बुधवार, 8 फरवरी 2012

सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं




उदय प्रकाश की कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ से गुजरते हुए एक बार फिर वही अहसास बड़ी सिद्धत से हो रहा है कि लेखक का एकांत किसी संन्यासी या संत का एकांत नहीं है। वह मृत्यु का एकांत है। यानी मृत्यु रचना की पूर्व शर्त है। मृत्यु के बाद ही रचना संभव होती है। कैंसर और मृत्यु के आसन्न आगमन को अतिक्रमित करने या उससे टकराने की इच्छा ही उदय प्रकाश की कविताओं और कहानियों का मूल उदगम स्रोत है। जिसे उदय प्रकाश ने लंबे अरसे तक भीतर-भीतर संजोए रखा होगा, वहीं इंस्टिंक्ट या संवेग इस कहानी में भी फूट पड़ता है। इन तमाम कहानियों में एक जो आतंरिक लय विद्यमान है उसे अब आसानी से पहचाना जा सकता है। वह जीवन जगत के जटिल अनुभवों को बिना किसी तारतम्य के कहानी में फिर से जीने की चेष्टा करते हैं।

कई बार तो ऐसा भी लगता है कि उनकी सृजनात्मकता का जो कच्चा माल है वह कमोबेश हर कहीं चाहे वह कविता हो या कहानी उसी घुटन, पीड़ा और संत्रास को हराने की चेष्टा है। मेरी भी यही समझ है कि बिना किसी एक विशेष मनोदशा के कोई कालजयी रचना संभव भी नहीं होती। हां सालजयी रचनाओं को छोड़ ही दिया जाए।

अंग्रेजी भाषा के कवि एजरा पाउंड ने कभी कहा था—लेखक समाज का एंटिना होता है, वह हर संवेग हर तरंग हर संदेश को ग्रहण करता चलता है और उचित समय आने पर उन्हीं तरंगों को नए रूप में समाज को वापस लौटा देता है। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के लिए जिस समय अन्य समकालीन लेखक कल्पना का सहारा ले रहे थे उसी समय में उदय प्रकाश का यह मानना कि रचना के धरातल पर कोई प्रतिद्धंद्धिता नहीं होती समकालीन सर्जनात्मकता की अपनी, अपनी भूमिकाएं हैं फिर हम क्यों अपनी भूमिका भुलाकर प्राय: दूसरे के कैरेक्टर में घुसने की कोशिश करते हैं।

‘और अंत में प्रार्थना’ कहानी में किसी प्लाट की खोज करना, कहानी और उदय प्रकाश दोनों के साथ बेमानी ही नहीं बेईमानी भी होगी। क्योंकि सब जानते हैं उनकी कहानियों में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं। वे खालिस वास्तविकता की ऊपज हैं। अत: जो वास्तविक है उसके लिए अवास्तविक प्रमाण जुटाने की क्या जरूरत है। अवास्तविक प्रमाण से परहेज करते हुए उदय प्रकाश ठेठ वास्तविकता की हद तक पहुंच जाते हैं और उनकी तमाम रचनाधर्मिता मृत्यु का ही प्रतिकार लगती है।

कहानी का प्रमुख पात्र डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर, जो कथानक से भी अधिक महत्वपूर्ण है उसे आरंभिक दौर से ही नितांत अकेला, अलग, एलिएटेड दिखाया जाता है। वही अनिवती उसका वही विस्थापन और एलिएशन पूरी कहानी में मौजूद है। क्योंकि वह विशिष्टों के लिए अवशिष्ट है और तंत्र का मंत्र नहीं समझ पाता। या फिर कह लें हठी स्वभाव का होने के नाते जानबूझकर व्यवस्था के तिलिस्म को बार-बार तोड़ना चाहता है, तो ऐसी चरित्र की यही परिणति संभावित है। बालक वाकणकर का बचपन दूसरे बच्चों से भी अलग था। वहां न कोई आवेग था न रंग। न आकार। बस सड़ता गुथता बचपन था जो भविष्य के लिए फर्मिंटेशन के बावजूद दूसरे बच्चों के सामने दीन हीन बीमार लगता था। मैं समझती हूं यहां अकेलेपन की समस्या पारस्परिक सम्बन्धों की समस्या है और साथियों से कटे रहकर वाकणकर का यह अकेलापन निर्मल वर्मा की कहानियों के चरित्रों का आइसोलेशन है।

डॉ वाकणकर की जिंदगी में आने वाले तमाम पात्र चरित्र और घटनाएं किसी भी फिल्म से बढ़कर हैं। लेकिन किसी फिल्म का हिस्सा नहीं। क्योंकि वे पेशे से डॉक्टर होते हुए भी संघ के प्रति ईमानदार प्रतिबद्ध और निष्ठावान हैं। इसी सिलसिले में हरवंश पंडित थुकरा महाराज से उनकी आत्मीयता बढ़ती है। संघ की शाखा में नियमित जाने, भारतीयता को नियमित समझने समझाने की उनकी अपनी अलग ही दृष्टि थी, जिसमें राजाराम मोहन राय, गांधी, नेहरु पाश्चात्य मानसिकता के हिंदू माने जाते हैं और उनके स्थान पर महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोलवलकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे वीर नायकों और योद्धाओं को आज के समय और समाज के लिए ज़रूरी मानते हैं।

विधानपुर से डॉ वाकणकर को डिंगर गांव तबादला कर भेज दिया जाता है। सरकारी दफ्तरों में इस तरह के गांव को ना केवल पिछड़ा, अशिक्षित, रूका हुआ, सुस्त, ठहरा माना जाता है बल्कि सजाए काला पानी के रूप में देखा जाता है। प्रधानमंत्री के दौरे से इस गांव का तथाकथित भाग्य बदलना पूरे गांव में पुलिस, सीआरपीएफ, पीएसी, तंबू छावनी, वर्दी, जीप, ट्रक, कार, मोटरसाइकिलें की भागमभाग इस कहानी का तिलिस्मी तानाबाना है। उदय प्रकाश एक साथ दो विपरीत परिस्थितियों को उभारते हैं। जहां वर्तमान में गहरे डूबकर जीना और सुंदर भविष्य के लिए सड़े वर्तमान में जीना आमने सामने रखकर अकेलेपन की समस्या को कथाकार उभारता है। मेरा मानना है कि उदय प्रकाश की सृजनात्मकता का तनाव बिंदु भी है।

‘और अंत में प्रार्थना’ कहानी का ओर (आरंभ) तो पकड़ में आता नहीं और छोर(अंत) जैसे कुछ निश्चित सा लगता है। जो कम से कम उदय प्रकाश के पाठकों को चौंकाता नहीं। क्योंकि व्यक्ति का स्वभाव उसके लड़कपन का हठ और जिद्द मनमानी की लत आजीवन बनी रहती है। इसलिए आलोचक कह सकते हैं कि वाकणकर की कहानी की आंतरिक अनिवती ही उसकी प्रामाणिकता भी है।

एक समीक्षक के तौर पर मैं कहना चाहूंगी कि कहानी वास्तविकता से जुड़ी हो यह तो ठीक है लेकिन जीवन के सभी तथ्यों का रचना में भी उसी रूप में समावेश हो सके ऐसा कोई जरूरी नहीं। उदय प्रकाश जैसे किसी फिल्म निर्माण में जुटे हों। जहां कई फ्लैशबैक हैं। कई घटनाओं, प्रति घटनाओं का पूरा संजाल है। किंतु वे उन सब को पकड़ते छोड़ते कहानी का तयशुदा अंत पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में दे देते हैं। जिस रिपोर्ट पर सबकी नजर है। कहानी के पात्रों की भी, पाठकों की भी और समीक्षक की भी। सब उत्सुक हैं जानने के लिए कि डॉ वाकणकर इस घुटन के बाद कॉज ऑफ डेथ क्या लिखते हैं----
“....सेरेब्रल हेड इंजुरी, प्रूव्ड फैटल, कॉज्ड बाय दि गन शॉट, टाइम ऑफ डेथ: फाइव मिनिट्स टु फोर, पी. एम...”
इसके बाद नीचे दस्तख्त—डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर।

यह दुविधा कहानी के चरित्रों और पात्रों में होगी लेकिन उदय प्रकाश के पाठकों में नहीं क्योंकि बार-बार होने वाले तबादले उनकी कर्तव्यनिष्ठा, सत्य और ईमानदारी पर मिलने वाली व्यवस्था की चोट, उन्हीं पर उनके परिवार की शंका, मित्रों और सहकर्मियों का अलगाव और प्रधानमंत्री के दौरे में डॉ वाकणकर की दृढ़ संकल्पशक्ति कहानी के अंत के लिए जिम्मेवार है। वैराग्य, निराशा, आध्यात्मिकता और असहायता जैसे बोधों को अपने में समोये हुए डॉ वाकणकर देश दुनिया में फैले तमाम रोगों का अनुसंधान करने के पश्चात जिन निष्कर्षों पर पहुंचते हैं या उनको ताउम्र कार्यान्वित नहीं कर पाने की जो विवशता झेलते हैं वहां राजनीतिक पर्यावरण के प्रदूषण की तह तक जाने का अवसर उदय प्रकाश के पाठकों को मिलता है।

विज्ञान और अनुसंधान से जुड़ा हुआ जब एक पढ़ा लिखा व्यक्ति उन्हीं सिद्धांतों को व्यावहारिक प्रतिफलन में लाने की कोशिश करता है तो अपने आप को असमर्थ पाता है क्योंकि पूरी की पूरी सत्ता, राजनीतिक व्यवस्था और शासन तंत्र उसे नेस्तनाबूद करने पर तुला है। प्रकारांतर से डॉ वाकणकर को अपने तर्क ज्ञान और विवेक की हत्या करने के लिए बार-बार उकसाया जाता है। ऐसे में पूरी राजनीतिक चेतना और सामाजिक दायित्व पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर मेडिकल साइंस पर भी कटाक्ष करते हैं। वे पेशे से डॉक्टर जरूर हैं किंतु मनुष्य के ज्ञान को प्रकृति के नाश का कारण बताते हैं। ईश्वर की परिभाषा गजब के शब्दों में की है—अफीम, मार्फिन, एस्प्रीन, एनेस्थेसिया, या ट्रैंक्वेलाइजर के रूप में ईश्वर को मानते हैं जो पीड़ा, यंत्रणा, चीख और मृत्यु को सहिष्णु बनाता है। वस्तुत: डॉ वाकणकर का बहुपठित और बहुज्ञ होना ही उऩकी दुविधा और उनकी उलझन का कारण है। नीत्शे, काफ़ को, मेडेल, डार्विन को पढ़ते-पढ़ते उनका ह्दय और मस्तिष्क जूझ रहा है। अंतत: थुकरा महाराज की मृत्यु उन्हें क़ानूनन अपराध(हत्या) और मनुष्यता हिंदू धर्म के लिए कलंक भारतीय दंड संहिता के अनुसार होमिसाइड का लगा।

ढींगर गांव में तबादले के साथ डॉ को लगने लगा था सुस्त शांत और नैसर्गिक जीवन ही असली जीवन है। क्योंकि जंगलों को उजाड़ने और बाहरी या सरकारी लोगों की दखलअंदाजी आदिवासियों को भी पसंद नहीं थी। प्रधानमंत्री के दौरे के कारण जिस विकास, चौड़ी सड़कों का प्रपंच फैलाया गया-बात एकदम साफ थी(अगर सड़कें आदिवासियों के विकास के लिए बनाई गई होती तो उनके पास सड़क पर चलने वाली कोई न कोई चीज जरूर होती, मगर ऐसा नहीं है)


ढींगर गांव और उसके आस पास के इलाकों जैसे पोंडी तथा खांडा में हैजा फैल चुका था। मरने वालों की संख्या तेरह से आगे निकलती जा रही थी। गांव में पीने के पानी की व्यवस्था एक प्रदूषित तालाब से था वही पांच छह गावों की प्यास बुझाने का जरिया था। महामारी फैलती जा रही थी और डॉक्टर वाकणकर ने जब जिलाधीश एनएस खरे को पांच छह गावों में हैजा फैलने और अबतक हुई सोलह मौतों के बारे में बताया तो इसे पॉलिटिक्स बतलाकर धुत्तकारा गया। मौजूदा जो सरकारी ढांचा है वहां किसी भी प्रकार की दखलअंदाजी सरकारी नुमाइंदे बर्दाश्त नहीं करते। डॉक्टर वाकणकर की डायरी का हिस्सा चीख-चीख तक तत्कालीन सर्वग्रासी राजनीति का पर्दाफाश करता है ---‘कही ऐसा तो नहीं कि जो तंत्र या व्यवस्था यहां बनी हुई है वह अपने आप में एक समानांतर प्रणाली है, वह सिर्फ अपनी ही दुनिया की चिंताओं में व्यस्त है। शायद उसका हित ही इसमें जुड़ा हुआ हो तो लोग भूख गरीबी महामारी से मरें, कहीं हमारे देश में लोकतंत्र का असली अर्थ जनता द्वारा अपनी शत्रु व्यवस्था का चुनाव तो नहीं है'

उदय प्रकाश तमाम आधुनिक विसंगतियों से निजात पाने में सफल हो जाते हैं और उत्तर आधुनिक पेंच को खोलने की कोशिश करते हैं। डॉक्टर वाकणकर पेशेवर ईमानदार बेहतर भविष्य, बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर लोकतंत्र मुहैया कराना चाहता है पर अव्यवहारिक करार कर दिया जाता है। अपने अपनों में ही पराजित, असहाय और अकेला महसूस करता है। प्रधानमंत्री का सामिप्य या साक्षात्कार किसी फैंटेसी से कम नहीं। वह पचास वर्ष के आसपास का थुलथुल सा थका हुआ आदमी भारतवर्ष का प्रधानमंत्री है जो न केवल शरीर की चर्बी से परेशान है बल्कि पुरानी कब्ज और पाइल्स का मरीज भी है। ऐसा तनावग्रस्त चिढ़ा हुआ चरित्र विशाल भू-भाग, भाषाओं, जातीयों, राष्ट्रीयताओं, पहाड़ नगरों का स्वामी थी xxxxx


इस शहरीकरण, औद्योगिकरण विकास के नारों में किस नसल का भला होने जा रहा है। भारतीय राजनीति का सौभाग्य या सर्वग्रासी शक्तियों का दुर्भाग्य, पीएम के फूड टेस्टिंग की जिम्मेदारी डॉक्टर वाकणकर एमबीबीएस एमडी द्वारा होनी थी। जो मरीज की नब्ज टटोलने वाले तथा आंखों ही आंखों में रायते, मूंग की दाल और एक दो फुल्के पर पीएम को रिझा लेते हैं। यह अपराधियों का पूरा का पूरा संयुक्त परिवार है जिसमें तांत्रिक, बंबइया एक्टर, भारतीय प्रशासन का भ्रष्ट निकम्मा रिश्वतखोर अफसर, तस्कर दलाल, बेईमान, ठेकेदार, गिरोह के हत्या, सरगना दारू, भट्टे के ठेकेदार, पत्रकार और इन सब का मुखिया प्रधानमंत्री....जो ढींगर गांव के हरे भरे आदिवासी इलाके को कारखानों के उजाड़ और विषाक्त मैदान में बदल देने के लिए आया हुआ था। सत्ताधारी छद्म जाल फैलाता है। अंगोछा पहनकर उनका माझी(दुखहरण) बनने का झूठा प्रपंच करता है और आदिवासियों को उनके घर जमीन से उजाड़कर उन्हें अंतहीन गुलामी में हमेशा के लिए झोंक देता है---सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा का पाखंड पर्व शुरू होता है...

मंदिर का चरणामृत कंटामिनेटेड पानी से बना है। जिसे पीकर बाईस से अधिक आदिवासी महामारी के शिकार हो चुके हैं। इस एब्सर्ड नाटक के निर्देशक, लेखक, सूत्रधार डॉक्टर वाकणकर चुपचाप भारतीय प्रशासन के इस मामूले को पुर्जे(आईएएस अफसर) के होश फाख्ता होते देख रहे थे। पर यह विशाल अंत का अत्यंत नगण्य नटबोल्ट भी नहीं रबर का एक वॉशर था जो दोनों ओर से पिसता है। पेपरमिल, आदिवासी, तांत्रिक, अपराधी, प्रधानमंत्री, तस्कर, दलाल, अफसर, नेता, पत्रकार उद्योगपति सारे चरित्रों की धज्जियां उड़ रही हैं।

एब्सर्ड रियलिटी तो यही थी कि पीएम का भाषण बदला। जिसमें हैजा है। हैजे से मरने वाले परिवारों के प्रति संवेदना है पीएम कोष से मुआवजा है, पेयजल की व्यवस्था सरकारी कल पुर्जों की झूठी मरम्मत। कुल मिलाकर प्रशासन की ओर से जो अनिश्चितता और उत्तरदायित्व परोसी जा रही है उदय प्रकाश उसकी ओर ध्यान दिलाते हैं। वहां से विस्थापित होकर डॉक्टर वाकणकर कोतमा पहुंचते हैं। तबादले की रिपोर्ट में उन्हें न केवल संघ का संचालक बल्कि नक्सलवादी गतिविधियों का भी संचालक बताया गया----“दरअसल सरकारी नौकरशाही जिस व्यक्ति विरूद्ध कोई ठोस आपराधिक प्रकरण नहीं बना सकती या सामाजिक गतिविधियों से खुद को परेशानी में महसूस करती है उसके लिए उसने नक्सलवाद की श्रेणी बना रखी है। ”

धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामर्थ्य पर संदेह होने लगा। परिवार और पत्नी भी उनकी ईमानदारी लगन, मूल्य निष्ठा को उनकी मूर्खता और जिद्दीपन समझने लगी। उनके अऩुसार डॉक्टर वाकणकर ने पूरे परिवार को एक प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया है। हर कोई उनके अंत के परिणाम देखने में इच्छुक है कि आखिर वे सामूहिक आत्मघात करते हैं या पलायन या फिर तमाम सामाजिक या असामाजिक ताकतों द्वारा निगल लिए जाते हैं।

डॉक्टर वाकणकर की सारी ईमानदारी और सच्चाई विस्थापन और अस्वीकृति पाती है। “कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरा पूरा जीवन व्यर्थ चला गया।” उदय प्रकाश की इस कहानी का अंत हिंदी सिनेमा की पटकथा का अंत लगता है। कुछ और भी सोचा जा सकता था कि जैसे तंत्र और व्यवस्था का शिकार डॉक्टर पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट देने से इनकार ही कर देता। या इस दमघोंटू व्यवस्था में रिजाइन कर देता या अपने मन मस्तिष्क पर पड़ने वाले दबाव को संभाल पाता और कॉज ऑफ देथ लिखकर हस्ताक्षर करने के बाद भी इस मुर्दा लोकतंत्र में जीवित रहने का साहस करता।

डॉक्टर वाकणकर की मौत न तो हत्या कही जा सकती है ना तो आत्महत्या। किंतु यह एक स्वाभाविक मौत तो नहीं। पाठक समाज समझ रहा है कि अपने मन और मस्तिष्क, आदर्शों और सिद्धांतों, समय और समाज की जद्दोजहद को महसूस करता हुआ एक सत्यनिष्ठ डॉक्टर व्यवस्था के क्रूर जाल में फंसकर दम तोड़ देता है। फिर उसे हत्या क्यों न कही जाए। या फिर अपने बार-बार के तबादले, एलिएशन, तंत्र की टकराहट, देश व लोकतंत्र से क्षुब्ध, नाराज मरते हुए मूल्यों को पचा न पाना आत्महत्या भी तो है। डॉक्टर की बुदबुदाहट और अंत में प्रार्थना
प्रणम्य शिरसा देवम् गौरीपुत्रं विनायकम्
भक्तावासम् स्मरेनित्येमायु: कामार्थसिद्धये....
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लंबोदमरम पंचमम् षष्ठम विकट मेव च
सप्तमम् विध्नराजम् ध्रूमवर्णम् तथाष्टमम्
नवम्....
इस प्रार्थना में न कोई कंपन है न भय। किसी ठंढे धातु सी आवाज दूसरे ग्रह से आते हुई अलौकिक। प्रार्थना खत्म होते होते डॉक्टर वाकणकर फर्श पर गिर गए।

यह उलझाव और अस्पष्टता कहानी को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने के लिए है। उदय प्रकाश पर प्राय: पाठकों की रूढ़ अभिरुचि में बाधा पहुंचाने का आरोप लगता है। उनकी कहानियों में कथानक से बड़े चरित्र हो जाते हैं वे बिना कथावस्तु का सहारा लिए आगे बढ़ने लगते हैं। उदय प्रकाश नित नए प्रयोग कर रहे हैं। यह ठीक भी है पुराने को दोहराना उचित भी नहीं। लेकिन एक समीक्षक होने के नाते मैं ये जरूर कहूंगी कि कथानक और चरित्र का तालमेल होना ही चाहिए। पाठक अपने को घटनाक्रम से कथ्य संवेद्य से जोड़ नहीं पाता तो उसकी एकाग्रता भंग होती है। सांकेतिक स्थानों पर उदय प्रकाश डाक्यूमेंटरी सा विस्तार दे देते हैं। कभी तो अपने पाठकों की समझ पर भरोसा करके देखें। कुल मिलाकर इनकी ये कहानी नौस्टेल्जिक होने से नहीं बच पाती है।

लेख जानकी पुल में भी प्रकाशित

मंगलवार, 7 फरवरी 2012

जानकीपुल: सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं

जानकीपुल: सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं: पिछले 1 जनवरी को उदयप्रकाश 60 साल के हो गए. मुझे बहुत आश्चर्य है कि उनकी षष्ठिपूर्ति को लेकर किसी तरह की सुगबुगाहट हिंदी में नहीं हुई...

रविवार, 20 नवम्बर 2011

रॉकस्टार: गंद और जुनून की जाल में



इम्तियाज अली की हाल की फिल्म रॉकस्टार प्यार की परिभाषा के नए एक सूत्र को पकड़ने की कोशिश है। प्यार ऐसा जो जुनून तक इंसान को ले जाए। प्यार ऐसा जो न टाइम देखे न स्पेस। बस करना है तो करना है। इम्तियाज ने फिल्म को शुरू से जैसा संभाला वो काबिले तारीफ है। अच्छा बिल्डअप किया। हिंदू कॉलेज और स्टीफेंस के बीच जो सोसायटी का अंतर दिखाया वो भी काफी हद तक सही दिखा। जिस तरह से स्टीफेंस की हाई सोसायटी एक लड़की एकदम से हिंदू के एक ऐसे लड़के के साथ गंद करने निकल पड़ती है जिसे अंग्रेजी भी बोलनी नहीं आती, ये थोड़ा अटपटा लगा। नर्गिस को देखते हुए लगा जैसे जब वी मेट की करीना के मस्ती और बिंदास किरदार को फिर से जीवित करने की कोशिश की जा रही है और रणबीर कपूर को देखकर बैंड बाजा बारात के रणबीर सिंह की याद बार-बार आती रही। खैर, फिल्म में मस्ती या फिर कह लें गंद ने दर्शकों को अपनी तरफ खूब खींचा। मजा आया। लेकिन जैसे ही नर्गिस की शादी होती है उसके बाद से हालात ऐसे बदलते हैं कि जैसे दोनों एक दूसरे को टूटकर प्यार करते रहे हैं और अब दोनों एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते। यहां तक आने से पहले न तो ऐसी भावनाएं प्रकट हुईं न ही माहौल दिखा। शादी से पहले सबकुछ सहज और अच्छा लगा। लेकिन शादी के बाद नर्गिस को मनोवैज्ञानिक परेशानियां होने लगीं। ऐसा लगा ये स्थिति जबरदस्ती क्रिएट की गई। जाहिर है ये बात दर्शकों को खली। एक ऐसी लड़की जो शादी से ठीक कुछ महीने पहले से गंद करने लगी वो अचानक उस बात की आदि हो गई?...वो अचानक एक ऐसे प्यार में पड़ गई जिसके लिए उसके मन में पहले से प्रबल भावनाएं नहीं थी। अगर यही दिखाना था तो इम्तियाज को इस तरफ इशारा करना चाहिए था। शादी से पहले मेहंदी लगाई नर्गिस का एक बार गले मिलना बहुत कुछ कहने में असमर्थ है।

दोनों का प्राग में मिलना और उसके बाद प्यार की पिंगे बढाना समझ में आता है। इससे नर्गिस मानसिक तौर पर ठीक होने लगती है एकबारगी यह भी समझ में आता है। पर समस्या अब शुरू होती है। रॉकस्टार में अपनी प्रेमिका को किस करने के लिए किसी भी हद तक जाना। अजीब लगने लगता है। प्यार और वासना के बीच एक हल्की दीवार है जो बिना जोर लगाए टूट जाती है। बस इस दीवार का बार-बार टूटना फिल्म का सबसे ढीला पहलू है। दोनों के प्यार में वो दर्द नहीं दिखा। वासना उसपर लगातार हावी रहा। माना जाता है कि कलाकार दिमाग से ज्यादा दिल से सोचता है। लेकिन एक कलाकार समाज में रहता है और इज्जत और शोहरत में समाज की भूमिका है इसे नहीं भूलता। क्या ये प्यार सलमान का प्यार तो नहीं? जो ऐश्वर्या से संबंध टूटने के बाद आक्रोश के चरम पर था।यहां से फिल्म ऊबाउ होने लगती है। एक मरन्नासन लड़की को जीवित करने के लिए किस करने का बहूदा सीन हैरान करता है। रोमांटिक फिल्में बनाने वाले इम्तियाज को इतनी समझ तो है कि प्यार नई जिंदगी दे सकता है पर ऐसी हरकत घिनौनी लगती है। एक कलाकार का प्यार सिर्फ किस करने तक सीमित रहता है ऐसा नहीं है और एक कलाकार का आक्रोश उसकी कला में निकलता तो ज्यादा अच्छा लगता। पर हर कदम पर मारपीट अजीब लग रही है।

फिल्म में कुछ तथ्यात्मक गलतियां भी हैं। एक शख्स जब दूसरे देश की जेल में सजा काट चुका है तो फिर बकायदा पुलिस के साथ उसे अपने देश भेजना भी हास्यास्पद लगा। प्रत्यर्पण तो तब होता है जब किसी शख्सने गुनाह कहीं और किया और गिरफ्तार किसी और देश में हुआ। लेकिन जिस कदर रॉकस्टार को भारत लाया गया उसको देखकर मन खटकता है।




गाने फिल्म की जान हैं पर जब प्रोमो आया था और साडा हक वाला गाना दिखाया जाता था तो लगता था रॉकस्टार ने कुछ ऐसा कर दिया जिससे पंजाब से लेकर कश्मीर तक के लोगों को झकझोर दिया हो। पर फिल्म में उस गाने का संदर्भ एकदम असर नहीं छोड़ता। एक प्यार करने वाली लड़की अगर अपने प्रेमी के साथ नहीं आना चाहती है तो इसमें अधिकार की बात क्या है और इसे कैसे साबित किया जा सकता है? इसमें पंजाब कश्मीर को लाने का क्या मतलब।

मुझे लगता है गाने को संदर्भ के हिसाब से रखा जाता तो इसके नए मतलब निकलते। रहमान का संगीत और मोहित की आवाज ने चार चांद लगाया है। पर एक बात मैं जरूर कहूंगा---ऐसा नहीं कि रहमान ने सूफी संगीत के लिए संगीत नहीं दिया है। रहमान ने जोधा अकबर और दिल्ली 6 में शानदार सूफी गाने बनाए। लेकिन इस फिल्म का सूफी गाना उन दोनों के मुकाबले कमजोर है। जितना अच्छा सूफी गाना बन सकता है वैसा कतई नहीं बन पाया।

तस्वीरें-सौजन्य फिल्म रॉकस्टार

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

भाव शून्य समाज में पदार्थ की महत्ता






इस दौर में जब बार-बार कला के अनुशासनों पर प्रश्न चिन्ह उठ रहा हो तो संवेदनशील ह्दय कराह उठता है। अफसोसजनक है नितांत कलाप्रिय समाज में भारतीय जन मानस में विज्ञान और वाणिज्य की बार-बार स्थापना और कला को नकारना जैसे इस युग की विवशता हो चुकी है। कला की समाज में घटती महत्ता ने पूरे साहित्य समाज को गहरे असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया है। हम सब जानते हैं कला भाव को समृद्ध करती है वहीं विज्ञान और वाणिज्य पदार्थ को। यद्यपि समाज में भाव और पदार्थ दोनों की आवश्यकता है लेकिन भाव की प्रधानता से जहां समाज का ढांचा मजबूत होता है वहीं पदार्थ की प्रधानता से सह्दय समाज की संवेदना शून्य हो जाती है। इस पदार्थ आधारित घोर वैज्ञानिक युग में हर कोई रोटी कपड़ा और मकान की जद्दोजहद में व्यस्त है। ऐसे में जीवन के समक्ष और सह्दय समाज के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भाषा साहित्य और संस्कृति को लेकर है। शिक्षा का उद्देश्य जीवन के स्थूल और सूक्ष्म रूप को जानना और समझना है और आज हम केवल स्थूल रूप को संचालित कर रहे हैं। मानों जीवन की आंतरिक लय और धुन(कला) को भूलते जा रहे हैं। क्या ये सही है?

मंगलवार, 14 सितम्बर 2010

सामाजिक परिवर्तन के नए स्रोत






सर(प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी--पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग...दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रख्यात समालोचक) के साथ यह बातचीत इस दशक में प्रकाशित उपन्यासों में लगातार बदलते चरित्रों और उनका सामाजिक परिवर्तन के स्रोत को ध्यान में रखकर की गई है।

सुधा-- सर, अब इतनी विवेचना के बाद, तमाम उठा-पटक और जांच पड़ताल के बाद हम वास्तविक राजनीति किसे कहें?

सर--- वस्तुत: सामाजिक परिवर्तन के नए स्रोतों से उभरी हुई राजनीति ही वास्तविक राजनीति है। मोटे तौर पर इसके दो प्रमुख स्रोत हैं---(1) समाज का दलित वर्ग और (2) स्त्री वर्ग। ये दोनों स्रोत समाज के सबसे अधिक दलित, शोषित समुदाय है। इनमें परिवर्तन करते हुए सामाजिक संरचना का बदलाव या सामाजिक संरचना में बदलाव लाना यदि शुरु होता है तो राजनीति का वास्तविक रुप यही होगा।

सुधा— सर, इन दोनों स्रोतों को अपने-अपने हित में हथियाने की राजनीति भी तो हो सकती है?

सर-- हां, ऐसा देखा गया है कि दलित औऱ स्त्री इन दोनों स्रोतों का इस्तेमाल केवल राजनीतिक सत्ता पाने के लिए किया जाए तो वह राजनीतिक पाखंडपूर्ण हो सकती है। मुख्यरुप से सामाजिक परिवर्तन और नई सामाजिक संरचनाओं का उभार और उससे उत्पन्न नए राजनीतिक तर्क यदि पैदा हो सकते हैं तो दोनों ही राजनीति और समाज के नए स्रोत जीवन को नई दिशा दे सकते हैं।

सुधा— सर, दीर्घकालीन राजनीति क्या होती है? मतलब यह कि सत्ता समीकरण से परे जिस प्रकार की राजनीति की आज सर्वाधिक ज़रूरत है उसे कैसे पहचाने ?

सर-- देखो, जैसे आरक्षण का जो ये मुद्दा है—पिछड़े वर्ग का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा उच्च शिक्षा पर अपनी मांग कर रहा है। ये नई सामाजिक संरचना है। जिसमें ओबीसी(अदर बैकबर्ड क्लास) जो अपेक्षाकृत अपने को अधिक पिछड़ा समझ रहे हैं वे उच्च शिक्षा और उच्च पदों के लिए मांग कर रहे हैं तो एक प्रकार का उद्वेग समाज में बढ़ रहा है। मैं मानता हूं कि कुछ प्राकृतिक परिस्थितियां आती हैं, आयेंगी, किंतु इस समस्या के भीतर से ही परिवर्तन होते हुए एक नया सामाजिक सूत्र निकल सकता है। दरअसल सामाजिक स्तर पर, देश स्तर पर उसको एक दिशा में ले जाना ज़रूरी है। यह केवल सत्ता समीकरण के लिए किया गया तो लक्ष्यच्युत हो जाएगा। दीर्घकालीक राजनीति के लिए इसे राजनीतिक, सामाजिक दर्शन को मानवीय मूल्यों के हक में देखना होगा तभी नए मानवीय मूल्य पैदा होंगे और उससे एक इनर सेल्फ यानी ‘आंतरिक आत्म’ भी विकसित होगा।

सुधा— सर, इनर सेल्फ क्या है ? और यह मध्युगीन आंतरिक आत्म से कैसे अलग है?

सर-- देखों, आत्मबोध का प्रयोग मनुष्य की आंतरिकता के लिए प्राय: प्रयोग किया जाता रहा है। किंतु यह कोई मध्ययुगीन आत्म का रूप ना होकर यह सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक आत्म है। आज ऐतिहासिक प्रक्रिया में यह परिवर्तनशील है। दूसरी तमाम प्रक्रियाओं, संघर्षों, द्धन्द्धों के भीतर से अर्जित किया जाता है। यह आंतरिकता की बिलकुल नई व्याख्या है जो अस्तित्वाद से बिलकुल अलग है। अस्तित्ववाद का आत्म भले ही पकड़ में नहीं, परिभाषित नहीं हो पाता, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। ऐसे ही अनडिफाइंड आंतरिकता भले ही भौतिक जैविक ढांचे में सही ठहरे पर बड़ा ही रहस्यमय, सूक्ष्म और वायवी लगता है। हम जिस आत्म की बात कर रहे हैं ऐतिहासिक तौर पर यदि कोई युग इस आंतरिकता को पाने में अपनी भूमिका नहीं निभाता तो युग की तमाम उपलब्धियां नगण्य होंगी। ठीक इसी प्रकार संघर्ष करता हुआ व्यक्ति चरित्र यदि अपनी भूमिका भुला देता है तो वह भी अपने इस आंतरिक आत्म से साक्षात्कार नहीं कर पाता।

सुधा— सर, तमाम सफल राजनीतिक चरित्रों में यह आंतरिक आत्म सदैव विद्यमान रहा होगा ?

सर-- चाहे वह इनडिविजुअल या सामाजिक समूह हो, दोनों को ऐतिहासिक प्रक्रिया में संघर्ष करते हुए परिस्थितियों से जूझते हुए अपना ‘इनरसेल्फ’, ‘इनर पॉवर’ अर्जित करना होता है। विजयदेव नारायण साही ने इसी आंतरिक आत्म का उल्लेख करते हुए गांधी जी पर लिखा है---“साउथ अफ्रीका से गांधी जब भारत आए तो गुलामी की यातना भोगे हुए गांधी राजनीतिक गुलामी और सभ्यताओं के नस्लवाद की ठोस मार खा चुके थे जिसके छाप गांधी पर विद्यमान थे। किंतु ये ठोस वास्तविकताएं भी गांधी के मन पर सामान्य मनुष्यता को इन सबसे उपर ठहराती थी। जब गांधी ने कहा था---‘मैं सत्य के लिए सारे भारत को अरब सागर में डूबो सकता हूं’---- तो उनका सत्य वृहत्तर था। जिसमें सत्य की लड़ाई राष्ट्रीयता, भारत वर्ष की स्वाधीनता और सार्वभौमिक मनुष्यता—जो किसी राष्ट्र के घेरे में नहीं आती---से था।” गांधी के मन में अपने संघर्षों को लेकर एक क्रम बना हुआ था। जिसमें गरीबी, गुलामी, उपनिवेशवाद, नस्लवाद –इन सबसे संघर्ष तो था ही लेकिन सामान्य मनुष्यता सबसे बड़ी चीज है और अगर इस संघर्ष में वृहत्तर मनुष्यता, सार्वभौम मनुष्य भाव पर कहीं चोट पहुंचती है तो गांधी सारी लडाई को अरब सागर में डूबो देंगे। क्योंकि गांधी के लिए जो सत्य था वह कई तरह के उद्वेगों से बना हुआ सत्य था। वह केवल ईश्वरीय सत्य नहीं था। एक ठोस तथ्य के रुप में जो औपनिवेशिक गुलामी, गरीबी, नस्लवाद से लड़ने का एक ऐतिहासिक ठोस तथ्य इस सत्य में विद्यमान था। जिसका पूरा दबाव गांधी के मन पर था।

सुधा— तो क्या आंतरिक आत्म को ही विजयदेव नारायण साही ने अंतर्ध्वनि कहा है ?

सर-- नहीं थोड़ा समझने की बात है। साही के अनुसार जब गांधी कहते हैं---- “मैं क्षितिज के पार सत्य वह देख रहा हूं। तो यह क्षितिज के पार वही ‘इनर वॉयस’ (अंतर्ध्वनि) थी जो इतिहास के ठोस तथ्य से टकराते हुए निकलती थी। यानी अंतर्ध्वनि के स्वर पर इन ऐतिहासिक ठोस तथ्यों का पूरा दबाव दिखलाई पड़ता है और इस “अंतर्ध्वनि” का मिजाज इन्हीं स्थितियों से निर्मित होता है। यह नई आंतरिकता अपनी पुरानी आध्यात्मिकता की भिनभिनाहट भी लिए हुए है लेकिन इसकी दिशा अलग है—रहस्यवादी नहीं है। छायावादी कवियों ने इस भिनभिनाहच को सुना और इस आंतरिक लय को बखूबी व्यक्त भी किया। कई अच्छी राष्ट्रवादी कविताएं लिखी गईं। जैसे दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त आदि के द्वारा। पर इनमें गांधी के ऊपरी रुप का उल्लेख भर ही था।

सुधा-- सर, इस आंतरिक आत्म को अनुभव करने में या पाने में जो वर्तमान राजनीतिक सामाजिक संघर्ष है, कितनी दूर तक हमारा साथ देते हैं ?

सर--- देखो, दरअसल वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष इस आंतरिक आत्म को कितनी गहराई से व्यक्त कर पाते हैं इसी पर हमारे साहित्य की गहरी संरचना निर्भर करेगी। तो चरित्रों के निर्माण और चरित्रों के व्यापार या कहें चरित्रों की भूमिकाएं इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए।

सुधा-- आमतौर पर उपन्यासकार परिस्थितियों के अंतर्विरोधों को कभी व्यंग्य में प्रस्तावित करता है कभी दिशा की ओर सचेत भी करता है, जहां इनरसेंस आंतरिक आत्मबोध होता है या इनरसेंस को प्रस्तावित भी करता है। तो क्या ये नए सामाजिक संघर्ष उसी आंतरिक आत्म को संबोधित होने चाहिए? क्योंकि यही मनुष्य और उसके साहित्य के लिए उपयोगी होगा?

सर--- बिलकुल, हम स्पष्टत: देखते हैं कि तमाम उत्कृष्ट कहानियों और उपन्यासों में वे जाति, सम्प्रदाय और स्थानीयता की आलोचना ही मिलती है। क्योंकि कोई भी उपन्यास जो विशेषत: जाति और संप्रदाय को लेकर लिखा गया है वह स्थायी असर नहीं छोड़ पाता। आमतौर पर साहित्य की तमाम विधाएं, जाति, संप्रदाय और स्थानीयता के लिए प्रतिरोध का स्वर बराबर इनरसेल्फ की ओर ले जा रहा है। लोग यह अब जानने समझने लगे हैं कि यही तीन इनरसेल्फ को तोड़ने और घटाने के लिए उत्तरदायी हैं। इसलिए तमाम उत्कृष्ट रचनाओं में यह प्रतिरोधी स्वर विद्यमान है।

शनिवार, 7 अगस्त 2010

'मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा'

कुछ तो होगा
कुछ तो होगा
अगर मैं बोलूंगा
न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का
मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा
टूट मेरे मन टूट
अब अच्छी तरह टूट
झूठ मूठ मत अब रूठ---रघुवीर सहाय

सहाय जी ये पंक्तियां ज़िंदगी के लिए रामबाण की तरह है। सत् प्रतिशत मन को शांति मिलती है। अगर ध्यान से पढ़ें और अमल करें तो कम से कम मन की परेशानियां तो ज़रूर दूर होती हैं। लेकिन दिक्कत ये है कि लोग जानने समझने के बाद भी कुछ नहीं बोलते। मुक्तिबोध हमेशा ऐसे लोगों के खिलाफ लिखते रहे। पाश ने कहा था-बीच का रास्ता नहीं होता। बस सच यही है अगर ग़लत है तो ग़लत और सही है तो सही। पर लोग कहां ऐसा करते हैं।
अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिएगा।

रविवार, 18 जुलाई 2010

ए महाराज कौन किसको बदलता है ?

मुझे याद नहीं कि बदलते हालात में कौन किसको बदल रहा है---वक्त ने हमें बदला है या हम हालात के मारे हैं। कुछ तो ऐसा हो गया है जिसे देखकर पहले हमारे और आपके जेहन में खून खौलने लगता था अब उसे इग्नोर माकर आगे चल देते हैं। जिसके लिए पहले हम घंटों मशक्कत करते थे अब उसपर ध्यान भी नहीं देते। लगता है कौन किसके लिए करता है। अगर मेरे साथ ऐसा हो जाएगा तो कौन आएगा सामने। बस हम निकल जाते हैं उससे आगे।

कल की बात है। सड़क पर एक बाइक वाले का एक्सिडेंट हुआ। दर्द से कराहता रहा। लोग आसपास से गुजरते रहे। पर किसी ने रूककर उसे उठाने की जहमत नहीं ली। मैं भी उन्हीं में से एक था। ऑफिस जाने में पहले से ही देर हो गई थी। और फिर ये भी लगा कि अगर यहां रूक जाऊंगा तो बॉस को लगेगा नए तरीके का एक और झूठ। आखिर क्या करत। गाड़ी वहां से ऐसे निकाली जैसे मैंने कुछ नहीं देखा। कमोबेश हम सब की यही हालत है। हम तमाम तरह की बड़ी बातें करते हैं। तमाम बड़े विषयों पर ब्लॉग लिखते हैं। बुद्धिजीवी कहलाते हैं पर सब दिखावा। मुफ्त में ज्ञान देने का अवसर मिले तो न जाने कितने समय होते हैं हमार पास। पर जब किसी की मदद के लिए समय निकालने की बात की जाए तो हर कोई एक दूसरे से ज्यादा व्यस्त है। व्यस्तता इतनी कि अगर वो मदद करने में जुट जाएगा तो दुनिया भर के लोग आज सांस नहीं ले पाएंगे।

गुनहगार जाहिर तौर पर हम हैं। पर क्या हालात हमारे ऐसे हैं कि हम गुनहगार होते जा रहे हैं या फिर हम आलसी, संकीर्ण और परम स्वार्थी होते जा रहे हैं। क्या आपके साथ भी ऐसा ही होता है?