्रकार अनिल यादव से। पर अविनाश को एक बात जरूर कहना चाहता हूं। टेलीविजन के लिए स्क्रिप्ट लिखने के लिए उसके साथ सपोर्टिंग विजुल का होना जरूरी है। लफ्फाजी और संपादकीय लिखने की गुंजाइश कम से कम टेलीविजन में कम रहती है। इसके लिए अखबार की नौकरी अच्छी है। कम से कम अविनाश से ऐसी उम्मीद मैं नहीं करता। अविनाश को ऐसे युवा पत्रकारों को एक बार जरूर समझाना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात और पत्रकार बनने का मतलब ये नहीं कि किसी को कभी भी गाली दी जाए। हमें किसी को गाली देने के लिए सर्टिफिकेट नहीं मिला है। अगर साक्ष्य न हों तो गाली देने का मतलब है शब्दों का आडंबर। टेलीविजन न्यूज में क्रिकेट को अहमियत देने का पूरा श्रेय मीडिया को ही जाता है। अगर सारे खेल एक जैसे हैं तो धोनी को एनडीटीवी साइन करने के लिए करोड़ों रुपए क्यों देता है? कपिल देव को करोड़ रुपए से ज्यादा क्यों दिए जाते हैं? इससे पहले किसी भी न्यूज चैनल पर पहलवानों को स्टूडियो में, मुक्केबाजों का साक्षात्कार, शूटर का वॉक द टॉक दिखाया गया है? अगर नहीं तो क्यों। क्योंकि मालिक नहीं चाहता। मालिक जानता है कि क्रिकेट का जुड़ाव आम लोगों से है। पहलवान और मुक्केबाज एक दिन के हीरो हैं। &lt;br /&gt;असली हीरो तो क्रिकेटर ही हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिल यादव, हर चीज की एक सीमा है। आपको गाली देनी है तो प्रेस क्लब में दारू पीओ और फिर जमकर गाली दो। जिसे देना है। पर स्क्रिप्ट की गरिमा है। उसे बनाए रखो। मैं पूछता हूं---क्या अविनाश खुद कॉपी देख रहे होते तो इन बातों को एयर पर जाने देते। शायद नहीं। पर चूंकि ब्लाग चलाना एक धंधा बन गया है तो इस पर किसी को चाहे जितनी गाली दो। क्या फर्क पड़ता है। फिर अमिताभ बच्चन दूसरे स्टार पर टिप्पणी करते हैं तो हिंदी ब्लागर्स को क्यों कोफ्त होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है आने वाले समय में लोग ब्लाग पढ़ना इसलिए छोड़ देंगे क्योंकि इसपर सामान्य लहजे में कुछ भी नहीं लिखा जाएगा। सिर्फ गालियां होंगी और अपनी भड़ास होगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए अब आप उस कॉपी से भी रू-ब-रू हो लें जिसके बारे में बात हो रही है--(इस कॉपी को अविनाश के मोहल्ला से लिया गया है) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अविनाश जी, मैं एक नये चैनल में काम करता हूं, और स्पोर्टस बीट देखता हूं। ओलंपिक में भारत के अभियान पर मैने एक पैकेज लिखा, जो कि ऑन एअर भी हो गया। लेकिन बाद में मेरी लिखी स्क्रिप्ट के लिए मेरे सीनियर्स ने मुझे काफी तगड़ी बत्ती दी। उन्हें मेरी स्क्रिप्ट के जिन अंशो पर आपत्ति थी, वो अंश मैं आपको लिख रहा हूं।&lt;br /&gt;लेकिन अब ये हमारे प्यारे देश भारत पर निर्भर है कि वो अपने सुशील कुमारों को गड्ढे वाले अखाड़ों की जगह अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैट्स पर अभ्यास के मौके मुहैया कराये। जिससे कि आने वाले ओलंपिक में एक अरब से ज्यादा आबादी वाला हमारा मुल्क सिर्फ तीन पदकों को ही अपनी उप्लब्धि मानकर जश्न न मनाता रहे। लेकिन ऐसा हो इसके लिए हमें अपने टीवी चैनलों पर इन खेलों को भी जगह देनी होगी, और हमेशा क्रिकेट चालीसा छापने वाले अखबारों को अपनी कीमती स्याही दूसरे खेलों के लिए भी बचा कर रखनी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और लाइन जिस पर मुझे डांट सुननी पड़ी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और हमारे ओलंपिक संघ को भी ये जवाबदेही तय करनी होगी कि बीजिंग में सरकारी खर्चे पर सानिया मिर्जा की मां की उपस्थिति ज्यादा जरूरी है या सुशील कुमार के मालिशिये की!&lt;br /&gt;अविनाशजी, इनपुट और आउटपुट दोनों ने मुझसे कहा कि मीडिया पर सवाल उठाने वाला मैं कौन होता हूं... और सानिया मिर्जा की मां पर लिखने की तुम्हारी हैसियत है क्या अभी... और मुझे कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया है। इसका जवाब मुझे अभी तक समझ में नही आ रहा है। क्या आप मेरी सहायता कर सकते हैं कि कारण बताओ नोटिस में मैं क्या लिखूं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अविनाश जी, मीडिया में मुझे अभी कुछ महीने ही हुए है। अभी मैं यहां के दावं-पेंच समझने में नाकाम साबित हो रहा हूं। मेरा सवाल बस इतना भर है कि क्या वास्तव मे मैने इतनी भारी गलती की है जो कि मुझे नही करनी चाहिए थी।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-6626099342847091221?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/6626099342847091221/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=6626099342847091221' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/6626099342847091221'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/6626099342847091221'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/08/blog-post_25.html' title='&quot;मोहल्ला&quot; के अविनाश (नए ब्लागर्स के पालनहार)'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-3211075811077571144</id><published>2008-08-22T15:43:00.000-07:00</published><updated>2008-08-22T16:22:46.516-07:00</updated><title type='text'>राजेश जोशी और आज के कवि</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SK9KO06g37I/AAAAAAAAABQ/Q2xe9qWksSI/s1600-h/rajesh_joshi.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SK9KO06g37I/AAAAAAAAABQ/Q2xe9qWksSI/s320/rajesh_joshi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5237486510237867954" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बच्‍चे काम पर जा रहे हैं &lt;br /&gt;हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह &lt;br /&gt;भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना &lt;br /&gt;लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें &lt;br /&gt;क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं &lt;br /&gt;सारी रंग बिरंगी किताबों को &lt;br /&gt;क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने &lt;br /&gt;क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं &lt;br /&gt;सारे मदरसों की इमारतें &lt;br /&gt;क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन &lt;br /&gt;खत्‍म हो गए हैं एकाएक &lt;br /&gt;तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कितना भयानक होता अगर ऐसा होता &lt;br /&gt;भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह &lt;br /&gt;कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि राजेश जोशी की यह कविता और लंबी है। लेकिन इन पंक्तियों में विकासशील देश की असलियत है। भले ही डेवलप्मेंट सिस्टम के लिए माहिर माने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अफनी पीठ थपथपाए। सोनिया गांधी विकास के सारे आंकड़े दुनिया के सामने रखें। लेकिन राजेश जोशी की ये पंक्तियां अकाट्य है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले कवि राजेश जोशी को साक्षात सुनने का मौका मिला। जोशी जी ने तमाम कविताएं सुनाईं। कविता के जरिए अपने अनुभव सुनाए। मैं हिल गया। सच को इतनी आसानी से इतने गहरे अर्थों में कहना बहुत कठिन है। राजेश जोशी की कविताओं को सुनते हुए बार-बार रघुवीर सहाय की कविताएं याद आ रही थीं। रघुवीर सहाय की कविताएं बड़ी आसानी से अंदर तक घाव करती चली जाती है और ऊफ! करने का मौका तक नहीं देती। कुछ ऐसा ही लगा राजेश जोशी को सुनकर। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरस्कार और भांडपन के लिए तमाम कवि कविताएं लिख रहे हैं। आए दिन उनके संग्रह भी प्रकाशित हो रहे हैं। पर उनकी कविता का उद्देश्य निहायत ही निजी है। मंच पर ज़ोर-ज़ोर से फूहड़ तरीके से दुनिया को संबोधित करने में ऐसे कवि पीछे नहीं रहते। लंबी कतार लगी है। पर उनमें एक भी ऐसा नहीं होता जिनको सुनकर समाज पर तरस आए। चोट कहीं ऐसी जगह जाकर लगे जिसके दर्द से आदमी बेचैन हो उठे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं क्रांच पक्षी को तीर मारने वाला बहेलिया। तीर की चोट खाने वाला क्रांच पक्षी। पर दर्द से बाल्मीकि बेचैन हो उठे। यही वजह है कि बाल्मीकि महान कवियों में शुमार हैं। कविताओं में ऐसी तड़प वही कवि महसूस कर सकता है जिसने दुख का अनुभव किया है। एसी कमरों में बैठकर किसानों पर कविताएं हर कोई लिख सकता है। पर उसमें जान तो वही डाल सकता है जिसने किसानों के दर्द को करीब से महसूस किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्से बाद एक ऐसे कवि का कविता पाठ सुनने को मिला जिसने पुराने दर्द उभार दिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-3211075811077571144?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/3211075811077571144/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=3211075811077571144' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3211075811077571144'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3211075811077571144'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/08/blog-post_22.html' title='राजेश जोशी और आज के कवि'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SK9KO06g37I/AAAAAAAAABQ/Q2xe9qWksSI/s72-c/rajesh_joshi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-7300287169101638770</id><published>2008-08-18T13:13:00.000-07:00</published><updated>2008-08-18T15:58:18.183-07:00</updated><title type='text'>तानाशाह मुशर्रफ का अंत</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKnk1zuLXBI/AAAAAAAAABI/eTtaGSRvtlE/s1600-h/MUSH.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKnk1zuLXBI/AAAAAAAAABI/eTtaGSRvtlE/s320/MUSH.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5235967654863002642" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान टीवी पर पूर्व जनरल परवेज मुशर्रफ को रोते हुए पूरी दुनिया ने देखा। घड़ियाली आंसुओं का मानों सैलाब ला दिया। लेकिन पाकिस्तान की जनता पर कोई खास फ़र्क नहीं पड़ने वाला था। लोगों के दिल पर उभरे गहरे जख्मों पर इन घड़ियाली आंसुओं का असर नहीं हुआ। एक बार फिर से जिंदगी की हकीकत सामने आई। समय से बड़ा कोई नहीं। चाहे सद्दाम हुसैन हो या फिर मुशर्रफ। अंत एक सा ही होता है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तानाशाह की प्रमुख कांटे&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के लिए चुन चुन कर कांटे बोने वाले फौजी तानाशाह के तौर पर। &lt;br /&gt;(1) याद कीजिए - 2001 में करगिल की चोटियों पर 500 बहादुर भारतीय फौजियों का खून बहाने के लिए यही जनरल जिम्मेदार है। महीनों की तैयारी के साथ सादी वर्दी में पाकिस्तानी फौजी टिड्डियों की तरह करगिल की चौटियों पर काबिज हो गए थे। देर से भारत को खबर लगी - और उस वक्त चोटियों को आजाद करवाने में नाकों चने चबाने पड़ गए। ये था मुशर्रफ का बोया पहला कांटा। उस वक्त तो वो सत्ता में भी नहीं थे, नवाज शरीफ सरदार थे - लेकिन फौज और आईएसआई की लगाम मुशर्रफ के हाथों में ही थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(2) 13 दिसंबर 2001 - भारत के दिल पर सीधा हमला, आत्मघाती हमलावरों ने सीधे संसद में गोलियां चलानी शुरू कर दीं। इस हमले से पूरी दुनिया सन्न रह गई, जांच पड़ताल हुई तो नाम सामने आया पाक खुफिया एजेंसी, बेहद चालबाज और कुटिल आईएसआई का। कहा गया कि ये था मुशर्रफ का बोया दूसरा कांटा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(3) ये वो दौर था जब भारत और पाक के बीच तनाव चरम पर था, जंग की आग कभी भी भड़क सकती थी, सीमाओं पर फौजियों की तादाद बढ़ती जा रही थी। उसी दौर में आगरा में शांति की कोशिश हुई, मुशर्रफ आए और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिले। लेकिन ये बातचीत रंग न लाई, और आगरा के बाद ही करगिल की साजिश परवान चढ़ी।&lt;br /&gt;आज मुशर्रफ न जनरल हैं और न पाकिस्तान के राष्ट्रपति, महाभियोग के डर से ये जनरल मैदान छोड़ कर भाग गया है - लेकिन जाते जाते करगिल की जंग पर आज भी अपनी पीठ थपथपाने से नहीं चूक रहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुशर्रफ का कहना है कि उन्हें राजनीति का शिकार बनाया गया, लेकिन वो भूल जाते हैं कि बबूल का ये पेड़ तो उनका ही बोया हुआ है। मुशर्रफ के अंत की स्क्रिप्ट काफी पहले से पाकिस्तान में ही लिखी जा रही थी। उनके दौर में ही मुल्क में कट्टरपंथियों की एक नई जमात खड़ी हो गई। लाल मस्जिद में कट्टरपंथियों का कब्जा और फिर वहां फौज का हमला इसका गवाह है। बलूचिस्तान, सिंध, अफगानिस्तान से सटे इलाकों में गंभीर संकट खड़े हो गए. मुशर्रफ ने बलूच नेता नवाब खान बुग्ती को हवाई हमले में मरवा दिया। एक एक कर मुशर्रफ के ताबूत में कीलें गड़ती गईं। अंतिम कील बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद गड़ गई। भुट्टो की हत्या में भी शक मुशर्रफ और आईएसआई पर ही आया। लेकिन हैरत है एक अच्छे फौजी जनरल राजनीतिक की बारीकियां समझ न सके, अपने विरोधियों को एकजुट होते देख न सके, इस भ्रम में जीते रहे कि कल का तानाशाह आज का नायक बन गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुशर्रफ के इस्तीफे पर दुनिया भर के देशों ने प्रतिक्रियाएं दी। लेकिन जानकार मानते हैं कि अमेरिका का अफसोस महज दिखावा है। वो कब किसके साथ खड़ा होकर किसकी हत्या की साजिश रच दे, कहना मुश्किल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भारत ने परवेज़ मुशर्रफ़ के इस्तीफ़े को पाकिस्तान का अंदरूनी मामला बताया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा इससे ज़्यादा वो और कुछ नहीं कहना चाहता। भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी इस मौका को इस्तेमाल कर भारत में हमले कर सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अमरीका&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने परवेज़ मुशर्रफ़ की तारीफ़ करते हुए कहा कि उन्होंने अल क़ायदा के ख़िलाफ़ अभियान में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि वो आतंकवाद के ख़िलाफ़ खड़े पाकिस्तान से आगे भी हाथ मिलाने के लिए तैयार हैं।&lt;br /&gt;अमरीका की विदेश मंत्री कॉंडोलीज़ा राइस ने परवेज़ मुशर्रफ़ को अमरीका का दोस्त बताया है। उन्होंने कहा कि अमरीका पाकिस्तानी राजनीतिक नेताओं के साथ मिलकर काम करता रहेगा और पार्टियों को चरमपंथ समेत कई समस्याओं से निपटने के लिए दोहरी ऊर्ज लगानी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ब्रिटेन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वहीं ब्रितानी सरकार ने परवेज़ मुशर्रफ़ को शुभकामनाओं देते हुए कहा है कि पाकिस्तान और ब्रिटेन के बीच रिश्ते किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं करते। ब्रितानी विदेश मंत्री डेविड मिलीबैंड ने कहा, कई मायनों में मुशर्रफ़ के कार्यकाल में अहम नतीजे सामने आए। आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग, भारत के साथ बातचीत और भ्रष्टचार ख़त्म करने में मुशर्रफ़ ने भूमकि निभाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अफ़गानिस्तान&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अफ़ग़ानिस्तान ने परवेज़ मुशर्रफ़ के इस्तीफ़े का स्वागत किया है और कहा है कि उनके जाने से इलाक़े पर सकारात्मक असर पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जापान&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उधर जापान के प्रधानमंत्री यासुओ फ़ुकुदा ने उम्मीद जताई कि परवेज़ मुशर्रफ़ के जाने के बाद अमरीका के नेतृत्व में आतंक के ख़िलाफ़ चल रही जंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रूस&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वहीं रूस ने एक बयान में उम्मीद जताई है कि परवेज़ मुशर्रफ़ के इस्तीफ़े से पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यूरोपीय संघ&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वहीं यूरोपीय संघ ने मुशर्रफ़ के जाने को अंदरूनी मामला बताया. यूरोपीय संघ की अध्यक्षता इस समय फ़्रांस के पास है. फ़्रांस ने पाकिस्तान में एकजुटता का आग्रह किया। फ़्रांसीसी विदेशी मंत्रालय ने बयान में कहा , हम चाहते हैं कि अगला राष्ट्रपति और पाकिस्तान सरकार मिलकर काम करेंगे और देश के सामने चुनौतियां का सामन करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में अब सवाल एक ही है। क्या फिर से कश्मीर मसले पर फिर से उबाल आने की आशंका है? अमेरिका के दवाब में मुशर्रफ कम से कम चुप तो रहते थे। पर क्या मियां नवाज शरीफ और जरदारी की मिली जुली सरकार पाकिस्तानी जनता की भावना को भुनाने की कोशिश करेंगे? अगर ये मामला फिर से बढ़ता है तो निश्चित तौर पर दोनों देशों में अशांति और अस्थिरता बढ़ेगी। और अगले युद्ध से इंकार नहीं किया जा सकता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-7300287169101638770?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/7300287169101638770/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=7300287169101638770' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7300287169101638770'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7300287169101638770'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html' title='तानाशाह मुशर्रफ का अंत'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKnk1zuLXBI/AAAAAAAAABI/eTtaGSRvtlE/s72-c/MUSH.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-7623053431891925087</id><published>2008-08-13T15:10:00.000-07:00</published><updated>2008-08-13T15:49:47.810-07:00</updated><title type='text'>शाबाश! बिंद्रा इज्जत रख ली</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKNdGU8XjWI/AAAAAAAAAA4/7FYTsMrlMN8/s1600-h/bindra.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKNdGU8XjWI/AAAAAAAAAA4/7FYTsMrlMN8/s320/bindra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5234129555217157474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ओलंपियन अभिनव बिंद्रा तुमने लाज रख ली यार। वरना सुपर पॉवर बनने की होड़ में जुटा देश और ओलंपिक में निल बट्टे सन्नाटा। अच्छा किया तमाम संस्थानों ने लाखों और करोड़ों रुपए देकर अपना पल्ला झाड़ा। पर शर्मनाक ये है कि जो लोग कुछ भी नहीं लेकर आए उनका क्या किया जाएगा। जवाब एक ही है। अगली बार के लिए तैयारी करेंगे। पर कमी कहां रह गई, खिलाड़ियों की तरफ से या सरकार की तरफ से---न तो इसका विश्लेषण होगा और ही कोई कार्रवाई। चार साल बाद फिर से जब टीम जाने लगेगी तो खिलाड़ियों को भेजने पर राजनीति होने लगेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यकीन मानें तो अपने सिस्टम में ही खराबी है। अभिनव बिंद्रा गोल्ड इसलिए जीत पाया क्योंकि उसके पिता के बहुत पैसा है। उसके पिता ने अपने बेटे की ट्रेनिंग पर अबतक 10 करोड़ से ज्यादा खर्च कर दिया है। क्या झारखंड ने निकला हुआ खिलाड़ी उड़ीसा का कोई चमकता सितारा इसकी हिम्मत जुटा पाएगा। शायद नहीं। अभ्यास अपनी जगह है। पर अब ज़माना प्रोफेशनल अभ्यास का है। बिंद्रा ने कमांडो ट्रेनिंग जर्मनी में जाकर की। आम खिलाड़ी कहां से कर पाएगा। इसमें दोष किसका है? अभिनव के पापा का जिन्होंने अपने पैसे पर बेटे को ट्रेनिंग दिलाई या फिर उस सिस्टम का जहां व्यक्तिगत तौर पर पैसे लगाने वाले ही आगे बढ़ सकते हैं। वरना कुछ दूरी के बाद दम तोड़ देंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केंद्रीय वित्त मंत्री खेल मंत्रालय को हर साल करोड़ों-अरबों रुपए आवंटित कराते हैं। फिर वो पैसा जाता कहां है? खेल के नाम पर नेताओं के विदेश दौरे पर। जिन्हें खेल का ख तक पता नहीं वो खिलाड़ियों के हक पर लात मारकर ऐश करते हैं। रणनीति बनाते हैं। क्रिकेट किसी हद तक सफल इसलिए है क्योंकि बीसीसीआई सरकारी संस्थान नहीं है। टेनिस के चुनिंदा खिलाड़ी इसलिए अच्छा कर पाते हैं क्योंकि अपने पैसे पर वो देश-विदेश में ट्रेनिंग लेते हैं--दौरा करते हैं। शतरंज में देश का नाम इसलिए है क्योंकि विश्वनाथन सरीखे खिलाड़ी अपने पैसे पर दुनियाभर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। जिन खेलों में व्यक्तिगत पैसे नहीं लगे हैं उसका हश्र देखिए। बद से बदतर। आज से बीस साल पहले हॉकी मे देश की तूती बोलती थी। पर आज क्यों नहीं है। वजह साफ है। इसमें सरकारी तंत्र का घुन लग गया है। जबतक सफाया नहीं कर देंगे चैन से नहीं बैठेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैडमिंटन के सितारे प्रकाश पादुकोण ने खेल में इसी सरकारी घुन का विरोध किया था। नतीजा ये हुआ कि सरकारी तंत्र ने उनके खिलाफ आवाज बुलंद कर दी। प्रकाश ने भी फैसला किया कि वो अपनी अकादमी चलाएंगे--इन पचड़ों में नहीं फंसेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बावजूद इसके ओलंपिक में अगर देश की इज्जत कोई रखता है तो उसकी सहनशीलता और खेल के प्रति लगन को सलाम जरूर करना चाहिए। क्योंकि उसने एक तरह से सरकारी तंत्र की गाल पर करारा तमाचा मारा है। पर उसकी इस काबिलियत में खेल मंत्रालय के करोड़ो-अरबों के फंड का एक पाई नहीं लगा है। &lt;br /&gt;सरकारी तंत्र को करारा तमाचा मारने के लिए एक बार फिर से अभिनव को सलाम।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-7623053431891925087?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/7623053431891925087/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=7623053431891925087' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7623053431891925087'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7623053431891925087'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/08/blog-post_13.html' title='शाबाश! बिंद्रा इज्जत रख ली'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKNdGU8XjWI/AAAAAAAAAA4/7FYTsMrlMN8/s72-c/bindra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-4589015258290206386</id><published>2008-08-08T15:11:00.000-07:00</published><updated>2008-08-13T15:55:19.391-07:00</updated><title type='text'>न्यूज चैनल पर साईं की कृपा</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKNmTEbrJ3I/AAAAAAAAABA/Ahx19sV6Z7c/s1600-h/sai+baba.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKNmTEbrJ3I/AAAAAAAAABA/Ahx19sV6Z7c/s320/sai+baba.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5234139669728012146" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वक्त बदला। समाज बदला। लोगों की सोच में परिवर्तन आया। चीजों को देखने का नजरिया बदला। इसमें सबसे ज्यादा बदलाव आया टीवी में। खासकर टीवी न्यूज में। एकदम से उसकी परिभाषा बदल गई। चूंकि प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी इसलिए खबरें भी बदलने लगीं। फिर क्या था। चौथे स्तंभ की पूरी भूमिका पर ही सवाल खड़े हो गए। चूंकि लोग घटिया और दोयम दर्जे के नेताओं को देखकर पक चुके हैं। नेताओं के झूठे गल्प को सुन-सुनकर थक चुके हैं। इसलिए अब उन्हें कुछ ऐसा चाहिए जो उन्हें चौंकने पर मजबूर कर दे। हैरान करने वाली खबरें। सनसनीखेज स्थितियां पैदा करने वाली खबरें। अब तक जो हमारे और आपके बीच आम बातचीत में जिन बातों का जिक्र किया जाता था उससे जुड़ी खबरें। वो फिर चाहे भूतप्रेत हो। नाग नागिन हो। ईश्वर का चमत्कार हो। या फिर कुछ और हो। हर ऐसी खबरों को आम जनता देखना चाहती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम जनता का मतलब बुद्धिजीवी नहीं। बुद्धिजीवी का मतलब--जिनमें हर बात को नकारने की बुद्धि हो। जिनमें सकारात्मकता का पुट कम और ओढ़ी हुई बुद्धि का दिखावा ज्यादा हो। जो बुद्धि मैथुन के अलावा कुछ और करना नहीं जानते। इसलिए खासकर ऐसे लोग जो बुद्धिजीवी हैं उनमें ऐसी खबरों को न तो देखने की क्षमता है न ही इसे पचाने की। अगर वो इसे सहजता से स्वीकार करने लगे तो फिर उन्हें बुद्धिजीवी की श्रेणी के काट दिया जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों टीवी न्यूज चैनल पर साईं की कृपा अपरमपार है। हर दूसरे न्यूज चैनल पर साईं दिख रहे हैं। साईं को देखकर लगता है कि हम न्यूज चैनल नहीं भक्ति चैनल देख रहे हैं। ऐसे में मेरा सवाल ये है कि न्यूज चैनल समाज से अलग तो है नहीं। जो समाज में घटित है उसको दिखाना न्यूज चैनल वालों का पहला कर्तव्य है। अगर साईं रोज़-रोज़ न्यूज चैनल पर नज़र आ रहे हैं तो इसमें क्या बुरा। सिर्फ पत्रकारिता का लबादा ओढ़कर किसी को गाली देना आपको महान नहीं बना सकता। मेरा बड़ा सीधा सा सवाल है---अगर न्यूज चैनल सिर्फ भक्ति दिखाता है तो फिर दर्शक उसे देखना छोड़ क्यों नहीं देते। दर्शक पूरा प्रोग्राम भी देखते हैं उसके बाद गाली भी देते हैं। टिपिकल मध्यवर्ग का चरित्र। मुक्तिबोध का मध्यवर्ग। जो मौके के हिसाब से खुद को बदलने में माहिर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन याद रहे। बम विस्फोट में न्यूज चैनल धमाकों से जुड़ी खबरे दिखाने से कोई परहेज नहीं करता। बल्कि धमाकों के बाद लोग कहते हैं रात-दिन सिर्फ धमाकों से जुड़ी खबरें दिखाकर पका दिया। दरअसल सच्चाई ये है कि लोगों में सहनशीलता रह ही नहीं गई है। अगर संसद में परमाणु करार पर बहस जारी है तो लोग लोक सभा टीवी देखते हैं। लेकिन क्यों। क्योंकि डिस्कशन से जो मनोरंजन हो रहा है वो उस समय किसी और खबरों से नहीं है। लालू की फूहड़ बातें सुनने में सबको दिलचस्पी है। पर किसी सीरियस इशू पर बोलने वाले लोगों को सुनने वाले बहुत कम लोग है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज कल एक फैशन चल पड़ा है टीवी न्यूज चैनल को गाली देना। 'हंस' में स्तंभकार है मुकेश कुमार। खुद टीवी न्यूज से जुड़े रहे हैं। पर शर्म नहीं आती जब वो बौद्धिक मैथुन करते हैं। ज्ञान खूब लंबा देते हैं। पर करते वही हैं जो चल रहा है। और उसके बाद अगर उनसे कोई पूछ ले कि ऐसा क्यों तो कहते हैं---क्या करें मालिक का दवाब है। अरे! मालिक का दवाब है तो नौकरी छोड़ दो। घर बैठो। ज्ञान दो। हंस जैसे मठ चलाने वाले कुछ और पत्रिकाओं में लेख लिखो। जिंदगी चलती रहेगी।  &lt;br /&gt;ऐसे ही दूसरे ज्ञानी हैं अजदक। जनसत्ता के अजदक। यानी सुधीश पचौरी। वामपंथ का लबादा ओढ़कर कुछ भी लिख चलते हैं। किसी की मेहनत का मजाक उड़ा देते हैं। पर अगर खुद उसी काम को करें तब समझ में आएगा कि किसी चीज पर सिर्फ कलम चलाना कितना आसान है और उसे करना कितना कठिन। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमियां सब में है। उसी के साथ जिंदगी जीना भी है। पर ज्ञान और भाषण देने वाले ये भूल जाते हैं कि जो वो कर रहे हैं उसमें वो कितने ईमानदार हैं। अगर आपको पढ़कर गुस्सा आया तो टिप्पणी करें। और अगर नहीं आया तब भी टिप्पणी करें &lt;br /&gt;स्वागत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-4589015258290206386?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/4589015258290206386/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=4589015258290206386' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4589015258290206386'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4589015258290206386'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/08/blog-post_08.html' title='न्यूज चैनल पर साईं की कृपा'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SKNmTEbrJ3I/AAAAAAAAABA/Ahx19sV6Z7c/s72-c/sai+baba.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-7682120740975859045</id><published>2008-08-07T14:20:00.000-07:00</published><updated>2008-08-07T18:36:33.714-07:00</updated><title type='text'>तीन देवियां</title><content type='html'>एक नहीं, &lt;br /&gt;दो नहीं, &lt;br /&gt;तीन देवियां&lt;br /&gt;एक साथ तीन-तीन देवियां। तीनों का भार एक साथ एक शो में उठाने की हिम्मत बड़े बड़ों ने नहीं की। लेकिन शाज़ी साहब में वो ताक़त है, जिन्होंने बेखौफ अंदाज में तीनों के साथ बखूबी निभाया है। जिन तीन देवियों का जिक्र बार-बार किया जा रहा है वो भविष्य की तीन देवियां हैं। इनका जिम्मा है दुनियाभर के लोगों का भविष्य बताना। आज आपका दिन कैसा रहेगा? कितनी सफलता मिलेगी? मनचाहा काम कर पाएंगे या नहीं? बॉस से कितनी खटपट रहेगी? बीवी से तनाव रहेगा या नहीं? बगैरह-बगैरह। शो अच्छा है। पहले स्टार न्यूज़ का सबसे ज्यादा टीआरपी देने वाला शो था। हो भी क्यों नहीं एक साथ तीन-तीन देवियां जो हैं। एक से आपका मन भर जाए तो दूसरे को देखिए। अगर दूसरे से भी मन भर जाए तो तीसरे को देखिए। बहुत खूब जोड़ी बनाई है। क्या तिगड़ी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन लगता है शाज़ी साहब के इस शो की टीआरपी गिरी है। देवियां वही हैं। शैली भी वही है। अंदाज भी वही है। सबकुछ वही है। संभव है पब्लिक इसलिए अब बोर होने लगी है। या तो पब्लिक को अपना भविष्य जानने में दिलचस्पी नहीं। या फिर उन देवियों में कोई दम नहीं रहा। कुछ तो बात है। वरना अचानक ऐसा कैसे हो गया कि तीनों देवियों के कपड़े में अचानक कमी आ गई है। शो अब भी भविष्य का ही है। पर कपड़े में कमी करने की वजह समझ में नहीं आई? क्या पब्लिक उनकी सुंदरता निहारने आती है? क्या शो बनाने वालों को इस बात का अंदाजा है कि उनका पहला मकसद है तीनों देवियों को दिखाना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कर्ट में भविष्य पढ़ने वाली देवियों को भला कौन नहीं देखना चाहेगा। पर मेरा सवाल ये है कि कुछ दिन बाद जब पब्लिक का मन इस रुप से भी भर जाएगा तो क्या कपड़े और छोटे हो जाएंगे? मुझे इंतजार रहेगा उस दिन का जब शो की टीआरपी बहुत गिर जाएगी। और शाज़ी साहब सरीखे लोग अपनी भविष्यवक्ताओं के कपड़े इतने छोटे कर देंगे कि लोगों के लिए ये शो बिलकुल नया अर्थ देगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर टीआरपी पाने का यही तरीका है तो हर न्यूज चैनल को नुस्खा लेना चाहिए और अपने एंकर के कपड़े में लगातार कमी करनी चाहिए। फिर देखिए कमाल। मैं उम्मीद करता हूं वो दिन जल्दी आए। कसम से मज़ा आ जाएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-7682120740975859045?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/7682120740975859045/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=7682120740975859045' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7682120740975859045'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7682120740975859045'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/08/blog-post_07.html' title='तीन देवियां'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-959028407696448497</id><published>2008-08-04T02:10:00.000-07:00</published><updated>2008-08-04T02:45:34.440-07:00</updated><title type='text'>लोकतंत्र नहीं नोटतंत्र</title><content type='html'>कमाल हो गया। &lt;br /&gt;इन नेताओं को देखकर अब शर्म नहीं आती। &lt;br /&gt;आनी भी नहीं चाहिए। शर्म आ गई तो इसका सीधा सा मतलब है आप किसी काम के नहीं है। मतलब ये कि आप नैतिकता, समाज और वगैरह-वगैरह की बातें करने वाले हैं। जिसका अर्थ है आप नकारे है। ठलुए हैं। हमारे कई बौद्धिक मित्र हैं। मीडिया में अच्छा प्रभुत्व रखते हैं। मठाधीश हैं। अपने लठ के बल पर मठ में काबिज हैं। उनकी राय है ठलुए लोग ही नैतिकता की बात करते हैं। जो कुंठित हो जाते हैं वही ज्ञान की सरिता बहाते हैं। या फिर वो ये भी कहते हैं कि जिनको मल उठाने का, बैग उठाने का मौका नहीं मिला वही ऐसी बाते करते हैं। बौद्धिक मित्रों की बातें बड़ी व्यावहारिक हैं। उन्हें जीवन का लक्ष्य पता है। रास्ता पता है। मकसद पता है। इसलिए वो इन घटिया, सड़ी गली सोच में विश्वास नहीं रखते। मैं बार-बार 'बौद्धिक' शभ्द का इस्तेमाल कर रहा हूं इसके पीछे भी उन मित्रों की कृपा है। बौद्धिक होने का मतलब ये नहीं कि बहुत सारी किताबें पढ़ी जाएं। बहुपठित होना बौद्धिक होना कतई नहीं है। कहां से कितना बातें टीप ली जाएं, उन चोरी की गई बातों पर कितने लेख लिख दिए जाए, बड़ी-बड़ी समीक्षाएं प्रकाशित करवाई जाए--बौद्धिक होने का मतलब ये है। बहरहाल बात नेताओं से शुरु की गई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेताओं की हरकतों पर शर्म इसलिए नहीं आती क्योंकि उनकी जड़ में मेरे बौद्धिक मित्र हैं। सोच बौद्धिक मित्रों जैसी ही है। अगर लोकतंत्र के मंदिर में गाल-गलौच न हो, पैसे की नुमाइश न हो तो फिर क्या होगा। हैरत की बात तो देखिए हमारे-आपके जैसे लोग तो जिंदगी भर एड़ी रगड़कर एक करोड़ कमा लें तो उपलब्धि होगी। लेकिन संसद में एक करोड़ रुपए की गड्डियों की नुमाइश इस तरह की गई जैसे बात पांच-दस हज़ार रुपए की हो रही हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुपए जिसने भी दिखाए, आरोप चाहे जिसपर लग रहे हैं पर एख बात तो तय है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में अब पैसे का लोकतंत्र शेष रह गया है। जो जितना बड़ा दलाल, जिसके पास दलाली की जितनी ज्यादा बौद्धिकता, जो फर्राटे से जितने लोगों का गला काट सकता हो---आज देश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा रखवाला वही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया साक्षी है अगर करोड़ों रुपए का लेना-देना नहीं होता तो ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार नहीं बचती। कोई पूछने वाला है कि ये पैसे कौन दे रहा है। कहां से आ रहे हैं पैसे। आम आदमी के लिए जो सपना है नेताओं के लिए हाथ का मैल है। वाह रे नेता। चोरों की जमात। बीजेपी को तकलीफ इस बात है कि उसे मौका नहीं मिला। अगर मौका मिला भी तो वो सरकार गिरा नहीं पाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुख इस बात का नहीं है कि स्वतंत्र देश में नेता सिर्फ अपनी चर्बी का ख्याल रख रहे हैं दुख इस बात का है कि हम एक ऐसे लोकतंत्र का हिस्सा हैं जिसमें अगले 20 साल तक भी कोई खास संभावना नजर नहीं आती। दलाली और बढ़ेगी। न तो घूस देने वाले कम होंगे न ही लेने का मुंह बंद होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या वक्त आ गया है कि फिर से लोकतंत्र को नजरबंद किया जाए। इमरजेंसी लगाई जाए। अगर नहीं तो उपाय क्या है। आप बताइए। आपके सुझाव का स्वागत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-959028407696448497?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/959028407696448497/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=959028407696448497' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/959028407696448497'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/959028407696448497'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='लोकतंत्र नहीं नोटतंत्र'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-6788159667693453883</id><published>2008-06-16T11:14:00.000-07:00</published><updated>2008-06-16T11:52:05.478-07:00</updated><title type='text'>'लीदी' बनो मस्त रहो</title><content type='html'>यकीन मानिए, ये 'मालिक के मल' से थोड़ा हटकर है। मालिक का मल ढोने वालों की तादाद बढ़ते देख मैंने सोचा क्यों न मस्ती की लीद के साथ जिया जाए। इसका अपना मज़ा है। आपको लग रहा होगा ये लीद क्या चीज़ है? लीद क्या मल से अच्छी चीज़ है? जवाब है शायद नहीं। लेकिन दिल बहलाने के लिए कुछ तो होना चाहिए। अगर मलवाहक नहीं हैं तो बनिए 'लीदी' यानी लीद ढोने वाला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग कहते हैं कि कईयों को मलवाहक बनने का मौका नहीं मिलता। इसलिए वो 'लीदी'बन जाते हैं। पर ऐसा नहीं है दोस्त। ज़िंदगी का एकमात्र फलसफा बदबूदार मल ढोना ही नहीं है। कुंए से निकलकर तो देखो मेरी जान। खुद को धुरंधर आंको पर याद रखो जिस दिन 'लीदियों' के दिन फिरेंगे एक तरफ जश्न और दूसरी तरफ मातम होगा। Every dog has a day, लीदियों के लिए एकमात्र नारा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्यकारों और पत्रकारों में 'लीदियों' से ज्यादा मलवाहक है। चूंकि दोनों बौद्धिकता से सीधा वास्ता रखते हैं इसलिए मलवाहकों की भरमार है। जगह हो न हो पर मल ढोने के लिए सिरफुटौवल चलता रहता है। कहीं कोई मौका ऐसा न छूट जाए जिसका फायदा कोई और उठा ले। और ईमानदारी के नाम पर तमगा हंसते-हंसते खींच ले जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगरों में 'लीदी'हैं। लेकिन समय के साथ ऐसी प्रजाति खत्म हो रही है या खत्म होने के कगार पर हैं। किसी का ब्लॉग खोलो, परंपरा का निर्वाह होता दिख जाता है। ब्लॉगीरी में तमाम बड़े-बड़े धुरंधर हैं। मनमाफिक एक दूसरे पर खूब थूकते हैं। दूसरे चटखारे लेकर बात करते हैं। मुझे इंतजार उस दिन का है जब एक खेमा दूसरे को मां...बहन...की गालियां देकर लिखना शुरु करेगें।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;स्पष्टीकरण---मैं अब तक लीदी हूं। कब मलवाहक बन जाऊं कहना मुश्किल है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-6788159667693453883?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/6788159667693453883/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=6788159667693453883' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/6788159667693453883'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/6788159667693453883'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='&apos;लीदी&apos; बनो मस्त रहो'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-7128759826141564637</id><published>2008-05-26T22:21:00.000-07:00</published><updated>2008-05-29T10:50:12.521-07:00</updated><title type='text'>ब्लॉग मतलब भड़ास?</title><content type='html'>हिंदी में ब्लॉगगीरी करने वालों और पढ़ने वालों के लिए सबसे बड़ा सवाल- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(1)क्या ब्लॉग महज भड़ास का एक जरिया है?&lt;br /&gt;(2)क्या ब्लॉग लेखन का पहला मकसद दूसरे को गलियाना ही है?&lt;br /&gt;(3)क्या ब्लॉग का इस्तेमाल अपनी कुंठा निकालने के लिए होना चाहिए? &lt;br /&gt;(4)या फिर ब्लॉग सर्जनात्मकता को एक नया आयाम देने का जरिया है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सारे सवालों के भाव संभवत: एक जैसे ही है। लेकिन इसका जवाब ढूंढना बहुत जरूरी है। जब से ब्लॉगगीरी में मैंने होश संभाला है तब से प्राय: हिंदी ब्लॉग की हालत और बदतर हुई है। ब्लॉग गाली-गलौच का पर्याय बन गया है। मैंने कई पाठकों को ये कहते सुना है कि किसी का ब्लॉग कोई क्यों देखे और पढ़े? पाठकों के मन में उठा सवाल जायज है। कईयों को ये भी कहते सुना है कि ब्लॉगगीरी तो खलिहरों का काम है--उनकी बात पर क्या ध्यान देना जो खलिहर हैं। एक तो ऐसे ही हिंदी पढ़ने और समझने वालों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। ऐसे में ब्लॉग एक सशक्त जरिया बनकर उभरा है। पर इसे भी हमने गलियाने का एक बेहतरीन जरिया बना लिया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतिस्पर्धा हर जगह होती है। हिंदी ब्लॉग में होनी भी चाहिए। लेकिन इसे सकारात्मक तरीके से लिया जाए। भाषा की गरिमा और पाठकों का ध्यान जरूर रखा जाए। जाहिर है मन में आए विचारों को ब्लॉग पर उतारना चाहिए। लेकिन क्या हम कभी  डायरी लेखन में ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जैसा ब्लॉग पर किया जाता है। कहते हैं बुरी चीजें लोगों को ज्यादा जल्दी अपनी तरफ खींचती है। लोग आकर्षित भी होते हैं। लेकिन उसका समाज पर कैसा असर पड़ेगा इसका ध्यान किसी को नहीं रहता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेलीविजन मीडिया में एक कहावत है--इंडिया टीवी न्यूज चैनल नहीं है। वजह साफ है---वहां खबरें कम से कम और इसके अलावा सारी चीजें भरपूर मात्रा में है। मुझे लगता है ऐसे ब्लॉग जो भाषा की गरिमा को ध्वस्त करने में जुटे हैं उन्हें एक नया नाम देकर उसे समाज से अलग कर देना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-7128759826141564637?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/7128759826141564637/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=7128759826141564637' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7128759826141564637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7128759826141564637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='ब्लॉग मतलब भड़ास?'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-2069836978418651988</id><published>2008-04-06T01:13:00.000-07:00</published><updated>2008-04-09T21:57:36.922-07:00</updated><title type='text'>मालिक का 'मल'</title><content type='html'>सृष्टि के निर्माण से ही संभवत: एक मालिक है और ढेर सारे उसके मलवाहक। 'मल' का शाब्दिक अर्थ आप कुछ भी लगा लें-&lt;br /&gt;यह आपकी बुद्धि और विवेक पर छोड़ा जाता है। लेकिन उसका तलीय स्वर और अर्थ लगभग एक ही है- ऐसी चीज़ जिसे हमेशा खराब माना जाता रहा हो। जिसकी प्रकृति सड़ांध फैलाना है। आसपास को अपने होने का एहसास कराना। जिसकी छाया मात्र भी स्वच्छता और सुंदरता को बदबूदार बना दे। 'मल' का फिजीकल एक्ज़ीस्टेंश भी अपने कई रूप में हमारे और आपके आसपास विद्यमान रहता है। वो चाहे चमचे के रूप में हो या फिर मालिक, बॉस की आंख हो या फिर आपका दोस्त बनकर आपकी पीठ में छुरा भोंकने वाला हो। बस यह आपकी काबिलियत पर है कि वो कौन है जिसने 'तैलाभिषेक'(तेल लगाने की परंपरा का नाम रूप) में महारत हासिल की है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मालिक' के अर्थ में भी व्यापकता है। ऐसा नहीं कि जो नौकरी दे रहा है वही मालिक है। जिसने चाहे अनचाहे आपकी ज़िंदगी को बेहतर करने का आश्वासन दे दिया वही मालिक है। अलग-अलग क्षेत्रों में मालिक की परिभाषा बदल जाती है। जिस भी दफ्तर में मालिक ने आपको काम दिया उसकी तो आप पर कृपा है ही। बस ध्यान ये रखें कि अगर आपके अंदर मल ढोने की काबिलियत नहीं है तो फिर जल्दी ही आपके प्रति मालिक का रूख बदल सकता है। ज्यादातर लोगों के साथ यही होता है। लेकिन उसका कारण मालिक की पारखी नज़रें हों ऐसा नहीं है। बल्कि मालिक के पुराने मलवाहक इस काम में इतने सिद्धस्त होते हैं कि वो किसी और नए का हस्ताक्षेप बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। इसलिए ये मत भूलें कि मालिक के साथ-साथ उनके मलवाहकों का भी मल उस नए शख्स को हर हाल में उठाना होगा। मतलब ये कि मालिक का मल उठाने के चक्कर में उनके चमचों के तमाम बदबूदार और सडांध भरे मल भी न चाहते हुए भी लंबे समय तक उठाने होंगे। फिर कई वर्षों बाद अगर मालिक की नज़र आप पर पड़ गई तो समझिए आपकी ज़िंदगी सार्थक हुई। वरना ढोते रहो होरी की तरह दुखों के पहाड़ जैसा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य में 'मालिक' का मतलब एकदम बदल जाता है। साहित्य का मालिक मठाधीश होता है। अगर आप पर मालिक की नज़र किसी गोष्ठी, सेमिनार वगैरह में पड़ गई। और आपके अंदर उन्हें कोई स्पॉर्क नज़र आ गया तब तो आपकी ज़िंदगी तर गई। वरना दफ्तरों के मालिकों और उनके चमचों के मल ढोने से ज्यादा कष्ट उठाना पड़ता है साहित्य में। साहित्य में अकसर ऐसे मालिक मिल जाते हैं तो महिला प्रेमी होते हैं। आज भी ऐसे मालिकों से पूरा जगत जगमगा रहा है। फिर रचना चाहे जैसी हो उस पर पत्रिकाओं में सुनियोजित विवाद उठान लाजिमी है। कोई आत्मकथा लिखे और विवाद न हो--ऐसा कैसे हो सकता है। आश्चर्यजनक तो ये है कि आत्मकथा में भी यशराज फिल्म का पूरा पुट मिल जाता है। पता नहीं मालिकों का कैसा असर है कि उनकी ज़िंदगी भी फिल्मों जैसी लगती है। वाह! मालिक,तेरे मल की कृपा अपरमपार है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रीय नेताओं के मल ढोने की प्रक्रिया तो निरंतर चली आ रही है। शहीद भगत सिंह की फांसी के लिए अब भी कई लोग गांधी को कई मायने में दोषी मानते हैं। लोगों का तो ये बी कहना है कि उसके तल में भी यही स्वर उभर रहा था। शहीद भगत सिंह ने खुद की राह बनाने की कोशिश की। उन्होंने पुराने विचारों को अपने सिर लेने से साफ इंकार कर दिया। बस गांधी को यही नागवार गुजरा। आज तो नेतागीरी में जिसने जितना मल ढोया, जिस सिद्धत से मल ढोया वही आगे गया। वरना पार्टी का झंडा ढोते-ढोते लोगों की उम्र खत्म हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह! मालिक,तेरे मल की कृपा अपरमपार है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-2069836978418651988?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/2069836978418651988/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=2069836978418651988' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/2069836978418651988'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/2069836978418651988'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='मालिक का &apos;मल&apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-7941655266084117318</id><published>2008-03-25T13:00:00.000-07:00</published><updated>2008-03-30T11:43:59.490-07:00</updated><title type='text'>'देखना पढ़ाई में मन न लग जाए'</title><content type='html'>राहुल के कमरे का दरवाजा बंद था। हॉल में बैठे उसके पापा की नज़र अचानक दरवाज़े पर गई। अरे! राहुल का दरवाजा बंद क्यों है? इतना बोलते-बोलते वो उठे और दरवाजे के पास आए। दरवाज़ा खुला था। धीरे से दोनों दरवाज़े को अलग करते हुए अंदर की तरफ झांका। अंदर कुर्सी पर बैठा राहुल सकपकाया। क्या कर रहे हो बेटा? दरवाज़ा बंद करके अंदर क्या कर रहे थे? पापा कुछ भी तो नहीं। बस ऐसे ही बैठा था। अपने अगले क्रिकेट मैच के लिए स्ट्रैट्ज़ी बना रहा था। सोच रहा था कि कैसे खेला जाए कि पहले से बेहतर किया जाए। ठीक है बेटा। सोचो, सोचो। मुझे अच्छा लगा कि खेल के बारे में ही सोच रहे हो। एक सेकेंड के लिए तो तुमने मुझे डरा ही दिया था.....नहीं नहीं छोड़ो। इतना कहकर वो बाहर आ गए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;क्या हो गया? बच्चे पर किस बात के लिए शक कर रहे थे? अपने ही बेटे पर हर समय शक करना अच्छा नहीं है। क्या कर रहे हो? ये मत करो, ये करो। अरे छोड़िए न जो मन में आए उसे करने दीजिए न। नाहक ही परेशान रहते हैं। अरे! नहीं मैं बस ये देख रहा था कि पढ़ाई तो नहीं करने लगा। बस मुझे इसी बात का डर रहता है कि राहुल कहीं किसी दिन ये न कह दे कि पापा मुझे पढ़ाई में मज़ा आता है। मुझे उसे डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार या फिर आईएएस नहीं बनाना भाई। अजीब आदमी हैं आप! लोग अपने बच्चे को पढ़ाने-लिखाने के लिए क्या-क्या नहीं करते। और एक आप हैं कि अपने बेटे को पढ़ाना नहीं चाहते। दरअसल बात वो नहीं है। राहुल पढ़ लिखकर क्या कर लेगा? कितना नाम कमा लेगा? कितने पैसे कमा लेगा? थोड़े से। फिर सारी ज़िंदगी हमलोगों की तरह पैसों के लिए तंग रहेगा। मैं तो चाहता हूं कि क्रिकेट खेले। खूब पैसे कमाए। नाम, पैसा और शोहरत सब एक साथ। देखा तुमने टीम इंडिया के खिलाड़ियों को कितने पैसे मिल रहे हैं। अरे! आने वाले दिनों में रकम तो और बढ़ेगी ही न। हमारे मां-बाप ने हमें खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। पर हम तो इस हाल में हैं कि अपने बच्चे को खेलने के लिए कहें। उसके लिए खर्च करें। और ऐसे में जरा सी भी पढ़ाई की इच्छा जागती रही तो बस हो गया। सब चौपट हो जाएगा। माना कि किस्मत ने साथ नहीं दिया तो टीम इंडिया में नहीं खेलेगा पर इतना तो है ही कि रणजी तक तो पहुंच ही जाएगा। आने वाले दिनों में उसमें भी बहुत पैसा मिलेगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;br /&gt;राहुल के पापा और मम्मी की बातचीत उस समाज की सच्चाई है जब हर तरफ सचिन, धोनी और युवराज जैसे खिलाड़ी घरों में भगवान की तरह पूजे जाते हैं। मुख्य वजह एक ही है पैसा। युवाओं से ज्यादा दिलचस्पी उनके घर वालों में है। ऐसा नहीं कि ये कहानी सिर्फ राहुल के घऱ की है। आज की तारीख में ये हर घर की हकीकत हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;br /&gt;हमारे गुरुओं ने हमें पढ़ाया था कि समाज में परिवर्तन होने में लंबा समय लगता है। कई बार इसमें पचास वर्ष तक का समय लग जाता है। लेकिन क्रिकेट के लिए घरों में ऐसी मानसिकता महज दो-तीन साल के अंदर पैदा हुई है और ये संक्रमित बीमारी की तरह हर घर में फैल रही है। बच्चों के खेलने-कूदने को लेकर किसी को कोई दिक्कत नहीं हो सकती। बल्कि स्वास्थ्य की द़ष्टि से ये लाभप्रद है। पर उसके पीछे का मक़सद इतना ग़लत है जिसका खामियाजा किसी भी बच्चे को भुगतना पड़ सकता है। ऐसे में जो बच्चे आगे चल पड़े वो तो तीर हैं लेकिन जो नहीं चले उनकी ज़िंदगी नरक से बदतर हो जाएगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;ज़ाहिर है बच्चों में कुछ भी जबरदस्ती ठूंसने की कोशिश, उसकी स्वाभाविकता से खिलवाड़ है। ऐसे में ये बच्चे उन तमाम बच्चों से ज्यादा खतरनाक साबित होंगे जिनकी ज़िंदगी पर किसी का बुरा साया पड़ गया हो।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-7941655266084117318?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/7941655266084117318/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=7941655266084117318' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7941655266084117318'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/7941655266084117318'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/03/blog-post_25.html' title='&apos;देखना पढ़ाई में मन न लग जाए&apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8148782327380447472</id><published>2008-03-20T21:40:00.000-07:00</published><updated>2008-03-20T22:57:14.486-07:00</updated><title type='text'>जुझारुओं के लिए पैगाम</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000099;"&gt;कोई दु:ख &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;वही हारा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;जो लड़ा नहीं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;                     -- कुँवरनारायण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;परिस्थितियां पशोपेश में डाल सकती हैं। किंतु परिस्थितियों को हावी होने से बचाना होगा। समय बलवान है। सबकुछ सिखाता-दिखाता है। व्यक्ति दु:ख-सुख से परे रह नहीं सकता। किंतु इनकी सही परिभाषा क्या है? मनुष्य यदि जूझने पर आमादा हो जाए तो क्या नहीं कर सकता? लोग डराते हैं। समाज ताने देता है। परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाती हैं। पर लड़ने से पहले हार जाने वाला सबसे बड़ा कायर है। जूझने में जो मज़ा है वह किसी 'पाने' में नहीं। समझ वही सकता है जिसने पूरे साहस से लड़ाई की हो। सरेंडर कर देना मौत की स्थिति है। किंतु जब तक मौत और जिंदगी का फ़ासला हो, लड़ाई जारी रखनी होगी। दु:ख डिगा सकता है। हिला देता है। बेचैन कर देता है। पर मार नहीं सकता। मरता वही है जो दु:ख को अपने पर हावी होने देता है। समय और समाज उन्हीं के आगे नतमस्तक होंगे जो अंतिम साँस तक अपनी लड़ाई जारी रखते हैं। जीतना जिसका उद्देश्य नहीं, संघर्ष ही जीवन हो। जूझ में ही उद्देश्य निहित है। जीत का आनंद है। खोने और पाने के बीच की जद्दोजहद ही मायने रखती है। 'साहस' उस जीवटता का नाम है जो व्यक्ति से वो तक करवाती है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;दु:ख का दु:ख की तरह लेना कायरता है। आत्मसमर्पण पलायन है। जूझना जीवन है। व्यक्ति को हमेशा विपरीत परिस्थितियों से मुकाबले के लिए तैयार रहना चाहिए। जोखिम कहां नहीं है। पर 'लीक'  पर वे चलें जिनके चरण दुर्बल व हारे हैं। हमें तो बने बनाये ढर्रे बासी और पुराने लगते हैं। जिस काम को करने में जूझ नहीं, रगड़ नहीं, वह बेचैनी नहीं वह मृत प्राय है। ऐसे काम किए तो क्या और न किए तो क्या?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;ज़िंदगी का नामोनिशान प्राप्ति में नहीं &lt;u&gt;प्रक्रिया&lt;/u&gt; में है। जीतना एहसास मात्र है। सफलता से ज्यादा मायने सार्थकता में है। व्यक्ति येन-केन-प्रकारेण अपनी लड़ाई जीत ही लेता है। कभी जायज़ तरीके से, कभी नाजायज़ तरीके से। किंतु जीत कर भी सिर धुनता है। आखिर क्या पाया? कैसे पाया? जब प्रक्रिया पर विचार करता है तो हारे हुए व्यक्ति से ज्यादा खुद को शर्मिंदा पाता है। दो केवल लड़ा, हार-हारकर लड़ा, बिना परिणाम की चिंता किए लड़ा- वही साहसी है। दु:ख उसके साहस के आगे कुछ भी नहीं। जिसने लड़ने का मन ही नहीं बनाया, बीच का रास्ता अपना, जोखिम नहीं उठाया वह जीत का स्वाद क्या जानेगा। जीत और हार तो केवल खोखले शब्द हैं उनमें आत्मा तो 'जूझ'  ही भर सकती है। जिसने प्रतिवाद का जोखिम उठाया उसने वहीं दु:ख को हरा दिया। क्योंकि जुझारु हारने जीतने से भी परे है। दु:ख-सुख उसे बार-बार डराते धमकाते, लुभाते-ललचाते हैं पर जुझारु डिगता नहीं। साहस से काम लेता है और अपनी लड़ाई जारी रखता है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8148782327380447472?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8148782327380447472/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8148782327380447472' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8148782327380447472'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8148782327380447472'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html' title='जुझारुओं के लिए पैगाम'/><author><name>Dr. SUDHA UPADHYAYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07958361936799614500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-66HIZDfgdj4/Tq-lJ04V1xI/AAAAAAAAAEg/jX0R3CNZgRM/s220/copy.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8312371178501029744</id><published>2008-03-16T23:35:00.000-07:00</published><updated>2008-03-17T01:54:54.650-07:00</updated><title type='text'>'KUDOS' गीरी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सीन नंबर 1&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;वाह मजा आ गया! आज तो सर, हमने सबको पीछे छोड़ दिया। लगभग आधा घंटा पहले ख़बर एयर पर थी। सबसे तेज़ और सबसे आगे रखने वाले पानी मांग रहे थे। ऐसे ही करेंगे सर, आपका सिर नीचा नहीं होने देंगे सर। हूं...अच्छा रहा। वाकई मज़ा आ गया। तुमने कमाल कर दिया। देखो, मैं यही रफ्तार और ये जज़्बा चाहता हूं। बस कुछ ज़्यादा नहीं करना है। सबको रुलाकर मारना है। एक अपेक्षाकृत छोटे और दूसरे सबसे बड़े अधिकारी के बीच की बातचीत। बॉस की बातें सुनकर 'क' का मन गदगद हो गया। मन ही मन उसे न जाने क्यों ऐसा एहसास होने लगा कि अब तो बेड़ा पार है। इस बार कोई नहीं रोक सकता...। बुदबुदाया, सा.........देख लेंगे। बड़ा बनता है न! छोड़ेंगे नहीं। &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;बॉस और 'क' के बीच की बातचीत आपस में हुई। वहां एकाध जूनियर ही मौजूद रहे होंगे। इसलिए शंका ये थी कि अगर बॉस ने इस बात का ज़िक्र किसी से नहीं किया तो फिर सारा किया धरा पर पानी फिर जाएगा। हालांकि मंजिल बॉस ही थे। पर इसके बारे में सबको जानना उतना ही जरुरी था जितना अपने हमसैलरी और हमओहदे वाले की बुराई करना। मन में छटपटाने लगा। कैसे इसको सार्वजनिक किया जाए। जब ज्यादा कुछ नहीं सूझा तो तय किया कि मीटिंग में किसी तरह से इसे उठाया जाएगा। &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सीन नंबर 2&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सर, आपने देखा। क्या? वही ख़बर। मैंने तय किया कि चाहे जो हो जाए, किसी भी तरह से सबसे पहले मैं हूं उतारुंगा इस खबर। आपसे बिना पूछे आपका इंटरव्यू का शो गिरा दिया और चढ़ गए। लगभग पैंतालीस मिनट बाद दूसरे चैनल आए इस खबर पर। हां, अच्छा था। हमलोगों ने अच्छा किया। बल्कि मैं आपको एक बात बताऊं कि जब आपका फोन आया उससे पहले हमने बिलकुल वैसा ही ग्राफिक्स ऑन एयर कर दिया था। सर ने सिर हिलाते हुए कहा--हां, पर बिलकुल वैसा नहीं था। बाद में तुमने देखा कि दूसरों के पास कितना बढ़िया ग्राफिक्स था। नहीं, नहीं सर, वो तो शुरुआती ग्राफिक्स था। चूंकि उसे ऑन एयर करना था इसलिए उसे वैसे ही जाने दिया। अब वैसा ही बन रहा है जैसा कि आप कह रहे हैं। हां, ठीक है बनते ही इसे एयर पर डाल देना। जी, जी सर। एक अपेक्षाकृत बड़े और दूसरे सबसे बड़े अधिकारी के बीच की बातचीत। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सीन नंबर 3&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सर के जाते ही 'ख' महोदय ने तय किया कि अब थोड़ा औऱ नंबर बढ़ाया जाए। धड़ाधड़ मेल खोला और शुरु कर दी 'कुडोसगीरी'। कुडोस का शाब्दिक अर्थ जो भी होता हो पर उसका भाव ये है कि अच्छा काम करने वाले उस व्यक्ति विशेष को प्रोत्साहित करना और तारीफ करना। 'ख' सर ने कुडोसगीरी में इस बात का ख्याल रखा कि कहीं इससे सीधे-सीधे ये न झलक जाए कि उन्होंने सारा श्रेय ले लिया। पर इस बात का भी ख्याल रहे कि अपने बारे में, अपने नेतृत्व क्षमता का भी बखान न छूटे। जैसे ही मेल सेंड किया कि बस उस पर उनके चाहने वालों ने चिड़िया बिठाना शुरु कर दिया। एक ने किया, दूसरे ने किया, तीसरे ने किया। बारी-बारी से तमाम एकराही ने चिड़िया बिठाई। पर बॉस ने अबतक चिड़िया नहीं बिठाई। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color:#ffffff;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सीन नंबर 4&lt;/span&gt;व&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;दोपहर की संपादकीय मीटिंग जारी है। खबरें बताने का सिलसिला शुरु हुआ। जैसे ही दिन वाली खबर का ज़िक्र हुआ कि 'क' तपाक से दूसरे के मुंह से बात छीन ले गए। हां, इसके बारे में मैं बताता हूं। इसमें अब फलां-फलां डेवलप्मेंट हो चुका है। स्टोरी लिखी जा चुकी है जल्दी ही एयर पर होगी। बात खत्म करते हुए 'क' को लगा कि जैसे मोटापे के बावजूद एक ही सांस में ग्राउंड का दस चक्कर लगा लिया हो और थकान का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं। तभी अपेक्षाकृत बड़े अधिकारी 'ख' सर ने 'क' से पूछा- लेकिन स्टोरी में जो सबसे जरूरी बात होनी चाहिए वो जानकारी तो है ही नहीं। उसको दोबारा बनवाना पड़ेगा। बहुत बकवास बन रही है स्टोरी। ये क्या एक झटके में 'ख' सर ने सारे किए धरे पर मिट्टी भरा ट्रक गिरा दिया। हालांकि 'ख' ने कुडोसगीरी का खेल खेलकर पहले ही बाजी मार ली थी। लेकिन अब और पुख्ता कर विजय मुस्कान पूरे कॉन्फ्रेंस रूम पर फेंकी। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;मीटिंग में मौजूद लोग भी इस खेल से वाक़िफ़ थे। लेकिन आज बारी उनकी नहीं थी इसलिए ज़्यादातर लोगों के ओठ खिले हुए थे। सर भी जानते थे असलियत। पर वो भी चुप थे।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;u&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/u&gt;&lt;br /&gt;&lt;u&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सीन नंबर 5&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/u&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;जूनियर्स फिर से बात करते पाए गए---हम लोग मजदूर हैं। सारा काम हमने किया पर श्रेय लेने के लिए होड़ा-होड़ी चल रही है। छोड़ों यार, अरे! यार, हमारी किस्मत गधे के .....और फुलस्टॉप हाथी के.....। एक साथ सब जोर से हंस पड़े। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8312371178501029744?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8312371178501029744/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8312371178501029744' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8312371178501029744'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8312371178501029744'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/03/kudos.html' title='&apos;KUDOS&apos; गीरी'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-8350579679069897842</id><published>2008-03-13T23:17:00.000-07:00</published><updated>2008-03-14T00:19:02.887-07:00</updated><title type='text'>बदल गई परिभाषा</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000099;"&gt;"पत्रकार और साहित्कार में कोई अंतर है क्या? मैं मानता हूं कि नहीं है। इसलिए नहीं कि साहित्कार रोजी के लिए मीडिया में नौकरी करते हैं, बल्कि इसलिए पत्रकार और साहित्यकार दोनों नए मानव संबंध की तलाश करते हैं। दोनों ही दिखाना चाहते हैं कि दो मनुष्यों के बीच नया संबंध क्या बना। दोनों के उद्देश्य में पूर्ण समानता है। कृतित्व में समानता कमोबेश है। पत्रकार जिन तथ्यों को एकत्र करता है उनको क्रमबद्ध करते हुए उन्हें परस्पर संबंध से विच्छिन्न नहीं करता जिससे वे जुड़े हुए और क्रमबद्ध हैं। उसके ऊपर तो यह लाजिमी होता है कि वह आपको तर्क से विश्वस्त करे कि यह हुआ तो यह इसका कारण है, ये तथ्य हैं और ये समय, देश, काल परिस्थिति आदि हैं जिनके कारण ये तथ्य पूरे होते हैं। "( लिखने का कारण- रघुवीर सहाय-पृष्ठ-177)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहाय जी ये पंक्तियां उद्धत करने का मेरा मक़सद ये नहीं है कि मैं किसी को ये बताऊं कि कोई पत्रकार और साहित्यकार क्यों बना और क्यों बनना चाहता है। मैं सिर्फ ये इशारा करना चाहता हूं कि सामाजिक संरचना के टूटने और उसके बिखरने के पीछे जो प्रेरक तत्व काम कर रहे हैं उसे सही तरीक़े से दर्शाया जा रहा है कि नहीं। अगर हां तो फिर पत्रकारों द्वारा किया गया कार्य सही दिशा में अग्रसर है। और अगर ऐसा नहीं हो रहा है सिर्फ स्वार्थ सिद्धि का भौंडा खेल चल रहा है तो फिर उसे कृपया पत्रकारिता मत कहें। सीना ठोंक कर ये दावा न किया जाए कि हम समाज का असली चेहरा लोगों तक पहुंचाने के लिए वचनबद्ध हैं। प्रतिबद्धता और दिखावे में जब भी घालमेल होगा कि परिभाषाएं अपना स्थाई अर्थ बदलने लगेंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल सामाजिक परिवर्तन का जो दौर आज है उसमें खुद को दूसरों से ज्यादा बेहतर बताना और जताना नितांत आवश्यक मंत्र माना जाता है। आत्मप्रचार के इस दौर में ईमानदारी और निष्ठा मायने नहीं रखती। मायने रखता है बाज़ार। बाज़ार में खुद को बेचने के लिए कितने फंडे अपनाए जाएं ये मुख्य बात है। इसके लिए फिर चाहे खबरों को फैब्रिकेटेड कर के जनता को पेश किया जाए या फिर लोगों को जहर की गोलियां खाने के लिए पैसे ही क्यों न दिए जाएं या फिर आत्मदाह के लिए सोचने वाले शख्स को केरोसिन तेल और माचिस ही क्यों न देना पड़े। सब जायज है। बाज़ार मानवता से कहीं बहुत ज्यादा बड़ा हो गया है। संवेदना और बाज़ार दो अलग-अलग चीजें हैं। जिनका आपस में कभी कोई संबंध नहीं रहा है। ये तब है जब आम लोगों में मानवाधिकार और अधिकारों को लेकर सचेतनता पहले से बहुत ज्यादी बढ़ी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम प्रचलन में एक बात धडेल्ले से कही जाती है कि आज के नेताओं ने राजनीति की परिभाषा के स्थाई भाव को ही बदल दिया है। पिछलों कुछ वर्षों में यही बात पत्रकारिता के लिए आम हो गई है। सुर्खियों में रहने के लिए मीडिया ने भी एक ही एजेंडा सेट कर लिया है--खब़र हर कीमत पर। इसकी सकारात्मकता बड़े मायने रखती है पर इसका दुरुपयोग किसी भी हद तक हो सकता है। होशियार और समझदार पत्रकार जानते हैं कि मीडिया में आग कैसे लगाई जाती है, एकदम से बुलंदी कैसे पाई जाती है, बॉस की आंखों पर पट्टी कैसी चढ़ाई जाती है। ये एक बार हो गया कि बस। चैन और आराम तय है। फिर चाहे कोई कुछ भी कह ले। अपने हिसाब से खबरों को गढ़ा जा सकता है। उसके लिए योजना बनाई जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे स्टिंग ऑपरेशन हो या फिर तथाकथित बड़ी खबरों को ब्रेक करने की होड़ हो--घालमेल की गुंजाइश ज्यादा रहने लगी है। जनता की आंखों में धूल झोंककर टीआरपी जुटाया जाता है। पर साख पर एक बार बट्टा लग गया तो फिर उसका कलंक ताउम्र साया बनकर चलता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-8350579679069897842?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/8350579679069897842/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=8350579679069897842' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8350579679069897842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/8350579679069897842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='बदल गई परिभाषा'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-4094301964051888142</id><published>2008-02-21T19:58:00.000-08:00</published><updated>2008-02-21T20:34:25.271-08:00</updated><title type='text'>'बाज़ार में सब नंगे हैं'</title><content type='html'>एक समय था जब समाज में बिकाऊ लोगों को बड़ी खराब नज़र से देखा जाता था। जो बिक जाते थे वो उस पर पर्दा करते फिरते थे। सबसे ज्यादा डर इस बात का होता था कि लोगों को किसी भी सूरत में इस बात की जानकारी न हो। बल्कि ये शर्त रखी जाती थी कि इसके बारे में किसी को पता नहीं चलना चाहिए। और अगर पता चला तो फिर खैर नहीं। गवाह भी इस बात को उसी समय दफना देते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बदला समाज बदला। कहते हैं परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। समाज में तमाम परंपराएं विखंडित हुईं। समझदारों ने उन परंपराओं को मानने वालों को पिछड़ा और गंवार की संज्ञा दी। इसी देखा-देखी में लोग एडवांस कहलाने की होड़ में जुट गए। बस क्या था। सारी परिभाषाएं बदल गईं। नब्बे के दशक में ग्लोबलाइजेशन की ऐसी मार पड़ी कि हर संबंध में अर्थ घुस गया। जीवन औऱ मृत्यु को छोड़कर हर चीज पैसे के तराजू पर चढ़ गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरीरदार की तूती बोलने लगी। वो चौड़ा होकर धूमने लगे। अपने दम खम पर किसी को भी नंगा करने की बोली बोलने लगे। अभी दो दिन पहले किस क़दर खरीरदारों ने क्रिकेट खिलाड़ियों को नंगा किया-इसको दुनिया ने लाइव देखा। वाह मज़ा आ गया। वर्षों की मेहनत और लगन को एक झटके में नंगा कर दिया गया। दुनिया के सबसे महानतम बल्लेबाज सचिन तेंडुलकर महज 439 करोड़ की औकात रखते हैं। (महज शब्द का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए है कि किसी की शख्सियत को पैसे से तौला नहीं जा सकता) अब उनके बल्ले से आग बरसे या अंगारे उनकी कीमत उन्हें बता दी गई है। वो भी खुश और दुनिया भी स्तब्ध। अब भविष्य में जब भी सचिन की चर्चा होगी इसका जि़क्र जरूर होगा कि उनकी कीमत 439 करोड़ है। डॉन ब्रेडमैन ने ताउम्र भले ही इतने पैसे कभी नहीं देखे हों पर उनके सामने सचिन बहुत बौने हो गए। वरना सचिन की जब भी बात चलती ब्रेडमैन की याद आना स्वाभाविक था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर पैसे के तराजू की ही बात करें तो धोनी ने सचिन को भी धो डाला। देखने में बात इतनी सी लग रही है पर ये सबको पता है कि धोनी सचिन की बराबरी कभी नहीं कर सकते। काबिलियत में धोनी कभी सचिन के पास भी नहीं फटक सकते। पर चूंकि बाज़ार में सब नंगे हैं। बिकने के लिए तैयार खड़े हैं फिर शर्माना कैसा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामाजिक सरोकार से जुड़े लोगों का कहना है कि ऐसी बोली तो लोग रेड लाइट एरिया में जाकर लगाते हैं। पर मुझे लगता है वक्त बदला है इसलिए अब लोगों की बोली लग रही है वो भी सरेआम। बिना शर्म औऱ संकोच के। ज़ाहिर है बिकने की ये नई पद्धति अब समाज में बढ़ेगी और समाज  को नए तरीके से परिभाषित करेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो एक नया फैशन चलेगा, जो जितनी बार बिका वो उतना ही खरा और बढ़िया माना जाएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-4094301964051888142?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/4094301964051888142/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=4094301964051888142' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4094301964051888142'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/4094301964051888142'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/02/blog-post_21.html' title='&apos;बाज़ार में सब नंगे हैं&apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-3690675018563979467</id><published>2008-02-16T22:43:00.000-08:00</published><updated>2008-02-16T23:09:42.220-08:00</updated><title type='text'>मीडिया का राखी प्रेम</title><content type='html'>न्यूज़रूम में हर कोई गदगद। मजा आ गया। क्या ख़बर हाथ लगी है। टीआरपी तो पक्का मिलेगी। छा गए गुरु। मैदान मार लिया। इस बार नंबरदार चैनलों से हमारी टीआरपी भी बहुत पीछे नहीं रहेगी। एक अनुभवी पत्रकार ने कहा राखी सावंत हमेशा से टीआरपी देती रही है। राखी टीआरपी माता है। दूसरे ने टोका-नहीं नहीं माता कहकर माताओं का अपमान। तीसरे ने कहा-अरे क्या बात करते हो, राखी को माता कहकर आपने राखी का अपमान किया है। इसके लिए आपको भरे न्यूजरूम में माफी मांगनी पड़ेगी। सब लोग जोर से हंस पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल राखी सावंत ने निहायत ही फूहड़ तरीके से अपने पिछलग्गू बॉयफ्रेंड अभिषेक के साथ मीडिया का मजाक उड़ाया। राखी और अभिषेक ने मीडिया को कालिख पोतते हुए सबको खूब बेवकूफ बनाया। वैलेंटाइन डे से पहले दोनों ने बकायदा मीडिया में खबर पहुंचवाई की उनकी दोस्ती टूट गई। खबरों में आगे रहने वाले चैनलों ने दोनों का फोनो इंटरव्यू भी चलाया। वाह-वाही भी लूटी। और वैलेंटाइन डे के दिन नेशनल मीडिया के सामने दोनों की दोस्ती फिर से पुख्ता हो गई। वाह क्या दोस्ती है। कैमरे के लिए सबकुछ चलता है। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कोई औऱ नहीं मीडिया ही है। उनके मुंह में खून मीडिया ने ही लगाया। Times Now ने समझदार चैनल बनकर इस मसले पर गंभीर चर्चा भी की। लेकिन सवाल ये है कि अगर आम आदमी ने ऐसा किया होता तो क्या times now ने ऐसी चर्चा की होती। शायद नहीं। चाहे जितने वादे किए जाएं, चाहे जितनी गालियां दी जाएं पर हर चैनल का स्थाई भाव एक ही है।&lt;br /&gt;न्यू चैनलों में काम करने वालों ने अबतक न जाने कितनी गालियां दे दी होंगी मुझे। आपका अधिकार है। किसी को भी कुछ देर के लिए गाली दे सकते हैं। चौड़े होकर। लेकिन ये न समझें की मैं इन मामलों को धुर विरोधी हूं। मैं भी यही करता हूं। पर मन की पीड़ा है उससे आपको तो अवगत कराऊंगा ही।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-3690675018563979467?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/3690675018563979467/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=3690675018563979467' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3690675018563979467'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3690675018563979467'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/02/blog-post_16.html' title='मीडिया का राखी प्रेम'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-1775100531859304674</id><published>2008-02-03T08:18:00.000-08:00</published><updated>2008-02-03T09:10:00.800-08:00</updated><title type='text'>कहां भटक रहा तेरा 'हंसा'</title><content type='html'>90 के दशक के बाद साहित्य में विधाओं की सारी सीमाएं ध्वस्त हो गई। उपन्यास, संस्मरण, यात्रा वृतांत और कहानियों में कोई बाहरी दीवार नहीं रही। हर विधा एक दूसरे में समाहित होकर नया अर्थ पाने की कोशिश में है। लेकिन साहित्य में दो परंपराएं हमेशा से बनी रही हैं। चाहे आदिकाल का साहित्य रहा हो, भक्ति काल का या फिर रीति काल का। एक खेमा सत्ता विरोधी साहित्यकारों का रहा है और एक दूसरा भाट कवियों का। खूब वाहवाही की और बदले में तमाम सुख सुविधाएं मिलीं। ऐसा नहीं कि आधुनिक काल में इस परंपरा में कोई कमी आई। बल्कि उत्तरआधुनिकता के बाद दूसरी परंपरा में असमान रुप से वृद्धि हुई। उसी का एक जीता जागता और हर तरह से परिपूर्ण है उदाहरण 'हंस' पत्रिका का जनवरी अंक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हंस पत्रिका का जनवरी अंक खास तौर से समर्पित है दलित साहित्य के लिए। बाबा साहेब के जन्म दिन को ध्यान में रखते हुए संपादक मंडल ने सही समय चुना। ज़ाहिर है 90 के बाद दलित साहित्य और स्त्री विमर्श पर लगातार काम हो रहा है। अच्छा भी है। इस लिहाज से हंस का दलित साहित्य का अंक देखकर अच्छा भी लगा। लेकिन जैसे-जैसे उसका पढ़ना शुरु किया, एकदम से समझ आ गया कि ये प्रयास दलित साहित्य को बेहतर करने का  नहीं है। बल्कि उसको खत्म करने का है। जिस तरह से दलितों के हितों से ज्यादा खुद का ध्यान रखने वाली मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी का लगभग हर पन्ने पर गुणगान किया गया है उसको देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये साहित्य की किस परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है। कहने में कोई गुरेज नहीं है हंस का संपादक मंडल साहित्य का नहीं संस्था के विकास पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। हंस का स्तर इतना गिर सकता है ये सोचकर हैरानी होती है। दूसरों के हंसी खुशी में टांग अड़ाने वाले हंस के संपादक को यह समझ में आ गया है कि पत्रिका को उन्होंने शीर्ष पर पहुंचा दिया है। बस अब थोड़ा नहीं बहुत ज्यादा पैसा कमाया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक पल के लिए मान लेता हूं कि प्रमुख संपादक को गोष्टी और न्यूज चैनलों से फुर्सत नहीं मिली होगी पत्रिका की रुप रेखा तैयार करने में। पर अन्य सहयोगी, कार्यकारी संपादक ने क्या आंखें मूंद ली थीं। या फिर ये तय था कि सिर्फ गाली न लिखकर कोई कुछ भी लिखे हंस में आप छाप देंगे। लानत है ऐसी साहित्य सेवा पर। माना कि हंस अब आपलोगों की बपौती है पर पाठकों का विश्वास मत तोड़िए। आप ढूंढते तो टेकचंद जैसे और अच्छे कहानीकार मिल जाते। पर क्या फर्क पड़ता है। लोग कूड़ा-करकट पढ़ ही लेंगे। हंस का फरवरी का अंक मैंने नहीं देखा है। पर मेरा मानना है कि ज्यादातर पाठकों की राय लगभग ऐसी ही होगी। दरअसल साहित्य हमेशा से दलितों का ही होता है। (कृपया दलित को जाति से जोड़कर नहीं, व्यापक अर्थ में देखें) और साहित्य में राजनीति का दखल भी होना चाहिए। पर राजनीति का मतलब स्वार्थपरता नहीं बल्कि भारतेंदु की पंक्तियों की तरह---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीति समुझै सकल, पावहिं तत्व विचार&lt;br /&gt;पहिचानहिं निज धर्म को, जानहिं शिष्टाचार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वविदित है आज न तो कोई निज धर्म को पहचानने वाली राजनीति करता है और न ही शिष्टाचार को ध्यान में रखा जाता है। ऐसे में भला हंस इससे अलग कैसे हो सकता है। मैं जानता हूं कि मेरे जैसे एक पाठक का हंस से नाता तोड़ लेने पर कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा। पर इतना तो जरूर कहूंगा कि राजेंद्र जी की जीवन भर की साहित्य सेवा पर बट्टा जरूर लग जाएगा। राजेंद्र जी ने ही अमिताभ बच्चन को चिठ्ठी में लिखा था कि चूंकि वो एक सेलिब्रेटी हैं इसलिए व्यक्तिगत चीजों से ज्यादा उन्हें समाज की चिंता करनी चाहिए। जाहिर है इसी धर्म का पालन हंस को साहित्य के लिए करना होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-1775100531859304674?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/1775100531859304674/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=1775100531859304674' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/1775100531859304674'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/1775100531859304674'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='कहां भटक रहा तेरा &apos;हंसा&apos;'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-1141541127229247532</id><published>2008-01-27T07:40:00.000-08:00</published><updated>2008-01-27T07:41:55.337-08:00</updated><title type='text'>विडंबना</title><content type='html'>प्राय:&lt;br /&gt;जलने वाली चीज़ें&lt;br /&gt;बीड़ी या सिगरेट होती है&lt;br /&gt;जिसे, आखिरी कश के बाद&lt;br /&gt;कुचल दिया जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सच्चाई से हर 'लघु मानव रू-ब-रू है। ('लघु मानव' टर्म प्रसिद्ध आलोचक और साहित्यकार विजयदेव नारायण साही का है।) दरअसल इस वैश्वीकरण के दौर में होड़ है आगे चलने की। मंजिल पर पहुंचने की। मंजिल कहां है? दौड़ने वाले को स्पष्ट नहीं है। दूसरों को देखकर, दूसरों की तरह जीने की लालसा मंजिल बन जाती है। खूब तरक्की, बड़ा ओहदा और अपने वृत्त में यश। पर सच मानिए, ये मंजिल नहीं है। ये तो दूसरों को देखकर देखा गया सपना है। लेकिन इन सपनों को पाने में पूरी ज़िंदगी लग जाती है। पूरी ज़िंदगी से मतलब है संवेदना, ऊर्जा और आत्मीयता को लगातार होम करना पड़ता है। महानगरों की ज़िंदगी का स्थाई भाव सिर्फ और सिर्फ यही है। यही स्थाई भाव देश के दूसरे हिस्सों में निरंतर प्रवाहित हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानगरों का एक और स्थाई भाव होता है विडंबना। यहां बिना मतलब के, बिना ज़रूरत के लोगों परिवार वालों से भी नहीं मिलते। ऐसा नहीं कि पारिवारिक संबंध में दुराग्रह है। बल्कि समय की कमी। इसकी बड़ी वजह है दूरी। यही दूरी धीरे-धीरे संबंधों में भी परिवर्तित होती जाती है। ज़ाहिर है भविष्य में महानगरों की संख्या और बढ़ेगी, हम तरक्की की राह पर अग्रसर होंगे। पर इसमें लगातार पीछे छूटता जाएगा अपनत्व। हम सब इसके लिए अभिशप्त हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-1141541127229247532?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/1141541127229247532/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=1141541127229247532' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/1141541127229247532'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/1141541127229247532'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/01/blog-post_27.html' title='विडंबना'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-3240368235822833344</id><published>2008-01-23T23:39:00.000-08:00</published><updated>2008-01-24T00:25:19.710-08:00</updated><title type='text'>'रैकेट' की महिमा</title><content type='html'>'रैकेट'। आज की तारीख में सबसे प्रचलित शब्द। अगर रैकेट है तो जीवन सार्थक। और अगर रैकेट नहीं है तो सब बेकार। ऐसा नहीं कि ये शब्द महज महानगरों के लिए उपयोगी है। इसका विस्तार तो हर क्षेत्र और हर स्तर पर हुआ है। रैकेट का पर्याय है बढ़िया मैनेजर। जानकारों का मानना है कि बिना रैकेट के न तो कोई अच्छा मैनेजर हो सकता है और न ही वो किसी बेहतर काम को अंजाम दे सकता है। आप अगर नज़र दौड़ाएंगे तो आपको हर तरफ ऐसे लोग आसानी से मिल जाएंगे। कुछ धुरंधर रैकेटियर और कुछ उस प्रक्रिया में अग्रसर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देशकाल और समय दोनों में रैकेट की इतनी ज़रूरत है कि अगर आपने इस दिशा में काबिलियत हासिल नहीं कि तो आप अनफिट हैं। जी हां, आप नकारे और महज दो कौड़ी के करार दिए जाएंगे। ये और बात है कि जिनके पास रैकेट है वो भी दो कौड़ी के ही होते हैं। न कम न ज्यादा। अनफिट का सीधा मतलब है आपका चालाक न होना। तिकड़मी राजनीति में बुद्धू। समय को देख परख कर काम न करने वाला। संभव है आप एकदम सही हों पर उसका क्या मतलब। वो किसी के काम नहीं आएगा। मैनेजर तो वो है जो खुद का ज्यादा और दूसरों का कम ध्यान रखे। खुद की लकीर बड़ी करने की कोशिश करे। उसके लिए चाहे चरित्र का कितना भी हनन हो, क्या फर्क पड़ता है। सामाजिक सरोकारों को समझने वाले कहते हैं कि उत्तर आधुनिकता का दौर है। अगर शख्स का अपनी समझ और अपना आदर्श है। इसे चरित्र से कतई जोड़ा नहीं जा सकता। संभव है उनकी बातों में दम हो। पर दिन के आखिर में हर कोई खुद में तो झांकता ही होगा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रैकेट से जुड़ा ही  एक मजेदार वाक्या आपसे शेयर करता हूं। लोग मुझे कहते हैं तुम क्या करोगे ज़िंदगी में। सिर्फ काम, काम और काम से कोई शख्स बड़ा नहीं बनता। जबतक रैकेट का इस्तेमाल न हो उच्चाई पर चढ़ना मुश्किल है। जाहिर है जो सलाह दे रहे हैं वो मेरा भला चाहते हैं। पर मैं कैसे मानूं कि ईश्वर ने मुझे जितनी किस्मत दी है, जितनी ताक़त दी है उसे कोई अपने रैकेट से छीन लेगा। मेरी रफ्तार धीमी पड़ सकती है पर मैं रूक जाऊंगा...ऐसा नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं दफ्तरों में बॉस के पसंदीदा वही होते हैं जो रैकेट में माहिर हैं। जिनके रैकेट का दायरा बड़ा है। दरअसल समाज में चमचागीरी का ऐसा प्रकोप है कि बिना उसके न तो तरक्की मिलती है और न ही इज्जत। रैकेट का दुष्प्रभाव ऐसा है कि साहित्य में फ्लैप पढ़कर समीक्षा लिखने वालों की वाहवाही ज्यादा है पर गंभीर समीक्षा को दरकिनार कर दिया जाता है। हंस जैसे तमाम तथाकथित पत्रिकाओं में रचनाएं  उनकी छपती है जिनका संपादक से सीधा संबंध है। जाहिर है उन्हें भी रैकेट का खूब अच्छा ज्ञान है।  पत्रकारिता में बड़े वो माने जाने लगे हैं जो बॉस से लगातार संपर्क में हैं। बॉस को मक्खन लगाकर उनकी चमचागीरी करते हों। लोगों की शिकायतें बॉस तक पहुंचाते हों। जाहिर है बॉस को भी पसंद हैं ऐसे ही लोग। यही वजह है कि उनकी आंखों पर पर्दा चढ़ता जाता है और उनके खिलाफ एक लंबी फौज खड़ी होती जाती है। आज का सार तत्व यही है कि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहिमन रैकेट राखिए, बिन रैकेट सब सून&lt;br /&gt;चमचागीरी है एक अस्त्र, वरना धून तो धून&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-3240368235822833344?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/3240368235822833344/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=3240368235822833344' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3240368235822833344'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3240368235822833344'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/01/blog-post_2581.html' title='&apos;रैकेट&apos; की महिमा'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-3065337041256035605</id><published>2008-01-23T10:36:00.000-08:00</published><updated>2008-01-23T10:37:37.488-08:00</updated><title type='text'>काश! ये साल न आता</title><content type='html'>12 जनवरी से आगे&lt;br /&gt;------------------&lt;br /&gt;निरंजन को समझ नहीं आया कि क्या हो गया। वो धड़ाम से सड़क के उपर उछला और धम्म से गिरा। कुछ देर पहले तक बीवी,बच्चे और बुढ़ी मां के लिए सपने बुनने वाले निरंजन की आंखों के सामने स्याह और लंबी आकृति नाचने लगी। और फिर उसकी आंखों ने हमेशा के लिए सपने देखना बंद कर दिया। घर का चिराग सड़क पर चली तेज आंधी में बुझ गया और देखते ही देखते खो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़खड़ाती गाड़ी से एक सज्जन निकले। उन्होंने गालियों की बौछार कर दी। लेकिन उन पढ़े लिखे सज्जन की हालत ऐसी थी कि वो ठीक से खड़ा बी नहीं हो पा रहे थे। नए साल का जश्न मनाकर किसी होटल से लौट रहे थे। उन्हें पता था कि गलती उनकी है पर वो इस बात को मानते कैसे। महानगर के कल्चर है अपनी गलतियों पर पर्दा डालना और दूसरों पर थू-थू करना। अगर आदत नहीं है तो लोग इसे अर्जित कर लेते हैं। तभी कहीं से पीसीआर वैन आ गई। पुलिस ने निरंजन को जैसे तैसे उठाया और पास के अस्पताल में भर्ती कराया। लेकिन निरंजन की किस्मत में नया साल देखना नहीं लिखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुलिस ने उन अंग्रेजी दां सज्जन को गिरफ्तार किया। लेकिन तमाम बड़े लोगों की पैरवी और सिफारिश के आगे पुलिस नतमस्तक हुई। सज्जन हंसते हुए घर गए। लोगों के पूछने पर जवाब दिया--क्या बताऊं आइसक्रीम वाला बीच में आ गया था, मैंने बचाने की पूरी कोशिश की। पर क्या किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निरंजन का घर बिखर गया। बुढ़ी मां की ज़िंदगी भले ही किसी तरह गुजर जाएगी पर उसके बच्चे और बीवी का क्या होगा? समय के साथ निरंजन की मौत भी लोगों की नज़र से ओझल हो जाएगी। पर सवाल ये है कि निरंजन की मौत का जिम्मेदार कौन है? नशे में धुत्त सज्जन? सिफारिश के आगे नतमस्तक पुलिस या फिर ज़िंदगी की जद्दोजहद? संभव है आज निरंजन है कल कोई और हो और परसों हमारी बारी हो.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;January 18, 2008 6:43 AM&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-3065337041256035605?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/3065337041256035605/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=3065337041256035605' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3065337041256035605'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/3065337041256035605'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/01/blog-post_23.html' title='काश! ये साल न आता'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-139179048345505426</id><published>2008-01-12T22:42:00.000-08:00</published><updated>2008-01-12T22:42:32.468-08:00</updated><title type='text'>खुली किताब: काश! ये साल न आता</title><content type='html'>&lt;a href="http://khulikitab.blogspot.com/2008/01/blog-post.html#links"&gt;खुली किताब: काश! ये साल न आता&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी उसके घर में चूल्हा तो जलता है पर खाने की इच्छा किसी की नहीं होती। उसका 4 साल बेटा मां से रोज़ पूछता है---पापा कब आएगें?  इतने दिन हो गए पापा, कहां चले गए?  बताओ ने मम्मी पापा हमारे घर क्यों नहीं आते?  इन सवालों का  जवाब उसकी पत्नी के पास है ही नहीं। उसे समझ में नहीं आता कि बेटे को कैसे समझाए.....अब उसके प्यारे पापा कभी नहीं आएंगे। इन सवालों के जवाब में वो सिर्फ इतना ही कहती है काश! ये नया साल नहीं आता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नए साल से ठीक एक दिन पहले निरंजन की मौत हो गई। वजह बनी सड़क दुर्घटना। लेकिन असली वजह थी ज़िंदगी की जद्दोजहद। परिवार का पेट भरना। बेटे को पब्लिक स्कूल में पढ़ाने का और बीवी को उसकी मनपसंद चीजें दिलाने की ख्वाहिश। अपने घर की ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए उसने लोन लेकर आईसक्रीम का ढेला खरीदा। दस हजार की पूंजी लगाकर आईसक्रीम बेचने का धंधा शुरू किया। पुलिस वालों को पैसा देकर इंडिया गेट के पास ढेला लगाया। वो रोज़ाना लगभग 300 रुपए तक की कमाई कर लेता था। लेकिन 31 दिसंबर की रात को ज्यादा से ज्यादा कमाई करने के चक्कर में जुटा रहा। चूंकि नए साल के जश्न में इंडिया गेट का पूरा इलाका देर रात तक गुलजार रहता है ऐसे में उस रात और दिनों से काफी ज्यादा बिक्री होती थी। बस इस लालच में वो भी अपने ढेले के साथ वहां जमा रहा। उसने लगभग साढ़े आठ सौ तक की कमाई भी कर ली थी। रात के लगभग 12.30 बजे होंगे ठीक इसी समय पुलिस वालों की टोली आईसक्रीम वालों को हटाने के लिए आई। आईसक्रीम वाले इधर-उधर भागने लगे। वो भागता हुआ राजेंद्र प्रसाद रोड में घुस गया। और आगे जाकर साइड में ढेला लगाकर ग्राहकों का इंतजार करने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक इसी समय सामने से एक लड़खड़ाती कार आती दिखी। और पल भर में सबकुछ बदल दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रमश:&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-139179048345505426?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/01/blog-post.html#links' title='खुली किताब: काश! ये साल न आता'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/139179048345505426/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=139179048345505426' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/139179048345505426'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/139179048345505426'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/01/blog-post_12.html' title='खुली किताब: काश! ये साल न आता'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2895882460596272664.post-5862595188303056485</id><published>2008-01-04T20:33:00.000-08:00</published><updated>2008-01-04T07:03:51.919-08:00</updated><title type='text'>काश! ये साल न आता</title><content type='html'>दोस्तों,&lt;br /&gt;क़ायदे से तो हर दिन नया होता है। हर साल नया होता है। पर एक परंपरा दुनिया भर में चली आ रही है। 31 दिसंबर को मौज मस्ती और गुल्छर्रे उड़ाना हमारी वार्षिक दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। पर क्या कोई दिन ज़िंदगी से बड़ा हो सकता है? शायद नहीं। लेकिन आम तौर पर एक मानसिकता बन गई है कि साल भर का सारा पाप आखिरी दिन खत्म कर देना चाहिए। अगली सुबह से नए तरह का पाप जो करना है। ऐसे में रात जितनी रंगीन गुज़रे उतना ही समाज में, दोस्तों में हांकने में मज़ा आएगा। इस चक्कर में अक्सर हम भूल जाते हैं कि हमारे अलावा और भी ज़िंदगियां हैं जो बेहतर जीवन की तलाश में हैं। बस यहीं चूक होती है।..........क्रमश:&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2895882460596272664-5862595188303056485?l=khulikitab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulikitab.blogspot.com/feeds/5862595188303056485/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2895882460596272664&amp;postID=5862595188303056485' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/5862595188303056485'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2895882460596272664/posts/default/5862595188303056485'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulikitab.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='काश! ये साल न आता'/><author><name>खुली किताब</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05118754600349237212</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_zou8HuyCyTU/SSRANUfhVSI/AAAAAAAAADE/HQ6qlZUXYIo/S220/photo'/></author><thr:total>2</thr:total></entry></feed>
